विकसित भारत के निर्माण में मातृशक्ति की भूमिका निर्णायक — बांसुरी स्वराज

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शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, दिल्ली प्रांत द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय कार्यक्रम ‘शक्ति से सशक्तिकरण की ओर’ का समापन

नई दिल्ली, 19 अक्टूबर 2026। शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, दिल्ली प्रांत द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय कार्यक्रम ‘शक्ति से सशक्तिकरण की ओर: भारतीय ज्ञान परंपरा, नारी नेतृत्व एवं राष्ट्र निर्माण’ का समापन 19 अक्टूबर को हुआ। 15 से 19 अक्टूबर तक आयोजित इस कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा में नारी की भूमिका, महिला सशक्तीकरण, नेतृत्व क्षमता, आत्मरक्षा, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण में मातृशक्ति के योगदान जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

समापन दिवस पर मुख्य अतिथि एवं सांसद सुश्री बांसुरी स्वराज ने कहा कि वर्तमान समय महिला-नेतृत्व वाले विकास को सशक्त करने का है। उन्होंने रेखांकित किया कि भारतीय परिवार और अर्थव्यवस्था की मजबूती में महिलाओं की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है। महिलाएँ केवल शक्ति की प्रतीक नहीं, बल्कि स्वयं शक्ति का स्वरूप हैं। मातृशक्ति को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाए बिना विकसित भारत की परिकल्पना पूरी नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि माँ अपनी संतान की प्रथम शिक्षिका होती है और उसके संस्कार समाज तथा राष्ट्र के भविष्य को दिशा देते हैं। महिलाओं को परिवर्तन की वाहक होने के साथ-साथ भारतीय जीवन-मूल्यों की संरक्षक की भूमिका भी निभानी चाहिए। उन्होंने महिला सशक्तीकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए लोकतांत्रिक विमर्श में जागरूक और विवेकपूर्ण सहभागिता पर भी बल दिया।

समापन सत्र की मुख्य वक्ता प्रो. भारती गोरे, हिंदी विभाग की प्राध्यापक एवं दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म, दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व निदेशक, ने भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की ऐतिहासिक और वैचारिक भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में नारी को ज्ञान, चिंतन, निर्णय और सामाजिक नेतृत्व की महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखा गया है। मैत्रेयी, गार्गी और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास और साहित्य में महिलाओं की बौद्धिक उपस्थिति अत्यंत समृद्ध रही है। रामायण और महाभारत की महिला पात्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने परिवार, समाज और नैतिक विमर्श को दिशा देने में महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला।

प्रो. गोरे ने भाषा, भोजन, भेष और भवन—इन चार ‘ब’ के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक जीवन-मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि सशक्तीकरण केवल बाहरी प्रतीकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें सार्थक स्वबोध, ज्ञान, संस्कार और आत्मरक्षा का समन्वय आवश्यक है। उनके अनुसार, नारी को दुर्गा के स्वरूप की भाँति शास्त्र और शस्त्र—दोनों से सुसज्जित होना चाहिए, अर्थात् उसके पास ज्ञान-विवेक के साथ आत्मविश्वास और अपनी रक्षा करने की क्षमता भी होनी चाहिए।

कार्यक्रम के पाँचों दिनों में नारी शक्ति के विभिन्न आयामों पर केंद्रित विषयगत सत्र आयोजित किए गए।

प्रथम दिवस, 15 अक्टूबर का विषय ‘नारी शक्ति—भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का आधार’ था। मुख्य अतिथि प्रख्यात वैज्ञानिक प्रो. रंजना अग्रवाल तथा वक्ता प्रो. रचना विमल, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने विषय पर विचार रखे। सत्र का केंद्र भारतीय संस्कृति, ज्ञान परंपरा और समाज के निर्माण में महिलाओं के योगदान को समझना रहा।

द्वितीय दिवस, 16 अक्टूबर को ‘नवदुर्गा के नौ स्वरूप एवं नारी सशक्तीकरण’ विषय पर चर्चा हुई। इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रो. बी.के. कुठियाला, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, तथा वक्ता प्रो. शशि शर्मा, विभागाध्यक्ष, पत्रकारिता, डॉ. भीमराव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, ने सहभागिता की। सत्र में नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के माध्यम से नारी शक्ति के विविध आयामों और सशक्तीकरण की अवधारणा पर विमर्श किया गया।

तृतीय दिवस, 17 अक्टूबर का विषय ‘नारी नेतृत्व एवं निर्णय क्षमता—चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ था। मुख्य अतिथि प्रो. सरोज शर्मा, कुलपति, राँची विश्वविद्यालय, ने नारी शक्ति को अंतर्निहित और स्वयंस्फूर्त शक्ति के रूप में समझने पर बल दिया। उन्होंने भारतीय ग्रंथों और परंपराओं के संदर्भ में महिलाओं के सम्मान तथा सामाजिक जीवन में उनकी भूमिका को रेखांकित किया। वक्ता डॉ. अनीता शर्मा, निदेशक, रामानुज अनुसंधान केंद्र, एसजीटी विश्वविद्यालय, ने कहा कि महिला प्रकृति से ही प्रथम शिक्षिका है। वह केवल शरीर को जन्म नहीं देती, बल्कि विचारों, मूल्यों और संस्कारों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चतुर्थ दिवस, 18 अक्टूबर को ‘महिला सुरक्षा, आत्मरक्षा एवं सामाजिक उत्तरदायित्व’ विषय पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि सुश्री तनुश्री, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त, दिल्ली पुलिस, ने सभी आयु वर्ग की बालिकाओं और महिलाओं को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण देने की आवश्यकता पर बल दिया। वक्ता प्रो. सुषमा जोशी, निदेशक, स्वामी रतन देव क्षेत्रीय केंद्र, खराल, जींद, ने विभिन्न उदाहरणों और केस स्टडी के माध्यम से महिलाओं के संघर्ष, सामर्थ्य तथा आत्मनिर्भरता के महत्व को रेखांकित किया।

पंचम दिवस, 19 अक्टूबर को ‘राष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति की भूमिका एवं पंच परिवर्तन’ विषय के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। सत्र में महिला-नेतृत्व वाले विकास, भारतीय परिवार व्यवस्था, सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण में मातृशक्ति की केंद्रीय भूमिका पर विशेष बल दिया गया।

पाँच दिवसीय कार्यक्रम ने भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में महिला सशक्तीकरण को केवल अधिकारों या अवसरों तक सीमित न रखते हुए नेतृत्व, आत्मरक्षा, निर्णय क्षमता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का प्रयास किया। कार्यक्रम का व्यापक संदेश रहा कि सशक्त नारी केवल अपने जीवन में परिवर्तन नहीं लाती, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के भविष्य को भी नई दिशा प्रदान करती है। भारतीय ज्ञान, समकालीन आवश्यकताओं और सामाजिक उत्तरदायित्व के समन्वय से ही नारी शक्ति की वास्तविक क्षमता का विकास संभव है।

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