

नई दिल्ली l लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या होती है ? संसद ? सरकार ? संविधान ? नहीं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत होती है सवाल पूछने वाली जनता। और जिस दिन किसी देश में सवाल पूछना अपराध बना दिया जाए, समझ लीजिए कि लोकतंत्र धीरे-धीरे डर के राज में बदल रहा है।
आज देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह नहीं है कि एक बच्चे ने सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठाया। सबसे खतरनाक बात यह है कि उस बच्चे को “पाकिस्तानी बच्चा” कहकर अपमानित किया गया और सत्ता समर्थित पूरा तंत्र लगभग खामोश बना रहा।
यह घटना सिर्फ एक टिप्पणी नहीं है। यह उस मानसिकता का आईना है जिसमें अब हर असहमति को राष्ट्रविरोध से जोड़ दिया जाता है। अगर कोई बेरोजगारी पर सवाल पूछे, तो वह “एंटी नेशनल”। अगर कोई महंगाई पर बोले, तो वह “विपक्षी एजेंट”। अगर कोई छात्र परीक्षा प्रणाली की विसंगतियों पर सवाल उठा दे, तो वह “पाकिस्तानी”।
यानी अब देशभक्ति का नया पैमाना तय हो चुका है कि
सरकार से सवाल मत पूछो।
व्यवस्था की आलोचना मत करो।
अन्याय पर आवाज मत उठाओ। सिर्फ ताली बजाओ, जयकार करो और चुप रहो।
सबसे दुखद पहलू यह है कि यह हमला किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर नहीं, बल्कि एक बच्चे पर हुआ। एक ऐसा बच्चा जिसने सिर्फ यह पूछने की कोशिश की कि परीक्षा प्रणाली में इतनी विसंगतियाँ क्यों हैं ? आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि कोई छात्र जेईई जैसी कठिन परीक्षा में शानदार अंक ला सकता है लेकिन बोर्ड परीक्षा में अपेक्षा से बेहद कम अंक पाता है ? मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल क्यों उठ रहे हैं ? बच्चे मानसिक तनाव में क्यों हैं ? आत्महत्याएँ क्यों बढ़ रही हैं ? यह सवाल सिर्फ उस बच्चे के नहीं हैं। ये देश के लाखों विद्यार्थियों और करोड़ों अभिभावकों के सवाल हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन सवालों का जवाब देने के बजाय अब सवाल पूछने वालों की देशभक्ति पर हमला किया जाता है।
यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। क्योंकि जब किसी समाज में तर्क खत्म होने लगते हैं, तब गालियाँ शुरू हो जाती हैं। जब जवाब नहीं होते, तब राष्ट्रवाद का शोर पैदा किया जाता है। जब व्यवस्था कटघरे में होती है, तब सवाल पूछने वालों को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह सब उस दौर में हो रहा है जब देश में युवाओं के भीतर असुरक्षा, तनाव और भविष्य को लेकर भय लगातार बढ़ रहा है। भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियाँ, पेपर लीक, परिणामों में विवाद, प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव और लगातार बढ़ती बेरोजगारी पहले ही छात्रों को मानसिक रूप से तोड़ रही है। ऐसे माहौल में अगर कोई छात्र सवाल पूछता है, तो उसका मजाक उड़ाना या उसे “पाकिस्तानी” कहना सिर्फ अमानवीय नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध जैसा है।
यहाँ एक और सवाल उठता है कि अगर यही टिप्पणी किसी दूसरे राजनीतिक खेमे से जुड़े पत्रकार या एंकर ने की होती, तो क्या प्रतिक्रिया यही रहती ? क्या तब भी इतनी ही चुप्पी होती ? शायद नहीं। तब टीवी स्टूडियो में बहसें होतीं, सोशल मीडिया पर अभियान चलते, गिरफ्तारी की मांग होती और नैतिकता का पूरा पाठ पढ़ाया जाता। लेकिन जब मामला सत्ता समर्थित चेहरों का हो, तब अचानक सबकी संवेदनाएँ शांत हो जाती हैं।
यही दोहरा चरित्र आज लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
दरअसल, आज की सबसे बड़ी लड़ाई सत्ता और विपक्ष की नहीं है। लड़ाई इस बात की है कि आने वाली पीढ़ी को कैसा भारत मिलेगा ? ऐसा भारत जहाँ बच्चे सवाल पूछने से डरें ? या ऐसा भारत जहाँ जिज्ञासा, तर्क और वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित किया जाए ? क्योंकि कोई भी देश सिर्फ नारों से महान नहीं बनता। देश तब महान बनता है जब वहाँ बच्चों को डराया नहीं जाता, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और सवाल पूछने की आजादी दी जाती है।
पत्रकारिता का भी मूल धर्म यही है कि वह सत्ता से सवाल पूछे, जनता की आवाज बने और कमजोर के साथ खड़ी हो। लेकिन अगर पत्रकारिता ही सत्ता का प्रचार विभाग बन जाए, अगर पत्रकार ही बच्चों को राष्ट्रविरोधी बताने लगें, तो यह सिर्फ मीडिया का संकट नहीं, बल्कि लोकतंत्र का संकट है।
आज जरूरत इस बात की है कि समाज इस मानसिकता का विरोध करे। क्योंकि जिस दिन इस देश का छात्र सवाल पूछना छोड़ देगा, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा भी दम तोड़ने लगेगी।

