
राष्ट्र केवल संसद में नहीं बनते, विश्वविद्यालयों में भी बनते हैं। संसद पांच साल की सरकार चुनती है, लेकिन विश्वविद्यालय पचास साल का भारत तैयार करते हैं। दुर्भाग्य यह है कि हम संसद की हर खाली सीट पर बहस करते हैं, लेकिन देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में वर्षों से खाली पड़ी शिक्षकों की कुर्सियों पर हमारी चुप्पी नहीं टूटती। शायद इसलिए कि राजनीति का शोर कक्षा की खामोशी को हमेशा दबा देता है।

23 आईआईटी में 12,498 स्वीकृत फैकल्टी पद हैं। इनमें से 4,804 खाली हैं। यानी लगभग 38 प्रतिशत। दूसरे शब्दों में कहें तो देश का सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी शिक्षा तंत्र हर तीसरे शिक्षक के बिना चल रहा है। क्या कोई सरकार सेना की एक-तिहाई चौकियां खाली छोड़ सकती है? क्या कोई अस्पताल एक-तिहाई डॉक्टरों के बिना चल सकता है? यदि नहीं, तो फिर विश्वविद्यालयों के साथ यह लापरवाही सामान्य क्यों मानी जा रही है?
इससे भी गंभीर तथ्य यह है कि जिन नौ आईआईटी ने श्रेणीवार आंकड़े सार्वजनिक किए हैं, उनमें रिक्त पदों का बड़ा हिस्सा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित है। यह आंकड़ा किसी विचारधारा की जीत या हार नहीं बताता। यह केवल इतना बताता है कि हमारी नीतियां वहां सफल नहीं हुईं, जहां उन्हें सबसे अधिक सफल होना चाहिए था। यदि योग्य लोग नहीं मिल रहे, तो यह शिक्षा नीति की विफलता है। यदि योग्य लोग हैं और नियुक्ति नहीं हो रही, तो यह शासन की विफलता है। दोनों ही स्थितियों में असफल व्यवस्था है, समाज नहीं।
विडंबना देखिए। एक तरफ हम दुनिया के विश्वविद्यालयों से प्रतिस्पर्धा करने की बात करते हैं, दूसरी तरफ अपने ही विश्वविद्यालयों में शिक्षक नियुक्त नहीं कर पा रहे। नई इमारतें बन रही हैं, नए कैंपस खुल रहे हैं, सीटें बढ़ रही हैं, लेकिन क्या शिक्षक भी उसी गति से बढ़ रहे हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने शिक्षा को भी निर्माण परियोजना समझ लिया है l जहां सीमेंट और कंक्रीट दिखाई देते हैं, लेकिन ज्ञान की नींव नहीं?
शिक्षक की कमी केवल एक रिक्त पद नहीं होती। वह एक बंद प्रयोगशाला होती है, एक अधूरा शोध होता है, एक भटका हुआ शोधार्थी होता है और सैकड़ों छात्रों के भविष्य में पड़ने वाली दरार होती है। यह नुकसान अगले बजट में नहीं दिखता, लेकिन अगले बीस वर्षों में देश की वैज्ञानिक, तकनीकी और बौद्धिक क्षमता में जरूर दिखाई देता है।
आज यदि कोई युवा शोधार्थी आईआईटी में पढ़ाने के बजाय विदेश या निजी क्षेत्र का रुख करता है, तो हमें केवल उसे दोष देने से पहले यह पूछना चाहिए कि क्या हमने उसके लिए ऐसा वातावरण बनाया, जहां वह रहना चाहे? प्रतिभा आदेश से नहीं रुकती। वह अवसर, सम्मान, संसाधन और भरोसे से रुकती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि हमने इस संकट को सामान्य मान लिया है। बेरोजगारी पर बहस होती है, महंगाई पर बहस होती है, चुनाव पर बहस होती है, लेकिन विश्वविद्यालयों में हजारों शिक्षकों की कमी राष्ट्रीय चिंता नहीं बनती। शायद इसलिए कि शिक्षक वोट बैंक नहीं होते, लेकिन वही भविष्य बनाते हैं।
देश की सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं और देश की सभ्यता की रक्षा शिक्षक। सैनिकों की चौकियां खाली छोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ माना जाता है। शिक्षकों की चौकियां खाली छोड़ना राष्ट्रीय भविष्य से खिलवाड़ है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले का नुकसान तुरंत दिखाई देता है, दूसरे का नुकसान एक पीढ़ी बाद।
विश्वगुरु बनने की शुरुआत भाषणों से नहीं, ब्लैकबोर्ड से होती है। जिस दिन भारत अपने विश्वविद्यालयों में हर योग्य शिक्षक की कुर्सी भर देगा, उसी दिन विश्वगुरु बनने का उसका दावा पहली बार विश्वसनीय लगेगा। उससे पहले तक यह सपना कम और नारा ज्यादा सुनाई देगा।

