मुद्दे की बात :सवाल सड़क का है, जवाब बैटरी क्यों?लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-:आलोक गौड़.

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जब भी व्यवस्था कठिन सवालों का जवाब नहीं खोज पाती, वह आसान समाधान तलाश करने की कोशिश करती है। आज इलेक्ट्रिक वाहनों को कुछ उसी तरह पेश किया जा रहा है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो वाहन में ईंधन के रूप में पेट्रोल और डीजल की जगह बैटरी आ जाने भर से शहरों का प्रदूषण कम हो जाएगा, ट्रैफिक जाम समाप्त हो जाएगा और परिवहन व्यवस्था आधुनिक व सुविधाजनक बन जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब बीमारी सड़क, शहरी नियोजन और यातायात व्यवस्था की हो तो इलाज सिर्फ इंजन बदलने में कैसे मिल सकता है?
मैं न तो इलेक्ट्रिक वाहनों के खिलाफ हूं और न ही तकनीक का विरोध करता हूं l क्योंकि ऐसा करना न बुद्धिमानी है और न नहीं व्यावहारिकता। सवाल यह है कि क्या किसी एक तकनीक को इतना बड़ा बना दिया जाए कि उसके पीछे असली समस्याएं दिखाई ही न दें? अगर किसी शहर में सड़कें कम हों, सार्वजनिक परिवहन कमजोर हो, फुटपाथों पर अतिक्रमण हो, पार्किंग की कोई ठोस नीति न हो और रोज लाखों नए वाहन सड़कों पर उतर रहे हों, तो क्या सिर्फ पेट्रोल की जगह बिजली भर देने से शहर बदल जाएगा?
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को भविष्य का पर्याय बताया जा रहा है। सरकार प्रोत्साहन दे रही है, कंपनियां अरबों रुपये का निवेश कर रही हैं और बाजार इसे अगली बड़ी क्रांति बता रहा है। यह स्वागतयोग्य है। जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना समय की मांग है। लेकिन किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके प्रचार से नहीं, उसके परिणामों के आधार पर होता है।


ज़रा एक सीधा-सा सवाल पूछिए। यदि आज दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद या पुणे की सड़कों पर चल रही लाखों पेट्रोल कारों की जगह उतनी ही इलेक्ट्रिक कारें आ जाएं तो क्या जाम खत्म हो जाएगा? क्या सड़कें चौड़ी हो जाएंगी? क्या पार्किंग की समस्या समाप्त हो जाएगी? क्या सफर का समय आधा रह जाएगा? इन सभी सवालों का जवाब है l नहीं।
जाम का कारण ईंधन नहीं, वाहनों की संख्या है। सड़क यह नहीं देखती कि उस पर चलने वाली कार पेट्रोल से चल रही है या बैटरी से। वह केवल इतना जानती है कि उसकी क्षमता कितनी है और उस पर दबाव कितना है। इसलिए इलेक्ट्रिक वाहन प्रदूषण कम करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन जाम का समाधान नहीं बन सकते।
यही वह सच है जिस पर सबसे कम चर्चा होती है।
दुनिया के जिन शहरों को बेहतर परिवहन व्यवस्था का उदाहरण माना जाता है, उन्होंने अपनी सफलता नई कारें बेचकर नहीं, बल्कि कारों की आवश्यकता कम करके हासिल की है। वहां सरकारें नागरिकों से यह नहीं कहतीं कि नई तकनीक वाली कार खरीदिए। वह यह सुनिश्चित करती हैं कि नागरिक बिना कार निकाले भी आसानी से अपने गंतव्य तक पहुंच सके। मेट्रो, बस, ट्राम, लोकल रेल, सुरक्षित फुटपाथ और साइकिल लेl यही किसी आधुनिक शहर की असली पहचान हैं।
भारत में स्थिति उलट दिखाई देती है। यहां नई कारों पर चर्चा ज्यादा होती है और सार्वजनिक परिवहन प्रणाली व उसकी व्यवस्था पर कम। नई बैटरी की रेंज खबर बन जाती है, लेकिन शहर में बसों की कमी शायद ही कभी राष्ट्रीय बहस बनती है। चार्जिंग स्टेशन की संख्या पर गर्व किया जाता है, लेकिन पैदल चलने योग्य फुटपाथों की संख्या पर कोई रिपोर्ट जारी नहीं होती।
दरअसल, परिवहन व्यवस्था का संकट तकनीक से ज्यादा प्राथमिकताओं का संकट है।
एक और सवाल है, जिसे पूछना जरूरी है। इलेक्ट्रिक वाहन धुआं नहीं छोड़ते, लेकिन उन्हें चलाने वाली बिजली कहां से आती है? भारत में बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा आज भी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि इलेक्ट्रिक वाहन बेकार हैं, बल्कि यह कि उन्हें पर्यावरण का अंतिम समाधान बताना जल्दबाजी होगी। यदि बिजली का स्रोत स्वच्छ नहीं होगा तो प्रदूषण केवल अपना पता बदल देगा।
इसके साथ ही बैटरियों का प्रश्न भी सामने है। लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों की बढ़ती मांग ने पूरी दुनिया में नई प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है। आने वाले वर्षों में करोड़ों बैटरियां अपनी आयु पूरी करेंगी। उनका पुनर्चक्रण कैसे होगा? उनका सुरक्षित निस्तारण कौन करेगा? यदि आज से इसकी तैयारी नहीं की गई तो भविष्य में यह भी पर्यावरण की एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
लेकिन इस पूरी बहस का एक आर्थिक पक्ष भी है, जिस पर कम चर्चा होती है।
इलेक्ट्रिक वाहन केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि हजारों करोड़ रुपये के नए बाजार का भी प्रश्न हैं। वाहन निर्माता कंपनियां निवेश कर रही हैं, बैटरी उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है, चार्जिंग नेटवर्क विकसित किए जा रहे हैं और सरकारें विभिन्न प्रकार की रियायतें दे रही हैं। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। नई तकनीक को बढ़ावा मिलना चाहिए। लेकिन चिंता तब होती है, जब बाजार का उत्साह नीति की प्राथमिकताओं पर हावी होने लगे।
यही कारण है कि इलेक्ट्रिक वाहनों पर जितनी बहस दिखाई देती है, उतनी बहस सार्वजनिक बसों की संख्या बढ़ाने, पैदल यात्रियों के अधिकारों या साइकिल लेन के विस्तार पर नहीं होती। क्योंकि बसें सुर्खियां कम बनाती हैं और नई कारें ज्यादा। फुटपाथों का उद्घाटन शायद ही कभी राजनीतिक उपलब्धि बनता हो, लेकिन नई तकनीक का उद्घाटन तुरंत चर्चा में आ जाता है।
यहीं नीति की असली परीक्षा होती है। सरकार का दायित्व केवल उद्योग को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि नागरिकों की सुविधा को प्राथमिकता देना भी है। यदि परिवहन नीति का लाभ मुख्यतः उन लोगों तक सीमित रह जाए जो नई इलेक्ट्रिक कार खरीद सकते हैं और दूसरी ओर करोड़ों लोग भीड़भरी बसों, लंबी प्रतीक्षा, टूटी सड़कों और अव्यवस्थित यातायात से जूझते रहें, तो ऐसी नीति संतुलित नहीं कही जा सकती।
किसी भी देश की परिवहन नीति की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितनी कारें बेचीं। उसकी सफलता इस बात से मापी जाती है कि उसने कितने नागरिकों का सफर आसान बनाया।
याद रखिए, एक इलेक्ट्रिक कार एक परिवार की सुविधा बढ़ाती है, लेकिन एक अच्छी बस सैकड़ों परिवारों का जीवन आसान बना देती है। एक नई कार सड़क पर एक और वाहन जोड़ती है, जबकि एक बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सैकड़ों कारों को सड़क पर आने से रोक सकती है। यही अंतर नीति और बाजार के बीच होता है।
भारत को इलेक्ट्रिक वाहनों की जरूरत है। इसे लेकर कोई विवाद नहीं हो सकता है । लेकिन भारत को उससे कहीं अधिक जरूरत ईमानदार और दूरदर्शी परिवहन नीति की है। ऐसी नीति जो यह स्वीकार करे कि शहरों की समस्या केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि अनियोजित विकास, निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता, कमजोर सार्वजनिक परिवहन और शहरी नियोजन की विफलता भी है।
तकनीक कभी व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकती। जब सरकारें व्यवस्था सुधारने की जगह तकनीक को उपलब्धि के रूप में बेचने लगती हैं, तब समस्याएं खत्म नहीं होतीं, उनका चेहरा बदल जाता है।
सवाल यह नहीं है कि कार पेट्रोल से चलेगी या बैटरी से। सवाल यह है कि क्या हमारे शहर इंसानों के लिए बनेंगे या केवल वाहनों के लिए? जिस दिन इस सवाल का ईमानदार जवाब मिल जाएगा, उसी दिन परिवहन व्यवस्था बदलनी शुरू हो जाएगी। उससे पहले इंजन बदलेंगे, विज्ञापन बदलेंगे, नारे बदलेंगे, लेकिन शहर नहीं।

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