मुद्दे की बात :-मरीज का भरोसा या टेंडर का खेल? लेखक वरिष्ठ सम्पादक:-:आलोक गौड़

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– स्वास्थ्य सेवाओं में सबसे महत्वपूर्ण केवल डॉक्टर ही नहीं होता, बल्कि वह जांच रिपोर्ट भी होती है जिसके आधार पर इलाज तय किया जाता है। दवा कौन-सी होगी, ऑपरेशन की जरूरत है या नहीं, बीमारी कितनी गंभीर है lइन सभी सवालों का पहला जवाब अक्सर पैथोलॉजी लैब से आता है। इसलिए लैब केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि पूरी चिकित्सा व्यवस्था की बुनियाद होती है। ऐसे में यदि उसी व्यवस्था को संचालित करने वाले टेंडर पर तकनीकी आपत्तियां दर्ज हों, निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठें और प्रशासनिक दबाव के आरोप सामने आएं, तो मामला केवल एक सरकारी अनुबंध का नहीं रह जाता। तब सवाल लाखों मरीजों के स्वास्थ्य, सार्वजनिक धन और सरकारी निर्णय प्रक्रिया की विश्वसनीयता का बन जाता है।
दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग का आउटसोर्सिंग ऑफ लैब सर्विसेज (ओएलएस) टेंडर आज ठीक ऐसे ही सवालों के केंद्र में है। यह कोई सामान्य सरकारी निविदा नहीं है। इसके दायरे में 203 सरकारी डिस्पेंसरियां और 370 आयुष्मान आरोग्य केंद्र आते हैं, जहां प्रतिदिन हजारों मरीज पैथोलॉजी जांच कराते हैं। यानी जिस कंपनी को यह जिम्मेदारी मिलेगी, उसके हाथों में दिल्ली की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का एक बड़ा हिस्सा होगा। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि टेंडर की प्रत्येक शर्त गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही के उच्चतम मानकों पर खरी उतरती हो।
लेकिन इस बारे में उपलब्ध 68 पृष्ठों के दस्तावेज़ एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। दस्तावेज़ों के अनुसार तत्कालीन महानिदेशक स्वास्थ्य सेवाएं डॉ. वंदना बग्गा ने इस टेंडर पर कई गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक आपत्तियां दर्ज की थीं। उन्होंने क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के अनुपालन, गुणवत्ता नियंत्रण, जवाबदेही, विवाद निवारण और शिकायत निस्तारण जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टता के अभाव की ओर ध्यान दिलाया। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उन्होंने यह उठाया कि यदि किसी मरीज को गलत जांच रिपोर्ट मिलती है, तो उसकी शिकायत कौन सुनेगा और अंतिम जिम्मेदारी किसकी होगी?
यह कोई तकनीकी औपचारिकता नहीं है। एक गलत ब्लड शुगर रिपोर्ट किसी मरीज को अनावश्यक इंसुलिन तक पहुंचा सकती है। कैंसर, थायरॉयड, डेंगू, किडनी या हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों में त्रुटिपूर्ण रिपोर्ट इलाज की दिशा बदल सकती है। इसलिए लैब रिपोर्ट केवल कागज का एक पन्ना नहीं, बल्कि उपचार की आधारशिला होती है।
दस्तावेज़ों के मुताबिक टेंडर में यह भी स्पष्ट नहीं था कि किस कंपनी की मशीनें लगेंगी, कौन-से रिएजेंट इस्तेमाल होंगे, गुणवत्ता की निगरानी किस प्रकार होगी, निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट नहीं मिलने या गुणवत्ता प्रभावित होने पर जवाबदेही किसकी होगी। यदि ये आपत्तियां रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या इतनी बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को ऐसे प्रश्नों के समाधान के बिना आगे बढ़ाया जाना चाहिए था?
मामला यहीं समाप्त नहीं होता। डॉ. वंदना बग्गा का आरोप है कि जब उन्होंने इन तकनीकी आपत्तियों के आधार पर टेंडर को स्वीकृति देने से इनकार किया, तब उन पर तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव डॉ. एस.बी. दीपक और विशेष स्वास्थ्य सचिव दानिश अशरफ की ओर से हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सहमति न देने पर उन्हें झूठे मामले में फंसाने और निलंबित करने की धमकी दी गई। दस्तावेज़ों के मुताबिक 4 जनवरी को उन्होंने उपराज्यपाल, मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव, विशेष स्वास्थ्य सचिव और सतर्कता विभाग को लिखित शिकायत भेजकर कथित प्रशासनिक दबाव और टेंडर प्रक्रिया में अनियमितताओं की जानकारी दी। इसके बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। रिकॉर्ड के अनुसार शिकायत के तीन दिन बाद ही उन्हें डॉ. तपस्या की शिकायत के आधार पर निलंबित कर दिया गया और बाद में ओएलएस टेंडर की प्रक्रिया आगे बढ़ गई।
यहीं यह मामला केवल एक अधिकारी और एक टेंडर तक सीमित नहीं रहता। सबसे बड़ा सवाल प्रक्रिया का है। यदि करोड़ों रुपये के सार्वजनिक टेंडर पर विभाग की सर्वोच्च तकनीकी अधिकारी ने गंभीर आपत्तियां दर्ज की थीं, तो क्या उन आपत्तियों की स्वतंत्र जांच पहले नहीं होनी चाहिए थी? क्या निर्णय प्रक्रिया को तब तक स्थगित नहीं किया जाना चाहिए था, जब तक उन बिंदुओं का संतोषजनक समाधान नहीं हो जाता? और यदि उन आपत्तियों का समाधान किया गया था, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं है?

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