

– लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध हत्या नहीं है, घोटाला नहीं है, भ्रष्टाचार भी नहीं है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध है l नागरिक का डर जाना।
जिस दिन जनता सरकार से सवाल पूछने से डरने लगे, जिस दिन विरोध करने से पहले उसे पुलिस, मुकदमे और जेल याद आने लगे, जिस दिन सत्ता की आलोचना को राष्ट्रविरोध और चुप्पी को देशभक्ति का पर्याय बना दिया जाए, उसी दिन समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का शरीर भले जीवित हो, उसकी आत्मा मरनासन्न स्थिति को पहुंच चुकी है।
संविधान ने हमें बोलने का अधिकार इसलिए नहीं दिया कि हम केवल सरकार की प्रशंसा करें। यदि सरकार की जय-जयकार ही नागरिक का कर्तव्य होता, तो संविधान नहीं, फरमान लिखे जाते।

सरकार लोकतंत्र का एक हिस्सा है, लोकतंत्र नहीं। सरकार बदलती है, संविधान नहीं। नेता बदलते हैं, नागरिक अधिकार नहीं।
यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी सरकार का उपहार नहीं, बल्कि नागरिक का मौलिक अधिकार है।
लोकतंत्र में सरकार से असहमति रखना अपराध नहीं हो सकता। सरकार की नीतियों का विरोध करना राष्ट्रद्रोह नहीं हो सकता। सवाल पूछना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
इतिहास गवाह है कि हर दौर की सत्ता आलोचना से असहज हुई है। लेकिन महान वही लोकतंत्र कहलाए, जहाँ सत्ता ने विरोध की आवाज़ को दबाने के बजाय सुनने का साहस दिखाया।
सरकारें बहुमत से बनती हैं, लेकिन बहुमत संविधान से बड़ा नहीं होता। लोकतंत्र में पुलिस की वर्दी किसी दल की नहीं, संविधान की होती है। प्रशासन किसी नेता का निजी सेवक नहीं, जनता का सेवक होता है। न्यायपालिका किसी सरकार की ढाल नहीं, नागरिक के अधिकारों की अंतिम प्रहरी होती है।
जब इन संस्थाओं को यह याद दिलाने की नौबत आ जाए कि उनकी पहली निष्ठा संविधान से है, तब खतरे की घंटी केवल सत्ता के लिए नहीं, पूरे लोकतंत्र के लिए बजती है।
यह प्रश्न किसी एक दल का नहीं है। आज सत्ता किसी के पास है, कल किसी और के पास होगी। लेकिन यदि आज नागरिक अधिकार कमजोर हुए, तो कल उनका दंश हर राजनीतिक दल को झेलना पड़ेगा।
इसलिए मुद्दा किसी सरकार का नहीं, व्यवस्था का है।
सरकार से असहमति रखने वाला नागरिक दुश्मन नहीं होता। वह लोकतंत्र का सबसे ज़रूरी प्रहरी होता है। क्योंकि चाटुकार सरकार को खुश कर सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को कभी मजबूत नहीं बना सकते।
जिस देश में केवल सत्ता की आवाज़ सुनाई दे और नागरिक की आवाज़ दब जाए, वहाँ संविधान की प्रस्तावना दीवार पर तो टंगी रह सकती है, लेकिन उसकी आत्मा धीरे-धीरे दम तोड़ने लगती है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, आलोचना सहने में होती है।
और जिस दिन सरकार यह परीक्षा पास करना छोड़ दे, उसी दिन से जनता को संविधान की किताब फिर से खोल लेनी चाहिए।

