मुद्दे की बात :न्याय का हिसाब कौन देगा? :-:आलोक गौड़

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नई दिल्ली l देश की अदालतों में न्याय मांगने जाइए तो सबसे पहले आपसे धैर्य मांगा जाएगा। फिर तारीख मिलेगी। फिर अगली तारीख। फिर उसके बाद वाली तारीख। और अगर मुकदमा थोड़ा गंभीर हुआ तो संभव है कि अदालत आपको फैसला सुनाने से पहले आपकी पूरी जिंदगी सुना दे।
संसद में सरकार ने जो आंकड़े रखे हैं, वे किसी मजाक से कम नहीं, अगर मामला इतना गंभीर न होता। सुप्रीम कोर्ट में 10 हजार से ज्यादा मामले दस साल से अधिक समय से लंबित हैं। इनमें 558 मामले 20 साल से ज्यादा पुराने हैं और 26 मामले 30 साल से भी ज्यादा समय से अदालत में पड़े हैं।


हाई कोर्टों का आंकड़ा तो और भयावह है। देश के 25 हाई कोर्टों में 80 हजार से ज्यादा मुकदमे तीन दशक से ज्यादा समय से लंबित हैं। तीन दशक! इतने समय में सरकारें बदल जाती हैं, संसद के चेहरे बदल जाते हैं, कानून बदल जाते हैं, तकनीक बदल जाती है, शहर बदल जाते हैं, लेकिन अदालत में पड़ा मुकदमा वहीं का वहीं रहता है।
जिसने मुकदमा दाखिल किया था, वह बूढ़ा हो चुका होगा। उसके बच्चे बड़े होकर अपने बच्चों के माता-पिता बन गए होंगे। लेकिन अदालत की फाइल अभी भी अपने फैसले का इंतजार कर रही होगी।
यह सिर्फ मुकदमे का लंबित होना नहीं है। यह किसी नागरिक की जिंदगी का लंबित होना है। 9,800 करोड़ रूपए खर्च हुए, न्याय फिर भी इंतजार में
सरकार बताती है कि 2011 से अब तक न्यायिक ढांचे और तकनीक को बेहतर बनाने के लिए 9,800 करोड़ रूपए से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं।
अदालतों में कंप्यूटर आए। ई-कोर्ट आए। ऑनलाइन सुनवाई आई। डिजिटल रिकॉर्ड आए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग आई। अदालतों को आधुनिक बनाने की योजनाएं आईं। लेकिन सवाल वही है कि न्याय कितनी तेजी से आया?
अगर 9,800 करोड़ रूपए खर्च करने के बाद भी हजारों मुकदमे दस-दस साल और अस्सी हजार मुकदमे तीस-तीस साल से लंबित हैं तो सरकार को सिर्फ खर्च का आंकड़ा नहीं बताना चाहिए। उसे परिणाम का हिसाब भी देना चाहिए। क्योंकि अदालत को डिजिटल बनाने और न्याय को समय पर उपलब्ध कराने में फर्क है। फाइल ऑनलाइन हो सकती है, लेकिन न्याय ऑनलाइन डाउनलोड नहीं होता। कंप्यूटर तारीख दर्ज कर सकता है, फैसला नहीं सुना सकता।
सर्वर की गति बढ़ाई जा सकती है, लेकिन न्याय की गति के लिए जज चाहिए।
और यहीं सरकार के अपने आंकड़े उसकी अपनी कहानी काटने लगते हैं।
जजों की कमी है तो जज कौन देगा? कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में बताया कि हाई कोर्टों में जजों के 1,122 स्वीकृत पदों में 341 खाली हैं। निचली अदालतों में 30,868 स्वीकृत पद हैं, जिनमें 7,311 खाली पड़े हैं। अब सवाल बहुत सीधा है कि जब अदालतों में मुकदमों का अंबार लगा है, तब जजों के हजारों पद खाली क्यों हैं?
क्या मुकदमों की सुनवाई फाइलें खुद करेंगी? क्या ई-कोर्ट फैसला लिखेगा?
क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जमानत देगी? तकनीक जरूरी है, लेकिन न्यायाधीश का विकल्प नहीं। जजों की कमी कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे देखकर सरकार हाथ खड़े कर दे। यह प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। पद स्वीकृत हैं तो उन्हें भरने की प्रक्रिया भी समयबद्ध होनी चाहिए। और अगर नियुक्तियों की प्रक्रिया में अड़चन है तो सरकार और न्यायपालिका दोनों को मिलकर उसे दूर करना होगा। नागरिक को इससे कोई मतलब नहीं कि खाली कुर्सी की जिम्मेदारी किसकी है। उसे तो अपनी सुनवाई चाहिए।
सरकार ने दोष भी खोज लिया है l कॉलेजियम!
कानून मंत्री ने हाई कोर्टों में जजों की नियुक्ति की सिफारिश में तय समय- सीमा का पालन न करने के लिए संबंधित हाई कोर्ट कॉलेजियम को बड़ी संख्या में रिक्तियों का मुख्य कारण बताया है। यहां सरकार का तर्क सुनने में बड़ा सुविधाजनक है।
जजों की नियुक्ति नहीं हुई क्योंकि कॉलेजियम ने समय पर नाम नहीं भेजे।
जज कम हैं इसलिए मुकदमे लंबित हैं।
मुकदमे लंबित हैं तो जिम्मेदारी न्यायपालिका की है।
अब नागरिक को अदालत जाने से पहले शायद कॉलेजियम का पता भी पूछना पड़ेगा। लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकार और न्यायपालिका के बीच नियुक्तियों को लेकर प्रक्रिया अटकती है तो उस गतिरोध को खत्म करने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या सरकार और न्यायपालिका दोनों की कोई साझा जिम्मेदारी नहीं? क्या हजारों पद वर्षों तक खाली रहना एक सामान्य स्थिति मान ली जाए? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अगर सरकार को पता है कि न्यायिक पदों की कमी मुकदमों के लंबित रहने की बड़ी वजह है, तो फिर इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं? जिम्मेदारी का खेल बंद होना चाहिए
सरकार कहती है कि —न्यायपालिका जिम्मेदार है।
न्यायपालिका कह सकती हैजज कम हैं।जज कह सकते हैं कि मामले बहुत हैं। वकील कह सकते हैं—तारीखें जरूरी हैं।
पक्षकार कह सकते हैं—गवाह नहीं आ रहे।
और इस तरह जिम्मेदारी एक मेज से दूसरी मेज तक घूमती रहती है। लेकिन जिस आदमी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है, उसकी जिंदगी किसी मेज पर नहीं घूमती। वह आगे बढ़ती है। उसके बच्चों की उम्र बढ़ती है। उसकी संपत्ति का मूल्य बदलता है। उसका कारोबार खत्म हो सकता है। नौकरी चली जाती है। परिवार टूट सकता है। कभी-कभी वह खुद दुनिया से चला जाता है। मुकदमा फिर भी चलता रहता है। इसलिए तीन दशक पुराने मुकदमे को केवल ‘लंबित मामला’ कहना इस त्रासदी को छोटा करना है। यह न्याय व्यवस्था की गंभीर विफलता है। क्या न्याय की कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए?
कानून मंत्री ने यह भी कहा कि न्यायपालिका ने मामलों के निपटारे की कोई समय सीमा तय नहीं की है।
यही बात सबसे ज्यादा परेशान करती है।
किसी सरकारी कार्यालय में काम देर से हो तो समय सीमा है। पासपोर्ट देर से मिले तो शिकायत है।
रेल देर से चले तो सवाल है।
सरकारी योजना में देरी हो तो समीक्षा है। लेकिन न्याय में देरी की कोई सीमा नहीं?
क्या नागरिक अदालत में मुकदमा दाखिल करते समय यह मानकर चले कि फैसला कब आएगा, यह किसी को नहीं मालूम?
दस साल? बीस साल?
तीस साल? या शायद उससे भी ज्यादा?
न्याय अगर समय पर नहीं मिलता तो उसकी कीमत कौन चुकाता है? सरकार नहीं। कॉलेजियम नहीं।
अदालत नहीं।अंततः नागरिक। तीस साल पुराने मुकदमे अब ‘विशेष श्रेणी’ होने चाहिए
जब किसी हाई कोर्ट में 80 हजार से ज्यादा मुकदमे तीन दशक से लंबित हों तो यह सामान्य पेंडेंसी नहीं है।
यह न्यायिक आपातस्थिति है। दस साल पुराने मामलों की अलग निगरानी होनी चाहिए। बीस साल पुराने मामलों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। तीस साल पुराने मामलों के लिए विशेष अभियान चलना चाहिए।
और इसकी सार्वजनिक निगरानी होनी चाहिए कि कितने पुराने मामलों का निपटारा हुआ और कितने बाकी हैं।
सिर्फ यह कह देना कि मामले जटिल हैं, पर्याप्त नहीं है। जटिलता का सम्मान अदालत करे, लेकिन अनंतकाल का नहीं।
हर मुकदमा एक जैसा नहीं हो सकता। संवैधानिक मामले, जटिल आपराधिक मामले, बड़े वाणिज्यिक विवाद—इनमें समय लग सकता है। लेकिन हर मामले को अनिश्चितकाल तक लटकाने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती।
न्यायालय की गरिमा का अर्थ यह नहीं कि तारीखों की कोई जवाबदेही न हो।
सरकार और न्यायपालिका दोनों को आईना देखना होगा यह बहस सरकार बनाम न्यायपालिका की नहीं होनी चाहिए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता जरूरी है। जजों की नियुक्ति में राजनीतिक नियंत्रण लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मतलब यह भी नहीं कि वह लंबित मामलों की समस्या पर जवाबदेही से मुक्त हो जाए।
उसी तरह सरकार न्यायपालिका की नियुक्ति व्यवस्था पर सवाल उठा सकती है, लेकिन उसे यह भी देखना होगा कि अदालतों के लिए पर्याप्त संसाधन, स्टाफ और इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराने में उसकी अपनी जिम्मेदारी क्या है।
सरकार और न्यायपालिका दोनों संविधान के अंग हैं। नागरिक दोनों से न्याय की उम्मीद करता है। इसलिए जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने के बजाय समाधान पर सहमति क्यों नहीं बन सकती?
सुप्रीम कोर्ट में दस हजार से ज्यादा मामले दस साल से ज्यादा पुराने हैं। हाई कोर्टों में अस्सी हजार से ज्यादा मुकदमे तीस साल से ज्यादा पुराने हैं। 9,800 करोड़ रूपए से ज्यादा खर्च हो चुका है। हजारों न्यायिक पद खाली हैं। और अब बहस यह चल रही है कि जिम्मेदार कौन है? सरकार या कॉलेजियम? नागरिक को इससे कोई मतलब नहीं। वह यह नहीं पूछ रहा कि जज की नियुक्ति की सिफारिश किसने की।
वह यह नहीं पूछ रहा कि फाइल किस मंत्रालय में रुकी। वह यह नहीं पूछ रहा कि कॉलेजियम ने नाम कब भेजा।वह केवल यह पूछ रहा है कि “मुझे न्याय कब मिलेगा?” यही लोकतंत्र की सबसे सरल और सबसे कठिन परीक्षा है। क्योंकि अदालत में लंबित फाइल के भीतर सिर्फ कागज नहीं होते। वहां किसी का अधिकार होता है। किसी की जमीन होती है। किसी की नौकरी होती है। किसी की संपत्ति होती है।
किसी की आजादी होती है।
और कई बार किसी की पूरी जिंदगी होती है।
इसलिए अब दोषारोपण का खेल बंद होना चाहिए।
सरकार को अपने हिस्से का हिसाब देना होगा।
न्यायपालिका को अपने हिस्से का हिसाब देना होगा। कॉलेजियम को अपने हिस्से का हिसाब देना होगा। क्योंकि जनता ने अदालतों को न्याय के लिए बनाया है, तारीखों की विरासत ढोने के लिए नहीं।
और आखिरी सवाल कि
अगर 30 साल तक मुकदमा चलता रहे, तो अदालत में फैसला किसका होता है? न्याय का या इंतजार का?

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