कालिंदी कॉलेज :’वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व और समकालीन प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया।

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कालिंदी कॉलेज ने “भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका और समकालीन साहित्य में इसके प्रतिनिधित्व” विषय पर परिचर्चा आयोजित की।

नई दिल्ली,कालिंदी कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय ने 8 अगस्त 2026 को “भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका और समकालीन साहित्य में इसके प्रतिनिधित्व” विषय पर एक बौद्धिक परिचर्चा का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में प्रतिष्ठित प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने भाग लिया तथा ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व और समकालीन प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ प्रो. मीना चरंदा, प्राचार्या, कालिंदी कॉलेज तथा मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन समारोह के साथ हुआ। इसके पश्चात कालिंदी कॉलेज की म्यूजिक सोसाइटी द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय के गान (एंथम) की प्रस्तुति दी गई।

कार्यक्रम में विशिष्ट मुख्य अतिथियों एवं वक्ताओं के रूप में प्रो. बलराम पाणि (डीन ऑफ कॉलेजेस, दिल्ली विश्वविद्यालय), डॉ. बालमुकुंद पांडेय (राष्ट्रीय संगठन सचिव, A.B.I.S. Y., दिल्ली), प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा (अध्यक्ष, AIIMS Scheme), श्री नितीश्वर कुमार (IAS, अतिरिक्त सचिव, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय), प्रो. के. रत्माबली (अध्यक्ष, शासी निकाय, कालिंदी कॉलेज), प्रो. मीना चरंदा (प्राचार्या, कालिंदी कॉलेज), डॉ. रत्मेश त्रिपाठी (संयोजक, राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सहायक प्रोफेसर, सत्यवती कॉलेज), डॉ. प्रदीप कुमार उपाध्याय (समन्वयक, राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं सहायक प्रोफेसर, कालिंदी कॉलेज) तथा डॉ. ओम जी उपाध्याय (निदेशक, भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद, भारत सरकार) का औपचारिक परिचय कराया गया। सभी अतिथियों को शॉल, पौधा तथा ‘वंदे मातरम्’ गीत के चित्र से सम्मानित किया गया।

डॉ. ओम जी उपाध्याय के मंच संचालन में परिचर्चा की शुरुआत डॉ. रत्नेश त्रिपाठी के संबोधन से हुई। उन्होंने ‘विकसित भारत’ के राष्ट्रीय विचार पर विशेष जोर दिया। मुख्य वक्ता डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने मुख्य वक्तव्य देते हुए ‘वंदे मातरम्’ के महत्व और इसकी शक्ति पर विस्तार से प्रकाश डाला। प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा ने भारत के ऐतिहासिक मर्म तथा अतीत के महान नेताओं द्वारा दिए गए संदेशों पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रो. बलराम पाणि ने युवा पीढ़ी को बंगाल विभाजन के ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ते हुए उन घटनाओं का उल्लेख किया, जिनका दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय इतिहास पर पड़ा। श्री नितीश्वर कुमार ने देशभक्ति की कविताओं के महत्व और राष्ट्रीय एकता के प्रतीकों का विश्लेषण किया। वहीं, प्रो. के. रत्माबली ने विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक सोच विकसित करने में शिक्षकों की भूमिका पर जोर दिया, ताकि वे भारत को वैश्विक नेतृत्व के रूप में उभरने में अपना योगदान दे सकें।

कार्यक्रम का समापन कालिंदी कॉलेज की प्राचार्या प्रो. मीना चरंदा द्वारा धन्मवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने कॉलेज में ‘वंदे मातरम्’ के उत्सव और सम्मान को बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया। संगोष्ठी का समापन ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन के साथ हुआ, जिससे विद्यार्थियों को इसके ऐतिहासिक मर्म और समकालीन प्रासंगिकता के साथ-साथ इसके देशभक्तिपूर्ण महत्व को अनुभव करने का अवसर मिला।

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