
नई दिल्ली l कांवड़ यात्रा खत्म होते ही प्रशासन के पास आंकड़े होंगे, सरकार के पास उपलब्धियों की सूची होगी और पुलिस के पास यह बताने के लिए बहुत कुछ होगा कि उसने लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए कितने इंतजाम किए। लेकिन जनता के पास एक सवाल फिर भी बचा रहेगा कि अगर इंतजाम इतने पुख्ता थे तो हर साल विवाद, मारपीट और हिंसा की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं?
रुड़की में घटना हुई। लखनऊ में भी ऐसी ही स्थिति सामने आई। मेरठ में दो कांवड़िया गुट आपस में भिड़े और विवाद छुड़ाने पहुंचे दो पुलिसकर्मियों को ही पीट दिया गया। मामला यहीं खत्म नहीं होता। असली चिंता इसके बाद शुरू होती है कि यदि पुलिसकर्मियों पर हमला करने के बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं होता और मेडिकल कराने के बाद आरोपियों को यात्रा पर रवाना कर दिया जाता है, तो प्रशासन आखिर किस तरह का संदेश दे रहा है?

क्या कानून लागू करने से पहले अब यह देखना जरूरी हो गया है कि सामने वाला कांवड़िया है या सामान्य नागरिक?
यह सवाल किसी धार्मिक यात्रा या श्रद्धालुओं के खिलाफ नहीं है। लाखों लोग हर साल पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ कांवड़ यात्रा करते हैं। वह रास्ते में किसी से विवाद नहीं करते, किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते और अपनी आस्था के साथ अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। इसलिए कुछ लोगों की हरकतों के कारण पूरी यात्रा को कटघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन दूसरी तरफ यह तर्क भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि धार्मिक यात्रा में शामिल व्यक्ति कानून से ऊपर हो जाए। आस्था का सम्मान और कानून की सर्वोच्चता दोनों साथ चल सकते हैं। बल्कि चलने ही चाहिए।
समस्या यह है कि प्रशासन हर साल यात्रा से पहले तैयारियों की घोषणा तो करता है, लेकिन पिछले वर्षों की घटनाओं से क्या सीखा गया, इसका जवाब बहुत कम मिलता है।
क्या संवेदनशील इलाकों की पहचान की जाती है?
क्या ऐसे स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की जाती है?
क्या संभावित विवाद के कारणों का पहले से आकलन किया जाता है?
क्या पुलिसकर्मियों को भीड़ के भीतर हिंसा रोकने और तत्काल कार्रवाई के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए जाते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण कि क्या पुलिस को यह भरोसा दिया जाता है कि कानून तोड़ने वाले के खिलाफ कार्रवाई करने पर सरकार उसके साथ खड़ी होगी? क्योंकि मामला केवल कांवड़ियों के बीच विवाद का नहीं है। जब पुलिसकर्मी पर हमला होता है, तब यह सीधे राज्य की कानून लागू करने की क्षमता पर हमला होता है।
यदि एक पुलिसकर्मी को भीड़ पीट देती है और उसके बाद भी मामला दर्ज नहीं होता, तो संदेश सिर्फ उस भीड़ तक नहीं जाता। यह संदेश पूरी पुलिस व्यवस्था तक जाता है कि कुछ परिस्थितियों में वर्दी भी असहाय हो सकती है।
यह स्थिति किसी भी सरकार के लिए चिंताजनक होनी चाहिए। हर साल कांवड़ यात्रा का विस्तार हो रहा है। श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है। सड़क पर भीड़ बढ़ रही है। सोशल मीडिया के कारण किसी छोटी घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी भी पहले से ज्यादा बढ़ गई है।
अब सिर्फ बैरिकेडिंग और रूट डायवर्जन से काम नहीं चलेगा।
भीड़ प्रबंधन की आधुनिक रणनीति चाहिए। संभावित विवादों की पहचान चाहिए। त्वरित प्रतिक्रिया व्यवस्था चाहिए और सबसे बढ़कर कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल का भरोसा चाहिए। लेकिन हमारी व्यवस्था अक्सर घटना होने के बाद सक्रिय होती है। पहले विवाद होता है। फिर पुलिस पहुंचती है।
फिर वीडियो सामने आता है। फिर अफसरों की बैठक होती है। फिर बयान जारी होता है। फिर कुछ दिनों तक कार्रवाई की चर्चा होती है। और अगले साल फिर वही तैयारी, वही दावे और कई बार वही घटनाएं।
इसे व्यवस्था नहीं कहा जा सकता। रोकथाम ही असली प्रशासन है।
कांवड़ यात्रा कोई अचानक होने वाला आयोजन नहीं है। इसकी तारीखें पहले से तय होती हैं। मार्ग पहले से मालूम होते हैं। संभावित भीड़ का अनुमान पहले से होता है। संवेदनशील जिले और इलाके प्रशासन को पता होते हैं। पिछले वर्षों की घटनाओं का रिकॉर्ड भी उपलब्ध होता है। फिर भी यदि हर साल लगभग वही समस्याएं सामने आती हैं तो सवाल व्यवस्था की क्षमता पर उठेगा ही।
सरकार को अब हर साल सिर्फ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसने कितने पुलिसकर्मी तैनात किए। उसे यह बताने की जरूरत है कि पिछले साल की घटनाओं से क्या सीखा और इस साल ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या बदला? यह जवाबदेही होनी चाहिए। और इसमें किसी धार्मिक भावना को चोट नहीं पहुंचती। बल्कि इससे धार्मिक यात्रा की गरिमा ही बढ़ती है।
कांवड़ यात्रा जितनी बड़ी होती जा रही है, उसमें शामिल लोगों की सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो रही है। लेकिन सुरक्षा का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पुलिस कानून तोड़ने वाले के सामने हाथ बांधकर खड़ी हो जाए। किसी भी धार्मिक यात्रा की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि उसमें कितनी भीड़ आई। असली पैमाना यह होना चाहिए कि यात्रा कितनी सुरक्षित, शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में रही। और इसमें प्रशासन की भूमिका निर्णायक है।
यदि दो गुटों में झगड़ा होता है तो दोनों पक्षों को कानून के अनुसार कार्रवाई का सामना करना चाहिए। यदि किसी नागरिक पर हमला होता है तो मामला दर्ज होना चाहिए। यदि पुलिसकर्मी पर हमला होता है तो कार्रवाई और भी दृढ़ होनी चाहिए। क्योंकि पुलिस की वर्दी पर हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है l वह राज्य की कानून लागू करने की क्षमता को चुनौती है।
इसीलिए सरकार को एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए कि धार्मिक यात्रा हो या कोई अन्य सार्वजनिक आयोजन, कानून तोड़ने वाले के लिए कोई विशेष छूट नहीं होगी। न पुलिस के लिए। न नागरिक के लिए।
न किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए। और न ही किसी धार्मिक पहचान के नाम पर। यह बात जितनी जल्दी समझ ली जाए, उतना ही बेहतर है।
क्योंकि यदि सरकारें हर साल कांवड़ यात्रा को पहले से बड़ा और भव्य बनाने की तैयारी कर सकती हैं तो उसे पहले से ज्यादा सुरक्षित और अनुशासित बनाने की स्थायी व्यवस्था भी करनी होगी।
सवाल यह नहीं है कि कांवड़ यात्रा होनी चाहिए या नहीं। बिल्कुल होनी चाहिए। सवाल यह है कि क्या उसके साथ कानून भी उतनी ही मजबूती से चलेगा? रुड़की, लखनऊ और मेरठ जैसी घटनाएं इसी सवाल को हमारे सामने खड़ा करती हैं।
हर साल यात्रा आती है।
हर साल भीड़ बढ़ती है।
हर साल प्रशासन तैयारी करता है। और हर साल कुछ घटनाएं यह याद दिला जाती हैं कि तैयारी और रोकथाम में फर्क होता है।
अब सरकार को इस फर्क को समझना होगा।
श्रद्धा को सुरक्षा चाहिए।
सुरक्षा को कानून चाहिए।
और कानून को निष्पक्षता।

