
भ्रष्टाचार किसी भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन है। वह जनता के पैसे की चोरी ही नहीं करता, व्यवस्था में लोगों का भरोसा भी खा जाता है। इसलिए जो भी सरकार भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ सख्ती का दावा करे, उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में हर ताकत के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। सवाल यह नहीं है कि जांच एजेंसी कितने छापे मार रही है या कितने लोगों को गिरफ्तार कर रही है। असली सवाल यह है कि अदालत में वह अपने आरोप कितनी बार साबित कर पा रही है।

यही सवाल अब सरकार के अपने आंकड़े पूछ रहे हैं।
संसद में सरकार ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत 1,080 नए मामले दर्ज किए। पिछले चार वर्षों में यह सबसे अधिक संख्या है। पहली नज़र में यह आंकड़ा बताता है कि ईडी पहले से अधिक सक्रिय है। लेकिन उसी जवाब में एक दूसरा आंकड़ा भी है, जो इस पूरी कहानी का दूसरा पक्ष सामने रखता है।
पिछले पांच वर्षों में ईडी ने 4,622 मामले दर्ज किए। मगर दोषसिद्धि हुई केवल 43 मामलों में। यह आंकड़ा कई सवाल खड़े करता है। क्या जांच इतनी मजबूत नहीं थी कि अदालत में टिक सके? क्या मुकदमे इतने लंबे हैं कि फैसला आने तक वर्षों बीत जाते हैं? क्या कानूनी प्रक्रिया इतनी धीमी है कि न्याय स्वयं प्रतीक्षा में कैद हो गया है? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि मामलों की संख्या बढ़ाना ही सफलता का पैमाना बन गया है?
सरकार का पहला जवाब यही होगा कि अधिकांश मामले अभी अदालतों में लंबित हैं। यह तर्क गलत नहीं है। लेकिन क्या केवल यही जवाब पर्याप्त है? अगर कोई व्यक्ति दस-दस साल तक आरोपी बना रहे, उसकी संपत्ति जब्त हो जाए, उसका कारोबार ठप पड़ जाए, उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाए और अंत में अदालत उसे बरी कर दे, तो उस खोई हुई जिंदगी का हिसाब कौन देगा?
लोकतंत्र में किसी नागरिक को केवल आरोपी बना देना न्याय नहीं होता। न्याय तब होता है, जब निष्पक्ष जांच के आधार पर अदालत अपराध सिद्ध करे। संविधान ने हर व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना है, जब तक उसका अपराध अदालत में साबित न हो जाए। यही सिद्धांत सभ्य न्याय व्यवस्था की रीढ़ है।
यही कारण है कि जांच एजेंसियों की सफलता केवल दर्ज मामलों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। यदि ऐसा होने लगे तो किसी भी एजेंसी के लिए सबसे आसान काम होगा कि हर साल पहले से अधिक मामले दर्ज करना। लेकिन क्या इससे भ्रष्टाचार कम हो जाएगा? क्या इससे जनता का भरोसा बढ़ जाएगा? शायद नहीं।
ईडी आज देश की सबसे शक्तिशाली जांच एजेंसियों में गिनी जाती है। उसे गिरफ्तारी की विशेष शक्तियां मिली हैं। वह संपत्तियां जब्त कर सकती है। पीएमएलए जैसा कठोर कानून उसके हाथ में है, जिसमें जमानत भी आसान नहीं होती। ऐसे में यह कहना कि एजेंसी जितनी शक्तिशाली होगी, उससे उतनी ही अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा भी होगी, कोई असंगत मांग नहीं है।
सरकार को संसद में केवल यह बताकर नहीं रुक जाना चाहिए कि कितने नए मामले दर्ज हुए। उसे यह भी बताना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में दर्ज 4,622 मामलों में से कितनों में आरोप तय हुए? कितनों में गवाहों की गवाही पूरी हुई? कितनों में मुकदमे अंतिम चरण में हैं? कितनों में अदालतों ने जांच पर सवाल उठाए? और कितने मामलों में आरोपी अंततः बरी हुए? इन सवालों का जवाब इसलिए जरूरी है क्योंकि कानून का उद्देश्य केवल कार्रवाई करना नहीं, न्याय सुनिश्चित करना है।
आज एक और चिंता पैदा हो रही है। जांच एजेंसियों की कार्रवाई अक्सर उसी दिन सुर्खियां बन जाती है जिस दिन छापा पड़ता है या गिरफ्तारी होती है। टीवी स्टूडियो में बहस शुरू हो जाती है। सोशल मीडिया पर फैसले सुनाए जाने लगते हैं। लेकिन अगर वर्षों बाद अदालत कहती है कि आरोप सिद्ध नहीं हुए, तो वह खबर उतनी प्रमुखता से सामने नहीं आती। इससे समाज के मन में एक खतरनाक प्रवृत्ति जन्म लेती है कि आरोप ही सजा बन जाता है यही किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आरोप लगना और अपराध सिद्ध होना, दोनों एक जैसी बातें नहीं हैं। जांच एजेंसी का काम केवल संदेह व्यक्त करना नहीं, बल्कि ऐसे साक्ष्य जुटाना है जो अदालत में टिक सकें। अगर वर्षों बाद भी मुकदमे आगे नहीं बढ़ते, या दोषसिद्धि का प्रतिशत बेहद कम दिखाई देता है, तो सवाल केवल अदालतों पर नहीं, पूरी आपराधिक न्याय प्रणाली पर उठते हैं। और चूंकि ईडी उस प्रणाली का सबसे शक्तिशाली हिस्सा है, इसलिए उससे सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।
सरकार को यह भी बताना चाहिए कि आखिर इतने मामलों के बावजूद दोषसिद्धि की रफ्तार धीमी क्यों है? क्या ईडी के पास पर्याप्त जांच अधिकारी नहीं हैं? क्या अभियोजन पक्ष कमजोर है? क्या अदालतों में विशेष न्यायालयों की संख्या कम है? अगर समस्या इनमें से कोई है, तो उसका समाधान भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन अगर इन सवालों के जवाब दिए बिना सिर्फ़ छापों और गिरफ्तारियों के आंकड़े गिनाए जाएंगे, तो स्वाभाविक है कि संदेह पैदा होंगे।
याद रखिए, कानून का उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, न्याय स्थापित करना है। अगर नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि किसी एजेंसी के निशाने पर आ जाना ही सबसे बड़ी सजा है, तो यह स्थिति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकती। क्योंकि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा भी एक संवैधानिक मूल्य है और उसकी रक्षा करना भी राज्य का दायित्व है। यह बहस ईडी के पक्ष या विपक्ष की नहीं है। यह बहस उस सिद्धांत की है जिस पर पूरी न्याय व्यवस्था खड़ी है। आज ईडी है, कल कोई दूसरी एजेंसी होगी। अगर जवाबदेही का पैमाना कमजोर हुआ, तो नुकसान किसी एक सरकार या एक दल का नहीं, पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का होगा।
सुप्रीम कोर्ट भीसमय-समय पर यह स्पष्ट करता रहा है कि कठोर कानूनों का प्रयोग संविधान की सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए। विशेष कानून किसी एजेंसी को विशेष अधिकार ज़रूर देते हैं, लेकिन उन अधिकारों के साथ विशेष जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। कानून की कठोरता कभी भी निष्पक्षता का विकल्प नहीं बन सकती।
सरकार को यह भी समझना होगा कि जनता केवल कार्रवाई नहीं देखती, उसका परिणाम भी देखती है। अगर हर साल मामलों की संख्या बढ़ती जाए, लेकिन अदालतों में अपराध सिद्ध होने की गति उसी अनुपात में न बढ़े, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठेगा कि सफलता का पैमाना आखिर है क्या? क्या सफलता केवल इतने लोगों पर छापे मार देना है? क्या सफलता केवल संपत्तियां जब्त कर लेना है? या सफलता तब मानी जाएगी, जब अदालत कहे कि जांच निष्पक्ष, ठोस और कानून के अनुरूप थी?
लोकतंत्र में जांच एजेंसी की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार नहीं, उसकी विश्वसनीयता होती है। अधिकार कानून दे सकता है, लेकिन विश्वसनीयता केवल निष्पक्ष काम से अर्जित होती है। जिस एजेंसी पर जनता भरोसा करती है, उसके लिए अलग से प्रचार की जरूरत नहीं पड़ती। उसके हर कदम को अदालत भी गंभीरता से लेती है और समाज भी।
यही कारण है कि संसद में रखे गए इन आंकड़ों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। सरकार को यह बताना चाहिए कि 4,622 मामलों में से कितने मुकदमे अंतिम चरण में हैं, कितनों में सजा की संभावना है और दोषसिद्धि की दर बढ़ाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। जवाबदेही का अर्थ एजेंसी को कमजोर करना नहीं होता, बल्कि उसे और अधिक प्रभावी तथा विश्वसनीय बनाना होता है।
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई किसी दल की नहीं, पूरे देश की लड़ाई है। इसलिए यह लड़ाई केवल कठोर कानूनों से नहीं जीती जा सकती। इसे निष्पक्ष जांच, मजबूत अभियोजन और समयबद्ध न्याय से ही जीता जा सकता है। अगर इन तीनों में संतुलन नहीं होगा, तो कानून का डर तो पैदा हो सकता है, लेकिन कानून पर भरोसा नहीं।
मुद्दे की बात सिर्फ़ इतनी है कि देश को ऐसी ईडी चाहिए, जिसके छापों से अपराधी डरें और जिसके मुकदमों पर अदालतें भरोसा करें। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में जांच एजेंसी की असली सफलता गिरफ्तारियों की संख्या नहीं, अदालत में सिद्ध हुए अपराधों की संख्या होती है। छापे सुर्खियां बना सकते हैं, लेकिन न्याय केवल अदालत का फैसला ही स्थापित करता है। और जिस दिन किसी जांच एजेंसी की पहचान उसके अधिकारों से ज्यादा उसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता से होने लगेगी, उसी दिन माना जाएगा कि कानून सचमुच मजबूत हुआ है l जिससे सिर्फ़ उसकी ताकत ही नहीं बल्कि उसकी साख भी बढ़ी है ।

