
केरल सरकार ने दक्षिणी भारत के राज्यों के लिए माध्यमिक शिक्षा सुधार पर पहली क्षेत्रीय परामर्श बैठक
तिरुवनंतपुरम, 31 अक्टूबर 2025: यूनिसेफ ने केरल सरकार के सहयोग से आज दक्षिणी क्षेत्रीय परामर्श बैठक का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य माध्यमिक शिक्षा में सुधार लाना है। इस बैठक में केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, नागरिक समाज संगठन, शिक्षाविद, दानदाता, विकास साझेदार, शिक्षक और छात्र शामिल हुए। प्रतिभागियों ने माध्यमिक शिक्षा को सभी छात्रों के लिए अधिक सुलभ और गुणवत्तापूर्ण बनाने के उपायों पर विचार-विमर्श किया।
माध्यमिक शिक्षा किशोरों को जीवन, कार्य और नागरिकता के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यद्यपि भारत ने प्राथमिक शिक्षा में लगभग सार्वभौमिक नामांकन प्राप्त कर लिया है, लेकिन 14 से 17 वर्ष के केवल चार में से तीन किशोर ही स्कूलों में दाखिला लेते हैं, और यह अनुपात राज्यों में भिन्न है। गरीब, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों में यह दर और भी कम है। वर्ष 2024-25 में देशभर में कुल 28 लाख बच्चों ने उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में प्रवेश नहीं लिया। दक्षिण भारत की स्थिति यह दर्शाती है कि स्कूल जाना हमेशा सीखने की गारंटी नहीं देता। यद्यपि यह क्षेत्र नामांकन और उच्चतर माध्यमिक स्तर में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय औसत से आगे है, फिर भी सीखने के परिणाम निम्न बने हुए हैं, तथा कक्षा 9 के विद्यार्थी सभी विषयों में औसतन केवल 38 से 56 प्रतिशत अंक प्राप्त कर पाते हैं।
बैठक में बोलते हुए केरल सरकार के जनरल एजुकेशन मिनिस्टर माननीय वी. शिवनकुट्टी ने इन अंतरालों को पाटने के महत्व पर बल देते हुए कहा, “केरल की मानव विकास और शिक्षा में सफलता का आधार एक सरल सिद्धांत है — हर बच्चे को, चाहे वह कोई भी हो या कहीं से भी आता हो, सीखने और सफल होने का अवसर मिलना चाहिए। माध्यमिक शिक्षा एक युवा के जीवन में निर्णायक मोड़ होती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे स्कूल संसाधनों से भरपूर, समावेशी और भविष्य के लिए किशोरों को तैयार करने में सक्षम हों।”
यूनिसेफ सरकार के साथ मिलकर चल रहे माध्यमिक शिक्षा सुधारों का समर्थन कर रहा है ताकि हर किशोर को समान रूप से लाभ मिल सके, विशेष रूप से लड़कियों, दिव्यांग बच्चों और हाशिए पर या दूरदराज़ के समुदायों से आने वाले बच्चों को।
यूनिसेफ इंडिया की शिक्षा प्रमुख डॉ. साधना पांडे ने कहा, “भारत के 16.5 करोड़ किशोरों के लिए माध्यमिक शिक्षा में पर्याप्त और समान निवेश करना, भारत के भविष्य में निवेश करना है। शोध से पता चलता है कि माध्यमिक शिक्षा पूरी करने से बाल विवाह, किशोरावस्था में गर्भधारण और बाल श्रम का जोखिम कम होता है, साथ ही सामाजिक लाभ 10 प्रतिशत से अधिक होते हैं और प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष की पढ़ाई से आय में 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है।”
माध्यमिक शिक्षा सुधार प्रक्रिया का उद्देश्य प्रणालीगत परिवर्तन के माध्यम से इन लाभों को प्राप्त करना है। परामर्श बैठक में प्रतिभागियों ने चार प्रमुख क्षेत्रों में साक्ष्य-आधारित समाधान और नवाचारों के प्रति साझा प्रतिबद्धता जताई: योजना और लक्षित वित्तपोषण के लिए डेटा का उपयोग; सुरक्षित और समावेशी स्कूल अवसंरचना का विस्तार; शिक्षकों की क्षमता को निरंतर व्यावसायिक विकास और बेहतर प्रबंधन के माध्यम से सुदृढ़ करना; और 21वीं सदी के कौशलों को विकसित करने के लिए पाठ्यक्रम, सामग्री और अधिगम मार्गों का डिज़ाइन।
इन प्रतिबद्धताओं से माध्यमिक शिक्षा सुधार के लिए एक समग्र दृष्टिकोण तैयार होता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि परिवर्तन प्रणालीगत और टिकाऊ हों। यूनिसेफ केरल और तमिलनाडु कार्यालय के प्रमुख के. एल. राव ने कहा, “जब शिक्षा प्रणालियाँ सुशासित और पर्याप्त रूप से वित्तपोषित होती हैं, तो हर बच्चा उद्देश्यपूर्ण रूप से स्कूली शिक्षा पूरी कर सकता है — सीखने, कमाने और समाज व अर्थव्यवस्था में सार्थक योगदान देने के लिए तैयार।”
बैठक में यह दोहराया गया कि सभी के लिए समान माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए पूरे समाज की साझेदारी आवश्यक है, जिसमें सरकार, निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत और नागरिक समाज की भागीदारी हो। दक्षिणी राज्यों ने दिखाया है कि इस तरह का सहयोग समावेशी, कौशल-आधारित शिक्षा को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकता है। केरल की तकनीक-सक्षम कक्षाओं, सामुदायिक भागीदारी और शिक्षक सशक्तिकरण की सफलता को दोहराने योग्य मॉडल के रूप में मान्यता दी गई है। शिक्षा मंत्रालय और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी के माध्यम से, यूनिसेफ ऐसे समाधानों को सुदृढ़ करने और विस्तार देने के प्रयासों का समर्थन करता रहेगा।
