
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की शक्तियों की सीमा तय कर दी है। आयोग अदालत नहीं है। वह जांच कर सकता है, दस्तावेज मांग सकता है, गवाही और साक्ष्य ले सकता है, किसी शिकायत पर अपनी राय बना सकता है, सरकार को सलाह दे सकता है और सिफारिश कर सकता है, लेकिन अदालत की तरह किसी पक्ष के अधिकारों पर बाध्यकारी फैसला नहीं सुना सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला कानून की दृष्टि से स्पष्ट है। लेकिन लोकतंत्र की दृष्टि से इसके बाद एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है कि
अगर आयोग अदालत नहीं है तो सरकार क्या है?
क्या सरकार आयोग की सिफारिश को भी सिर्फ एक कागज मानकर रख सकती है? यही इस फैसले का असली मुद्दा है।
राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग कोई सामान्य सरकारी समिति नहीं है। यह संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत बना संवैधानिक निकाय है। उसे अनुसूचित जातियों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की रक्षा से जुड़े मामलों की जांच करने और राष्ट्रपति को रिपोर्ट देने का दायित्व सौंपा गया है। यानी संविधान ने उसे सिर्फ सजावटी संस्था बनाकर नहीं रखा है।
लेकिन संविधान ने यह भी नहीं कहा कि आयोग अदालत की तरह दो पक्षों के बीच विवाद का अंतिम फैसला कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी सीमा को स्पष्ट किया है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि आयोग की भूमिका सलाह और सिफारिश देने की है, न्यायिक निर्णय देने की नहीं। उसके पास जांच के लिए सिविल कोर्ट जैसी कुछ प्रक्रियात्मक शक्तियां हो सकती हैं, लेकिन इससे वह अदालत या ट्रिब्यूनल नहीं बन जाता। यह फर्क समझना जरूरी है।
जांच करने की शक्ति और फैसला सुनाने की शक्ति एक चीज नहीं है।
आयोग किसी पीड़ित की शिकायत सुन सकता है। संबंधित विभाग से रिकॉर्ड मांग सकता है। अधिकारियों को बुला सकता है। तथ्यों की पड़ताल कर सकता है। यह देख सकता है कि अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन हुआ या नहीं। लेकिन अंत में वह यह आदेश नहीं दे सकता कि अमुक व्यक्ति को नौकरी वापस दी जाए, अमुक अधिकारी को दंडित किया जाए या किसी पक्ष का अधिकार अंतिम रूप से तय हो गया।
यह काम अदालत का है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी वजह से आयोग की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि उसके अधिकारों में “सुरक्षा” शब्द शामिल है, इसलिए उसे कानून लागू कराने की शक्ति भी मिल जाती है। अदालत ने कहा कि ऐसा अर्थ निकालना आयोग को वह न्यायिक शक्ति देना होगा जो संविधान ने उसे दी ही नहीं है। यहां तक तो मामला साफ है। लेकिन अब सवाल सरकार का है।
मान लीजिए आयोग किसी मामले की महीनों जांच करता है। पीड़ित की शिकायत सही पाता है। दस्तावेज जुटाता है। संबंधित विभाग से जवाब मांगता है और अंततः सरकार को सिफारिश करता है कि पीड़ित के साथ न्याय किया जाए।
सरकार कह दे कि “सिफारिश थी, हमने नहीं मानी।” क्या मामला खत्म?
नहीं।
यहीं लोकतांत्रिक जवाबदेही शुरू होती है।
अगर आयोग की सिफारिश अदालत का आदेश नहीं है तो उसका अर्थ यह भी नहीं हो सकता कि सरकार उसे पढ़े बिना कूड़ेदान में डाल दे। संवैधानिक संस्था की सिफारिश को न मानने का अधिकार सरकार के पास हो सकता है, लेकिन उससे यह सवाल खत्म नहीं होता कि क्यों नहीं मानी?
सरकार को कारण बताना चाहिए। क्योंकि आयोग की शक्ति को न्यायिक शक्ति नहीं बनाने का अर्थ यह नहीं कि सरकार की जवाबदेही खत्म हो गई।
बल्कि उल्टा है कि जितनी बाध्यकारी शक्ति आयोग के पास नहीं है, उतनी ही अधिक पारदर्शिता सरकार के पास होनी चाहिए।
यही बात अनुसूचित जातियों के अधिकारों से आगे भी जाती है।
देश में अलग-अलग वर्गों और समुदायों के अधिकारों की निगरानी के लिए संवैधानिक और वैधानिक आयोग बने हुए हैं। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जैसे निकाय अलग-अलग कानूनों और संवैधानिक प्रावधानों के तहत काम करते हैं। इस फैसले का असर इन संस्थाओं की शक्तियों की व्याख्या पर भी बहस को प्रभावित कर सकता है, हालांकि हर आयोग की कानूनी संरचना और अधिकार अलग-
अलग हैं। और यही वह जगह है जहां हमें आयोगों की उपयोगिता पर गंभीर बहस करनी चाहिए।
अगर किसी आयोग को पीड़ित की शिकायत पर जांच का अधिकार दिया गया है, लेकिन उसके निष्कर्ष को लागू कराने की शक्ति नहीं है तो फिर उसकी सिफारिशों का क्या होगा? अगर सरकारें उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं हैं तो क्या हर सिफारिश के साथ सरकार को लिखित कारण बताना अनिवार्य नहीं होना चाहिए? अगर आयोग की रिपोर्ट संसद या राष्ट्रपति के सामने रखी जाती है तो क्या संसद को यह नहीं पूछना चाहिए कि सरकार ने आयोग की कितनी सिफारिशें मानीं और कितनी खारिज कीं?
और सबसे महत्वपूर्ण कि
अगर सरकार ने सिफारिश नहीं मानी तो उसने क्यों नहीं मानी? यही असली मुद्दे की बात है।
क्योंकि संविधान ने आयोगों को इसलिए नहीं बनाया कि वे पीड़ितों को एक और दरवाजा दिखाकर वापस भेज दें। आयोगों का मकसद उन लोगों की आवाज को संस्थागत ताकत देना है जिनकी आवाज अक्सर सत्ता और प्रशासन के गलियारों में दब जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने आयोगों को अदालत बनने से रोक दिया है। ठीक है।
लेकिन अब संसद और सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आयोग बेअसर संस्था न बन जाएं।
यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।
अदालत का विकल्प आयोग नहीं है। लेकिन आयोग भी महज सिफारिशों का डाकघर नहीं हो सकता।
उसके पास जांच की शक्ति है तो उसकी जांच गंभीर होनी चाहिए। उसे रिपोर्ट देने का अधिकार है तो रिपोर्ट सार्वजनिक महत्व की होनी चाहिए। उसे सरकार को सिफारिश देने का अधिकार है तो सरकार को उस सिफारिश पर जवाबदेह होना चाहिए।
वरना गरीब, दलित, आदिवासी, महिला, अल्पसंख्यक या किसी भी कमजोर वर्ग का वह नागरिक, जो न्याय की उम्मीद में आयोग के पास पहुंचता है, आखिर जाएगा कहां?
अदालत में जाने की अपनी लागत है। मुकदमे वर्षों चलते हैं। आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए न्याय तक पहुंच आसान नहीं है। ऐसे में संवैधानिक आयोगों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है।
लेकिन आयोग अगर आदेश नहीं दे सकता तो सरकार के पास एक बड़ा नैतिक और लोकतांत्रिक दायित्व है। सिफारिश को मानिए या ठुकराइए l लेकिन जवाब दीजिए।
यही वह बिंदु है जिस पर संसद को कानून और प्रक्रिया को और मजबूत करना चाहिए।
हर संवैधानिक आयोग की सिफारिश पर सरकार की समयबद्ध प्रतिक्रिया हो। स्वीकार की तो क्या कार्रवाई हुई, बताइए। अस्वीकार की तो कारण बताइए। लंबित है तो कब तक निर्णय होगा, बताइए।
ताकि आयोग की रिपोर्ट अलमारी में बंद होकर धूल न खाती रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आयोग की सीमा तय की है। अब लोकतंत्र की बारी है कि वह आयोग की प्रासंगिकता और सरकार की जवाबदेही की सीमा तय करे। क्योंकि न्याय सिर्फ अदालत के आदेश का नाम नहीं है। न्याय का पहला कदम है कि किसी पीड़ित की बात सुनी जाए।
दूसरा कदम है यह है कि उसकी शिकायत की निष्पक्ष जांच हो।
तीसरा कदम है कि जिम्मेदार संस्था अपनी बात सरकार के सामने रखे।
और चौथा कदम है कि सरकार बताए कि उसने क्या किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आयोग अदालत नहीं है।
अब सरकार को भी यह बताना चाहिए कि क्या आयोग की सिफारिश उसके लिए सिर्फ सलाह है, या लोकतंत्र में जवाबदेही की शुरुआत? क्योंकि अदालत आदेश देती है।
आयोग सच सामने लाता है।

