
पुस्तक समीक्षा
समीक्षक : रितेश सिन्हा
पुस्तक का नाम : धर्म, अधर्म और इंसान
लेखक : कुलदीप वशिष्ठ
संपादक : रिजवान रज़ा
पृष्ठ : 160
प्रकाशक : पाइसेज बुक्स, लखनऊ।
साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं होता, बल्कि वह समाज को आईना दिखाने, स्थापित मान्यताओं पर सवाल उठाने और मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करने का सशक्त माध्यम भी है। लेखक कुलदीप वशिष्ठ की पुस्तक ‘धर्म, अधर्म और इंसान’ इसी वैचारिक परंपरा की एक उल्लेखनीय कृति के रूप में सामने आती है। 160 पृष्ठों की इस पुस्तक में तीन नाटकों को शामिल किया गया है।

इन तीनों नाटकों की विषयवस्तु भले ही अलग-अलग है, लेकिन इनके केंद्र में एक साझा प्रश्न मौजूद है—मनुष्य के जीवन में धर्म, सिद्धांत, नैतिकता और परिस्थितियों की वास्तविक भूमिका क्या है? पुस्तक का शीर्षक भी इसी प्रश्न को व्यापक अर्थ प्रदान करता है। लेखक ने पौराणिक आख्यानों से लेकर आधुनिक जीवन की जटिलताओं तक की यात्रा करते हुए यह समझने का प्रयास किया है कि मनुष्य का आचरण केवल उसके विचारों से निर्धारित नहीं होता, बल्कि परिस्थितियां भी उसके निर्णयों को प्रभावित करती हैं।
पुस्तक का पहला नाटक ‘रावण दहन के बाद’ विशेष रूप से समकालीन संदर्भों में रामायण की प्रासंगिकता पर विचार करने का अवसर देता है। सामान्यतः विजयादशमी पर रावण दहन को बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। हर वर्ष रावण का पुतला जलता है, उत्सव मनाया जाता है और समाज स्वयं को धर्म तथा सत्य के पक्ष में खड़ा हुआ मानता है। लेकिन क्या रावण का पुतला जला देने मात्र से समाज में अधर्म समाप्त हो जाता है? क्या बुराई केवल किसी पौराणिक पात्र में समाहित थी, या उसके कुछ रूप आज भी हमारे सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में मौजूद हैं? यह नाटक ऐसे ही प्रश्नों को वैचारिक विमर्श का आधार बनाता है।
राम और रावण के चरित्रों के माध्यम से सत्य, असत्य, मर्यादा, सत्ता, अहंकार और नैतिकता के प्रश्नों पर विचार करने की गुंजाइश पैदा होती है। आज जब व्यक्ति और समाज दोनों ही अनेक प्रकार के नैतिक द्वंद्वों से गुजर रहे हैं, तब रामायण के आदर्शों का वास्तविक अर्थ समझना और उन्हें अपने व्यवहार में उतारना अधिक आवश्यक हो जाता है। नाटक पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि रावण दहन की सार्थकता तभी है, जब मनुष्य अपने भीतर मौजूद अहंकार, अन्याय और नकारात्मक प्रवृत्तियों को भी समाप्त करने का प्रयास करे।
पुस्तक का दूसरा नाटक ‘ब्रह्मऋषि विश्वामित्र’ भारतीय पौराणिक और आध्यात्मिक परंपरा के दो अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्वों—महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र—के बीच के वैचारिक तथा व्यक्तित्वगत द्वंद्व को सामने लाता है। दोनों ही महान तपस्वी, विद्वान और ऋषि परंपरा के प्रतिष्ठित नाम हैं। उनके बीच का संघर्ष केवल दो व्यक्तियों के बीच प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा नहीं है। इसके भीतर अहंकार, आत्मसम्मान, तपस्या, साधना, ज्ञान और आध्यात्मिक उपलब्धि जैसे गंभीर विषय समाहित हैं।
विश्वामित्र का राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनने तक का संघर्ष भारतीय पौराणिक आख्यानों में आत्मपरिवर्तन और साधना का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। दूसरी ओर महर्षि वशिष्ठ का व्यक्तित्व ज्ञान, धैर्य और आध्यात्मिक स्थिरता का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों चरित्रों के माध्यम से लेखक यह प्रश्न उठाने का अवसर देते हैं कि वास्तविक श्रेष्ठता किसमें है—शक्ति में, पद में, प्रतिष्ठा में, तप और जप में अथवा आत्मसंयम में? क्या केवल कठोर तपस्या से व्यक्ति महान बन जाता है, या उसके भीतर से अहंकार का समाप्त होना भी उतना ही आवश्यक है?
मनुष्य की वास्तविक परीक्षा उसके व्यवहार, धैर्य और आत्मबोध में होती है। वशिष्ठ और विश्वामित्र का द्वंद्व इस मायने में आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक समाज में भी ज्ञान और पद, योग्यता और प्रतिष्ठा तथा आत्मसम्मान और अहंकार के बीच का अंतर कई बार धुंधला पड़ जाता है। इस नाटक का महत्व इसी बात में है कि वह पौराणिक पात्रों के माध्यम से मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष को समझने की दृष्टि देता है।
पुस्तक का तीसरा नाटक ‘नॉक नॉक’ अपने विषय और संवेदनात्मक धरातल पर पहले दोनों नाटकों से अलग है। जहां शुरुआती दो नाटक पौराणिक पात्रों और आध्यात्मिक विमर्श के सहारे जीवन के बड़े प्रश्नों को सामने रखते हैं, वहीं ‘नॉक नॉक’ आधुनिक मनुष्य की व्यक्तिगत परिस्थितियों, विवशताओं और नैतिक संघर्षों की पड़ताल करता है। इस नाटक में अध्यात्म, सिद्धांत, व्यक्तिगत निर्णय और जीवन की कठोर वास्तविकताओं के बीच फंसे व्यक्ति का संघर्ष दिखाई देता है।
इसकी कथावस्तु में एक ओर जीवन के प्रति आदर्शवादी दृष्टिकोण और नैतिक सिद्धांत हैं, तो दूसरी ओर ऐसी परिस्थितियां हैं, जहां व्यक्ति के सामने अपने अस्तित्व और परिवार की जिम्मेदारियों को बचाने का प्रश्न खड़ा हो जाता है। मां के जीवन को बचाने की जद्दोजहद इस संघर्ष को अत्यंत संवेदनशील बना देती है। जब किसी व्यक्ति के सामने अपने प्रियजन का जीवन बचाने का सवाल हो और साधन सीमित हों, तब उसके सिद्धांतों और व्यवहार के बीच कैसी टकराहट पैदा होती है? क्या मजबूरी में किया गया गलत कार्य भी उतना ही दोषपूर्ण है, जितना स्वार्थ या लालच में किया गया अपराध? चोरी और आत्महत्या जैसे गंभीर विषयों के संदर्भ में यह नाटक जीवन की जटिलताओं और मानवीय मनःस्थिति को समझने का अवसर देता है।
यहां लेखक के सामने चुनौती केवल किसी व्यक्ति के गलत निर्णय को प्रस्तुत करने की नहीं, बल्कि उस परिस्थिति को समझने की है, जिसने उसे उस मोड़ तक पहुंचाया। किसी भी समाज में अपराध को उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन अपराध के पीछे मौजूद सामाजिक, आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती। इसी संवेदनशील अंतर को समझना इस नाटक की वैचारिक उपयोगिता है। यह पाठक को दूसरों के निर्णयों पर तत्काल फैसला सुनाने के बजाय उनके पीछे छिपे संघर्षों को समझने की प्रेरणा देता है।
इन तीनों नाटकों को एक साथ पढ़ने पर पुस्तक की वैचारिक संरचना अधिक स्पष्ट होती है। ‘रावण दहन के बाद’ समाज और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से नैतिकता का प्रश्न उठाता है। ‘ब्रह्मऋषि विश्वामित्र’ साधना, अहंकार और आत्मपरिवर्तन की पड़ताल करता है, जबकि ‘नॉक नॉक’ मनुष्य की व्यक्तिगत विवशताओं और सिद्धांतों के बीच संघर्ष को सामने लाता है। इस प्रकार पुस्तक का विस्तार पौराणिक चेतना से आधुनिक सामाजिक यथार्थ तक दिखाई देता है।
इस पुस्तक के प्रकाशन के पीछे की सोच भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। साहित्य और नाट्य जगत का एक दौर ऐसा रहा है, जब स्थापित और प्रतिष्ठित लेखकों तथा बड़े नाटककारों को ही प्रकाशन, मंचन और साहित्यिक विमर्श में अधिक स्थान मिलता था। उनकी रचनाओं को व्यापक मंच और पाठकीय पहचान मिलती थी, जबकि छोटे शहरों, कस्बों और नई पीढ़ी के अनेक प्रतिभाशाली लेखकों के लिए अपनी रचनात्मक क्षमता प्रदर्शित करने के अवसर सीमित रहते थे। कई बार अच्छी संभावनाओं और मौलिक विचारों के बावजूद नए लेखक उचित मंच और प्रोत्साहन के अभाव में साहित्य की मुख्यधारा तक नहीं पहुंच पाते थे।
ऐसे परिवेश में नए लेखकों को अवसर देना, उनकी रचनाओं को प्रकाशित करना और उन्हें पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास अपने आप में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पहल है। ‘धर्म, अधर्म और इंसान’ के पीछे भी यही सकारात्मक उद्देश्य दिखाई देता है। इस पुस्तक का मकसद केवल तीन नाटकों को एक जिल्द में संकलित करना नहीं, बल्कि नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करना और उन्हें अपनी अभिव्यक्ति के लिए मंच उपलब्ध कराना भी है। लेखक कुलदीप वशिष्ठ और संपादक रिजवान रज़ा ने इस दिशा में जो पहल की है, वह सराहनीय है। उनका यह प्रयास साहित्यिक दुनिया में नए रचनाकारों के लिए संभावनाओं के द्वार खोलने की कोशिश है। इसे केवल एक पुस्तक के प्रकाशन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि नए लेखकों को पहचान, अवसर और प्रोत्साहन देने वाला एक सार्थक भागीरथ प्रयास माना जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, ‘धर्म, अधर्म और इंसान’ केवल तीन नाटकों का संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन, उसके विश्वास, उसके अहंकार और उसकी विवशताओं को समझने का एक साहित्यिक प्रयास है। इस पुस्तक को पढ़ने, समझने और उस पर विचार करने की सार्थक वजह है। नए लेखकों को प्रोत्साहित करने की भावना इसे एक साहित्यिक संकलन से आगे ले जाकर रचनात्मक अवसरों के विस्तार की पहल के रूप में भी स्थापित करती है।

