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गुरु की पहचान,,,,,
एक बार नारदजी, देवताओं की बड़ी बैठक में बिन बुलाये जा पहुंचे, लेकिन वहाँ क्या देखते हैं, उनके बैठने के लिए विशेष प्रबंध नहीं किया, लक्ष्मी जी सभी देवताओं के बैठने का इंतजाम कर रही थी,, स्थान सजाया जा रहा था,
अपना उचित स्थान न देखकर नारद जी विष्णु जी के पास पहुंचे और अपना गुस्सा जाहिर कर कहा की में तीनो लोको में कभी भी कहीं भी आजा सकता हूँ, लेकिन देवताओं की बैठक की मुझे सुचना नहीं, वही मेरे बैठने का भी उचित प्रबंध लक्ष्मी जी ने नहीं किया, तब विष्णु जी ने नारद जी से कहा इसका जवाब आपको लक्ष्मी जी ही दें सकती हैं, उनका जवाब पाने नारद जी लक्ष्मी जी के पास गए और अपनी समस्या बताई, तब लक्ष्मी जी ने नारद जी से कहा की आप का अभी तक कोई गुरु नहीं हैं जब तक आप किसी को भी गुरु नहीं बना लेते मान लेते तब तक आप किसी भी समाज के समक्ष,उचित बैठक मे बैठने के लायक नहीं, अब आप किसी को भी गुरू बनाये और तभी आप के लिए स्थान मिलेगा, तब नारद जी भागे भागे वापस विष्णु जी के पास गए और पूछ किसको गुरु बनाऊ , तब विष्णु जी ने उन्हें ब्रह्ममा जी के पास भेजा वो वहां गए और उनसे सभी बातो को विस्तार से बताया, तब ब्रह्ममा जी ने उन्हें कहा की आप तड़के सुबह सबसे पहले उठ कर नदी किनारे जाना और जो सबसे पहले नजर आये उसके पैर पकड़ लेना उसी को अपना गुरु मान लेना, बस फिर क्या नारद जी की बेचैनी बढ़ गयी सुबह उठ कर चल दिए, तभी उनकी नजर एक मछवारे पर पड़ी जो जाल लेकर मछली पकड़ने नदी की और जा रहा था, नारद जी को ब्रह्ममा जी की बात याद आयी, लेकिन वो तो एक मछवारा था, सोच में पड़ गए फिर भी ब्रह्ममा जी की बात मान कर मछवारे का पैर पकड़ कर उन्हें अपना गुरु मान लेने और गुरु आशीर्वाद देने के लिए आग्रह किया, गुरु दक्षिणा में मछवारे को कहा किया दें सकता हूँ तब मछवारे ने कहा में आपका गुरु बनने लायक नहीं हूँ, में गरीब मछवारा हूँ ब्राह्मण भी नहीं, ज्ञानी भी नहीं, लाचार हूँ, लेकिन नारद जी नहीं माने और उनको अपना गुरु मान कर नाम देने का आशीर्वाद माँगा, तभी वहां कुछ ऐसा हुआ की नदी की मछलीया अपने आप ऊपर आ गयी और जाल में फस गयी, तभी नारद जी ने उन्हें पहचान कर कहा की आप अपने असली रूप में आओ, तभी विष्णु जी अपने मूल रूप में आ गए और नारद जी का गुरु बन आशीर्वाद दिया,
तब सभी समस्या का समाधान नारद जी का होने लगा,
जब भी कोई गंभीर समस्या नारद जी के सामने आती वो गुरु के रूप में विष्णु जी को याद करते हो समस्या का हाल हो जाता,,
तो सभी से निवेदन हैं अपना गुरु जरूर बनाओं कोई भी और कैसा भी हो, लेकिन उनका अनादर नहीं करना, उनकी बातों को पत्थर की लकीर मानना, चाहे आपका कितना बड़ा नुकसान उससे हो, लेकिन अतः सफलता आपके कदम चूमेगी
गुरु गोविन्द दोउ खडे काके लागू पाँव, बली हरी गुरु आप के गोविन्द दियो मिलाओ,

लेखक बन्सी लाल, वरिष्ठ सम्पादक,,

