

मध्य प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में दांव पर एक सीट है, लेकिन चर्चा एक सीट की नहीं हो रही। चर्चा राहुल गांधी की हो रही है।
यह सुनने में अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन राजनीति में कई बार छोटे चुनाव बड़े नेताओं का कद तय कर देते हैं। कई बार एक सीट का परिणाम पूरे संगठन की असलियत उजागर कर देता है। मध्य प्रदेश में वही होने जा रहा है।
गणित कहता है कि कांग्रेस को चिंता नहीं होनी चाहिए। उसके पास 63 विधायक हैं। जीत के लिए 58 वोट चाहिए। यानी पांच वोट अतिरिक्त हैं। सामान्य परिस्थितियों में यह चुनाव खबर भी नहीं बनना चाहिए था। उम्मीदवार का नाम घोषित होता, मतदान होता और परिणाम आ जाता।
लेकिन यह कांग्रेस है।
इसलिए चुनाव से पहले ही सवाल उठने लगे हैं। भाजपा ने उम्मीदवार क्यों उतारा?
उसे अतिरिक्त वोट कहां से मिलने की उम्मीद है? क्या भाजपा को अंकगणित नहीं आती? या फिर उसे कांग्रेस की राजनीति अंकगणित से ज्यादा अच्छी तरह समझ आती है? सच तो यह है कि भाजपा का उम्मीदवार मैदान में उतरना कांग्रेस पर सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य है।
यह संदेश है कि भाजपा को अपनी ताकत से ज्यादा कांग्रेस की कमजोरी पर भरोसा है। और दुर्भाग्य यह है कि यह भरोसा हवा में पैदा नहीं हुआ। हरियाणा में क्या हुआ था? हिमाचल प्रदेश में क्या हुआ था? बिहार में क्या हुआ था?ओडिशा में क्या हुआ था?

कितनी बार कांग्रेस ने संख्या होने के बावजूद राजनीतिक शर्मिंदगी झेली है? कितनी बार उसके विधायक पार्टी लाइन से हटे हैं? कितनी बार उसके नेता कैमरों के सामने निष्ठा और बंद कमरों में सौदेबाजी करते पकड़े गए हैं? इतनी बार कि अब क्रॉस वोटिंग खबर नहीं रही, कांग्रेस की स्थायी बीमारी बन चुकी है। यही इस चुनाव का असली मुद्दा है।
मुद्दा यह नहीं है कि भाजपा का उम्मीदवार जीतेगा या हारेगा। मुद्दा यह है कि क्या कांग्रेस आज भी अपने ही विधायकों पर भरोसा कर सकती है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी अपनी ही पार्टी पर नियंत्रण रखते हैं?
देश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी की भूमिका बदली है। कभी उन्हें केवल कांग्रेस नेता माना जाता था। आज विपक्ष का एक बड़ा वर्ग उन्हें भाजपा के मुकाबले राष्ट्रीय चेहरा मानता है। इंडिया गठबंधन के भीतर भी कई दल उन्हें स्वाभाविक नेता के रूप में देखने लगे हैं।
लेकिन राजनीति का एक निर्मम नियम है। जो व्यक्ति अपने को घर का मुखिया साबित नहीं कर सकता, वह मोहल्ले का नेता नहीं बन सकता। जो अपनी पार्टी को अनुशासित नहीं रख सकता, वह देश को वैकल्पिक नेतृत्व देने का दावा नहीं कर सकता। यही कारण है कि मध्य प्रदेश का यह चुनाव राहुल गांधी के लिए राजनीतिक परीक्षा बन गया है। बताया जा रहा है कि उम्मीदवारों के चयन में राहुल गांधी की निर्णायक भूमिका रही। यदि ऐसा है तो अब यह केवल उम्मीदवार की लड़ाई नहीं रही। अब यह राहुल गांधी के निर्णय की लड़ाई है।
और यहीं सबसे कठिन सवाल खड़ा होता है।
क्या कांग्रेस में आज कोई ऐसा नेता है जिसकी बात अंतिम मानी जाती हो?
कभी कांग्रेस में हाईकमान शब्द का अर्थ ही आदेश होता था। मुख्यमंत्री से लेकर विधायक तक जानते थे कि अंतिम निर्णय क्या है। सहमति हो या असहमति, आदेश का पालन होता था।
आज स्थिति उलट दिखाई देती है। राज्यों में गुट हैं।
गुटों के भीतर उपगुट हैं।
हर नेता का अपना शक्ति केंद्र है। हर शक्ति केंद्र का अपना राजनीतिक एजेंडा है।
और जब पार्टी का निर्णय निजी महत्वाकांक्षाओं से टकराता है तो अनुशासन सबसे पहले बलि चढ़ता है।
यही कारण है कि कांग्रेस का संकट चुनावी नहीं, संगठनात्मक है।
कांग्रेस भाजपा से इसलिए नहीं हार रही कि भाजपा के पास केवल बेहतर चुनावी मशीनरी है। कांग्रेस इसलिए भी हार रही है क्योंकि उसके भीतर नेतृत्व का भय, अनुशासन का दबाव और संगठनात्मक जवाबदेही लगातार कमजोर हुई है।
राजनीति में प्रेम से पार्टी चल सकती है, लेकिन केवल प्रेम से पार्टी बचती नहीं कभी-कभी नेतृत्व को कठोर भी होना पड़ता है। यहीं राहुल गांधी की सबसे बड़ी चुनौती है। यदि कोई विधायक क्रॉस वोट करता है तो कार्रवाई केवल उस विधायक पर क्यों? उस नेता पर क्यों नहीं जिसके संरक्षण में वह राजनीति करता है?
उस गुट पर क्यों नहीं जो पर्दे के पीछे खेल खड़ा करता है?
सच तो यह है कि कांग्रेस में वर्षों से बीमारी का इलाज नहीं हुआ, केवल लक्षणों पर मरहम लगाया गया। यही वजह है कि बीमारी पुरानी होती गई। राहुल गांधी यदि वास्तव में कांग्रेस को पुनर्जीवित करना चाहते हैं तो उन्हें एक संदेश देना होगा वह भी स्पष्ट, सार्वजनिक और निर्विवाद। पार्टी विरोधी गतिविधि की कीमत चुकानी पड़ेगी।जो जाएगा, वह जाएगा। जो भेजेगा, वह भी जाएगा। राजनीति में अनुशासन भाषणों से नहीं आता। अनुशासन कार्रवाई से आता है। आज इंडिया गठबंधन राहुल गांधी को उम्मीद की निगाह से देख रहा है। भाजपा के खिलाफ सबसे मुखर चेहरा होने का लाभ उन्हें मिला है। लेकिन विपक्ष का नेता बनने और संगठन का नेता बनने में जमीन-आसमान का अंतर है। विपक्ष का नेता भाषणों से बन सकता है। संगठन का नेता फैसलों से बनता है।
मध्य प्रदेश का यह चुनाव राहुल गांधी को वही अवसर दे रहा है। यदि कांग्रेस का एक भी वोट नहीं टूटता, यदि पूरा संगठन एकजुट दिखाई देता है, यदि परिणाम बिना किसी नाटक के आता है, तो यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस में नेतृत्व की पकड़ मजबूत हो रही है। लेकिन यदि फिर वही पुरानी कहानी दोहराई कि
यदि फिर विधायक रास्ता बदलते हैं, यदि फिर संख्या होने के बावजूद संशय बना रहता हैl यदि फिर कांग्रेस अपने ही घर में मात खाती दिखाई देती हैl तो सवाल भाजपा पर नहीं उठेंगे।
सवाल राहुल गांधी पर उठेंगे।
क्योंकि तब देश पूछेगा कि जिस नेता की बात उसके अपने विधायक नहीं मानते, उसकी बात देश क्यों माने?
इसलिए मध्य प्रदेश में दांव पर केवल एक राज्यसभा सीट नहीं लगी है। दांव पर राहुल गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता है। दांव पर कांग्रेस का संगठनात्मक भविष्य है। दांव पर विपक्ष की नेतृत्व संरचना है। और सबसे बढ़कर दांव पर यह सवाल है कि क्या कांग्रेस में अब भी कोई ऐसा नेतृत्व मौजूद है जिसकी बात अंतिम मानी जाए। राजनीति में पद मिल सकता है। लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है।
लेकिन अधिकार? अधिकार केवल स्थापित किया जाता है।
मध्य प्रदेश राहुल गांधी को वही अवसर दे रहा है।
अब देखना यह है कि वह इस अवसर का उपयोग करते हैं या एक और बहाना इतिहास के हवाले कर देते हैं।

