मुद्दे की बात :-मजबूत अर्थव्यवस्था का शोर और जनता की डूबती पूंजी:- लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-:आलोक गौड़।


नई दिल्ली l भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा का ताजा बयान केवल एक आर्थिक टिप्पणी नहीं है। वह उस सच्चाई की आधिकारिक स्वीकारोक्ति भी है, जिसे सरकार लगातार उपलब्धियों की चमकदार पैकेजिंग में छिपाने की कोशिश कर रही है।
गवर्नर ने माना है कि वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल है। निवेशक सतर्क हैं। कारोबारी जगत संभलकर चल रहा है। बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। लेकिन साथ ही उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारतीय अर्थव्यवस्था के “फंडामेंटल्स” मजबूत हैं और देश इन चुनौतियों का सामना कर लेगा। यहीं से असली सवाल शुरू होता है। यदि सब कुछ इतना मजबूत है तो फिर यह भरोसा बार-बार दिलाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
यदि अर्थव्यवस्था इतनी ही सुदृढ़ है तो विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकालकर क्यों जा रहे हैं? यदि बाजार केवल वैश्विक कारणों से प्रभावित है तो फिर आम भारतीय निवेशक की पूंजी रोजाना क्यों स्वाहा हो रही है? और सबसे बड़ा सवाल, यदि अर्थव्यवस्था सचमुच मजबूत है तो फिर आम आदमी की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर क्यों होती जा रही है? पिछले एक दशक में देश ने नारों की कोई कमी नहीं देखी। पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था, अमृतकाल, विश्वगुरु, विकसित भारत, तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, वैश्विक नेतृत्व, नई उड़ान, नया भारत। हर कुछ महीनों में एक नया सपना जनता के सामने परोस दिया जाता है।
लेकिन इन सपनों के बीच एक सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है। आखिर आम नागरिक को मिला क्या?
क्या महंगाई कम हुई? क्या रोजगार बढ़े? क्या मध्यम वर्ग पर आर्थिक बोझ घटा?
क्या छोटे कारोबारियों की मुश्किलें कम हुईं? क्या किसानों की आय वास्तव में उस गति से बढ़ी, जिस गति से वादे किए गए थे?


सरकार के समर्थक अक्सर जीडीपी वृद्धि दर का हवाला देते हैं। लेकिन जीडीपी की ऊंचाई और जनता की आर्थिक स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं होती। अगर जीडीपी ही समृद्धि का अंतिम पैमाना होती तो दुनिया में कहीं गरीबी नहीं होती। वास्तविक पैमाना यह है कि नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ। आज देश का युवा डिग्री लेकर नौकरी की तलाश में भटक रहा है। लाखों उम्मीदवार कुछ हजार पदों के लिए आवेदन कर रहे हैं। भर्ती परीक्षाएं वर्षों तक अटकी रहती हैं। परिणाम अदालतों में उलझ जाते हैं। उम्र निकल जाती है और अवसर नहीं आते। दूसरी तरफ महंगाई का ऐसा स्थायी दौर है जिसे अब सामान्य मान लिया गया है। दूध महंगा होता है, गैस महंगी होती है, बिजली महंगी होती है, स्कूल फीस बढ़ती है, इलाज महंगा होता है और फिर सरकार बताती है कि अर्थव्यवस्था मजबूत है।
ऐसा लगता है कि अर्थव्यवस्था और नागरिक अब दो अलग-अलग देशों में रहते हैं। एक देश वह है जो सरकारी विज्ञापनों में दिखाई देता है। दूसरा वह जो राशन, फीस, किराए और किस्तों के बीच संघर्ष करता है।
दिलचस्प बात यह है कि जब कोई सकारात्मक आर्थिक संकेतक आता है तो उसका पूरा श्रेय सरकार लेती है। लेकिन जैसे ही बाजार गिरता है, निवेशक पैसा निकालते हैं, महंगाई बढ़ती है या रोजगार संकट गहराता है, तब दोष वैश्विक परिस्थितियों के सिर मढ़ दिया जाता है।
यानी उपलब्धियां सरकार की और परेशानियां दुनिया की।
यह राजनीति का सबसे सुविधाजनक आर्थिक मॉडल है। लेकिन जनता अब यह अंतर समझने लगी है।
जनता यह भी देख रही है कि शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव का दर्द केवल बड़े निवेशकों तक सीमित नहीं रहा। करोड़ों छोटे निवेशक म्यूचुअल फंड, एसआईपी और शेयरों के माध्यम से बाजार से जुड़े हैं। बाजार की हर गिरावट उनकी बचत, उनके भविष्य और उनके सपनों को प्रभावित करती है। इसलिए जब कोई अधिकारी कहता है कि चिंता की कोई बात नहीं है, तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि आखिर चिंता किसे करनी चाहिए? उसे, जिसकी पूंजी डूब रही है? उसे, जिसकी नौकरी नहीं है? उसे, जिसकी आय स्थिर है लेकिन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं? या उसे, जो वातानुकूलित सभागारों में बैठकर अर्थव्यवस्था की मजबूती के व्याख्यान दे रहा है? देश को आश्वासन से ज्यादा उत्तर चाहिए। उसे यह जानना है कि मजबूत अर्थव्यवस्था का लाभ आखिर उसकी जेब तक कब पहुंचेगा। उसे यह जानना है कि विकास की इस लंबी कहानी में उसका अध्याय कब लिखा जाएगा। और उसे यह भी जानना है कि यदि सब कुछ इतना ही अच्छा है तो फिर जनता की चिंता, बाजार की घबराहट और व्यापार जगत की सावधानी आखिर किस बात का संकेत है। यही मुद्दे की बात है।
अर्थव्यवस्था की असली ताकत सरकारी दावों में नहीं, नागरिक की आर्थिक सुरक्षा में होती है। जब तक आम आदमी की जेब कमजोर है, तब तक मजबूत अर्थव्यवस्था का दावा अधूरा है। और जब दावे और वास्तविकता के बीच की दूरी लगातार बढ़ने लगे, तब सबसे पहले सवाल पूछना जरूरी हो जाता है।

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