मुद्दे की बात :विकास की कीमत जंगल ही क्यों चुकाएं?:-लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-आलोक गौड़

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विकास के नाम पर जंगल काटने की सरकारी नीति अब किसी एक परियोजना या किसी एक राज्य का सवाल नहीं रह गई है। यह उस विकास मॉडल का हिस्सा बन चुकी है जिसमें खनिज संपदा को राष्ट्रीय संसाधन माना जाता है, लेकिन उन जंगलों, नदियों, वन्यजीवों और समुदायों को विकास की कीमत चुकाने के लिए छोड़ दिया जाता है जिनके ऊपर यह विकास खड़ा किया जाता है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिकार प्राप्त समिति ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा में खनन परियोजनाओं के लिए करीब दो हजार हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को सैद्धांतिक मंजूरी देने की सिफारिश की है। तीन प्रमुख कोयला परियोजनाओं के लिए ही 1,737 हेक्टेयर वन भूमि का इस्तेमाल किया जाना है। अकेले ओडिशा की अलकनंदा कोल माइंस परियोजना में 3.30 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की संभावना है।
छत्तीसगढ़ की पुरुंगा भूमिगत कोयला खदान के लिए 621.331 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के साथ 4,368 पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। पेलमा ओपन कास्ट खदान के लिए 362.109 हेक्टेयर वन भूमि का इस्तेमाल होगा और 52,570 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव है। इन परियोजनाओं के लिए कुल वन भूमि का डायवर्जन और पेड़ों की कटाई महज आंकड़े नहीं हैं। ये उन इलाकों के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़े सवाल हैं जिन्हें सरकारी फाइलों में अक्सर केवल परियोजना क्षेत्र के रूप में देखा जाता है।


सरकार का तर्क होगा कि यह अभी केवल स्टेज-1 की सैद्धांतिक मंजूरी है। अंतिम मंजूरी बाद में दी जाएगी और सभी शर्तों का पालन किया जाएगा। यह भी कहा जाएगा कि वन्यजीव प्रबंधन योजनाएं बनाई गई हैं और जहां संभव होगा, पेड़ों का प्रत्यारोपण किया जाएगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी जंगल को केवल पेड़ों की संख्या से समझा जा सकता है?
एक जंगल पेड़ों का समूह नहीं होता। वह एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र होता है। उसमें मिट्टी, पानी, वन्यजीव और मनुष्य एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। एक पेड़ को काटकर उसके बदले दूसरा पौधा लगा देना उस व्यवस्था को वापस नहीं ला सकता जो दशकों में विकसित होती है। इसी तरह किसी परियोजना के लिए वन्यजीव प्रबंधन योजना बना देना उस प्राकृतिक आवास की भरपाई नहीं कर सकता जिसे खनन के लिए नष्ट किया जा रहा है।
सरकारी रिपोर्टें खुद स्वीकार करती हैं कि इन क्षेत्रों में हाथियों और दूसरे वन्यजीवों की आवाजाही होती है। पुरुंगा क्षेत्र में हाथी, एशियाई हाथी, पैंगोलिन, स्लॉथ भालू और भारतीय लोमड़ी जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी या आवाजाही का उल्लेख है। पेलमा में हाथियों की आवाजाही है, हालांकि कोई आधिकारिक हाथी गलियारा मौजूद नहीं है।
यहां एक बुनियादी सवाल है। क्या किसी क्षेत्र को केवल इसलिए वन्यजीवों के लिए सुरक्षित मान लिया जाएगा क्योंकि सरकारी नक्शे पर वहां कोई आधिकारिक गलियारा दर्ज नहीं है? जंगल में रहने वाला हाथी सरकारी अधिसूचना पढ़कर अपना रास्ता तय नहीं करता। प्रकृति की अपनी सीमाएं और रास्ते होते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब विकास की योजनाएं उन्हें कागज पर मिटा देती हैं।
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू आदिवासी और वन-आश्रित समुदायों से जुड़ा है। खनन परियोजनाओं के लिए जमीन और जंगल का इस्तेमाल केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं होता। इससे लोगों की आजीविका, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक जीवन प्रभावित होता है। किसी समुदाय को उसके प्राकृतिक परिवेश से अलग करके केवल मुआवजा दे देना पुनर्वास नहीं है।
मुआवजा जमीन का हो सकता है, लेकिन क्या वह जंगल का हो सकता है? क्या किसी समुदाय की संस्कृति का मूल्य तय किया जा सकता है? क्या पीढ़ियों से चले आ रहे जीवन और संबंधों को किसी सरकारी पैकेज से बदला जा सकता है?
विकास की बहस में अक्सर इन सवालों को भावनात्मक कहकर किनारे कर दिया जाता है। लेकिन यह भावनात्मक नहीं, बल्कि नीतिगत सवाल है। यदि किसी परियोजना का लाभ राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा और उसकी कीमत किसी खास क्षेत्र के लोगों को विस्थापन, प्रदूषण और पर्यावरणीय क्षति के रूप में चुकानी होगी, तो यह तय होना चाहिए कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी वास्तविक भागीदारी कितनी है।
हसदेव अरण्य का उदाहरण सामने है। वहां भी कोयले की जरूरत के नाम पर बड़े पैमाने पर वन भूमि के डायवर्जन और पेड़ों की कटाई का रास्ता खोला गया है। सरकार कह सकती है कि पेड़ों की कटाई चरणबद्ध तरीके से होगी। लेकिन पर्यावरणीय नुकसान को टुकड़ों में बांट देने से उसका असर कम नहीं हो जाता।
एक लाख पेड़ एक साथ काटे जाएं या दस साल में काटे जाएं, जंगल के लिए सवाल पेड़ों की कटाई की गति का नहीं, उसके अंतिम परिणाम का है।
वास्तविक समस्या यह है कि देश की ऊर्जा नीति और पर्यावरण नीति के बीच अभी भी गंभीर असंतुलन है। सरकार एक तरफ हरित ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की प्रतिबद्धता जताती है, दूसरी तरफ कोयले की बढ़ती जरूरतों के लिए लगातार वन क्षेत्रों को खनन के लिए उपलब्ध कराती है। यह विरोधाभास तब तक बना रहेगा जब तक विकास को केवल उत्पादन, राजस्व और आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों से मापने की प्रवृत्ति नहीं बदलेगी।
भारत को ऊर्जा चाहिए। उद्योगों को खनिज चाहिए। रोजगार और आर्थिक विकास भी आवश्यक हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार विकास के लिए वही क्षेत्र चुने जाएंगे जहां जंगल हैं, आदिवासी रहते हैं और जिनकी राजनीतिक आवाज अपेक्षाकृत कमजोर है?
यदि जवाब हां है, तो यह विकास का सवाल नहीं, विकास के न्याय का सवाल है।
वन भूमि के डायवर्जन की पूरी प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। स्टेज-1 की सैद्धांतिक मंजूरी के बाद शर्तों का पालन, फिर अंतिम केंद्रीय मंजूरी और उसके बाद राज्य सरकार का अंतिम आदेश। कागज पर यह प्रक्रिया संतुलित और नियंत्रित दिखाई देती है। लेकिन वास्तविक सवाल यह है कि क्या अंतिम निर्णय से पहले पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का आकलन वास्तव में उतनी गंभीरता से किया जाता है जितनी गंभीरता से परियोजना की आर्थिक उपयोगिता का?
किसी परियोजना की आर्थिक लागत का विस्तृत हिसाब लगाया जाता है। खनिज का मूल्य तय किया जाता है। उत्पादन का अनुमान लगाया जाता है। राजस्व और रोजगार की गणना होती है। लेकिन जंगल के नष्ट होने की वास्तविक लागत कितनी है? भूजल पर असर की कीमत क्या है? वन्यजीवों के आवास के नष्ट होने का मूल्य क्या है? विस्थापित समुदाय की सामाजिक क्षति का मूल्यांकन कैसे होगा?
इन सवालों के जवाब के बिना विकास का पूरा हिसाब अधूरा है।
आज जंगल काटकर कोयला निकाला जाएगा। कल उसी कोयले से पैदा होने वाले प्रदूषण और जलवायु संकट से निपटने के लिए योजनाएं बनाई जाएंगी। पहले पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया जाएगा और फिर उसके दुष्परिणामों से बचने के लिए सार्वजनिक धन खर्च किया जाएगा। यह नीति दूरदर्शी विकास नहीं, बल्कि एक ऐसा चक्र है जिसमें नुकसान पहले होता है और सुधार की कोशिश बाद में।
विकास जरूरी है, लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि प्रकृति को लगातार उपभोग की वस्तु मान लिया जाए। जंगलों को केवल खनिजों के ऊपर पड़ी हुई जमीन समझना खतरनाक है। वे जलवायु, जल स्रोत, जैव विविधता और मानव जीवन की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं।
सरकारों को यह तय करना होगा कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी मानने की नीति कब तक चलेगी। यदि कोयले की जरूरत है तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, ऊर्जा दक्षता और दीर्घकालिक संक्रमण की स्पष्ट नीति भी होनी चाहिए। यदि वन भूमि का डायवर्जन अपरिहार्य बताया जाता है तो यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए कि उस निर्णय की पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत कौन चुकाएगा।
क्योंकि विकास का अर्थ केवल यह नहीं है कि आज कितने टन कोयला निकाला गया और कितने करोड़ रुपये का राजस्व मिला। विकास का अर्थ यह भी है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना जंगल बचा, कितनी नदियां बचीं और कितने लोगों को उनके घर और जीवन से बेदखल नहीं किया गया।
अगर विकास के नाम पर जंगल कटते रहें, लाखों पेड़ गिरते रहें, वन्यजीवों के आवास नष्ट होते रहें और आदिवासी समुदाय विस्थापित होते रहें, तो सरकार को यह सवाल सुनना ही होगा कि
विकास की कीमत जंगल ही क्यों चुकाएं?

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