
देश में प्रश्नपत्र लीक होना अब कोई असाधारण घटना नहीं रह गई है। यह शिक्षा व्यवस्था का ऐसा स्थायी संकट बन चुका है, जिसके सामने सरकारें हर बार जांच, कार्रवाई और सख्त कानून का भरोसा देती हैं, लेकिन छात्रों और उनके परिवारों को यह भरोसा नहीं दे पातीं कि अगली परीक्षा का प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा। सवाल यह है कि जब सरकार परीक्षा कराने की जिम्मेदारी लेती है, तो प्रश्नपत्र लीक होने की जिम्मेदारी कौन लेगा?
देश के हजारों छात्र और अभिभावक सोमवार को इसी सवाल के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुटे। संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा था और संसद से कुछ ही दूरी पर शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर प्रदर्शन हो रहा था। आइसा के छात्र नेता 22 दिनों से भूख हड़ताल पर थे। उनका वजन 12 प्रतिशत से अधिक कम हो चुका था और ब्लड शुगर खतरनाक स्तर तक गिर गया था। इसके बावजूद उन्हें अपना अनशन समाप्त करने से पहले यह भरोसा लेना पड़ा कि उनकी आवाज संसद तक पहुंचाई जाएगी।

यह स्थिति अपने आप में लोकतंत्र और शासन व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर सवाल है।
जिस देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र अपने जीवन के कई वर्ष लगा देते हैं, उनके परिवार अपनी जमा पूंजी खर्च कर देते हैं और लाखों युवा एक परीक्षा को अपने भविष्य का आधार मानते हैं, वहां प्रश्नपत्र लीक होना केवल परीक्षा की गड़बड़ी नहीं है। यह उनके साथ किया गया गंभीर अन्याय है।
एक प्रश्नपत्र लीक होता है तो परीक्षा रद्द हो जाती है। परीक्षा रद्द होती है तो लाखों छात्रों का एक साल बर्बाद होता है। कई छात्रों की उम्र ऐसी होती है कि वे अगली परीक्षा में बैठने की पात्रता खो देते हैं। जिन परिवारों ने कोचिंग और तैयारी पर पैसा खर्च किया है, उनके लिए यह आर्थिक नुकसान भी है। और सबसे बड़ा नुकसान उस मानसिक दबाव का है, जिसका कोई हिसाब सरकार के पास नहीं होता।
लेकिन सरकार के पास हर बार एक ही जवाब होता है कि जांच चल रही है।
जांच कब पूरी होगी, इसका जवाब नहीं। दोषियों को सजा कब मिलेगी, इसका जवाब नहीं। अगली परीक्षा सुरक्षित होगी, इसकी गारंटी नहीं। और जिन छात्रों का भविष्य इस पूरी अव्यवस्था के कारण प्रभावित हुआ, उनकी भरपाई कैसे होगी, इसका तो सवाल ही नहीं।
सवाल यह है कि क्या सरकार परीक्षा को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया मानती है? क्या उसके लिए प्रश्नपत्र तैयार करना, परीक्षा कराना और परिणाम घोषित करना ही पूरी जिम्मेदारी है? या परीक्षा की गोपनीयता और विश्वसनीयता की रक्षा करना भी सरकार की जिम्मेदारी है?
यदि है, तो फिर प्रश्नपत्र लीक होने के बाद जिम्मेदारी तय क्यों नहीं होती?
हर बार किसी छोटे कर्मचारी, किसी निजी एजेंसी या किसी स्थानीय अधिकारी को दोषी बताकर क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती है? परीक्षा व्यवस्था एक पूरी श्रृंखला है। प्रश्नपत्र तैयार होता है। उसे छापा जाता है। सुरक्षित रखा जाता है। परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाया जाता है। लाखों छात्रों के बीच परीक्षा होती है। इस पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की होती है। यदि इस श्रृंखला की किसी भी कड़ी में सेंध लगती है तो केवल उस व्यक्ति की गलती नहीं होती जिसने प्रश्नपत्र लीक किया। यह पूरी व्यवस्था की विफलता होती है।
और व्यवस्था की विफलता की जिम्मेदारी व्यवस्था चलाने वालों की होती है।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है। क्या किसी परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के बाद संबंधित मंत्री को जवाब नहीं देना चाहिए?
क्या संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए?
क्या छात्रों को केवल यह कह देना पर्याप्त है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा? 1दोषियों को सजा मिलनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन उससे पहले यह भी तय होना चाहिए कि इतनी बड़ी गड़बड़ी हुई कैसे। क्योंकि किसी भी व्यवस्था में केवल अपराधी को पकड़ लेना पर्याप्त नहीं होता। यह भी देखना पड़ता है कि अपराध संभव कैसे हुआ।
दुर्भाग्य यह है कि सरकारें प्रश्नपत्र लीक होने के बाद अपराधी खोजने में तो सक्रिय दिखाई देती हैं, लेकिन व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वीकार करने में पीछे हट जाती हैं।
यही कारण है कि छात्रों का गुस्सा बढ़ रहा है।
यह गुस्सा किसी एक परीक्षा का नहीं है। यह उस असुरक्षा का है जिसमें छात्र हर परीक्षा से पहले यह सोचने को मजबूर है कि कहीं प्रश्नपत्र लीक तो नहीं होगा। वह मेहनत कर रहा है, लेकिन उसे परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा नहीं है। वह पढ़ रहा है, लेकिन उसे यह डर है कि कहीं किसी और की मिलीभगत उसकी पूरी मेहनत को बेकार न कर दे।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि देश युवाओं से मेहनत करने को कहता है, लेकिन उन्हें यह भरोसा नहीं दे पाता कि उनकी मेहनत का मूल्यांकन ईमानदारी से होगा।
सरकारें युवाओं को स्टार्टअप, रोजगार और आत्मनिर्भरता के सपने दिखाती हैं। लेकिन उन सपनों की पहली सीढ़ी ही यदि परीक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार और लापरवाही से टूट जाए तो युवा किस भरोसे आगे बढ़े?
छात्रों का सवाल केवल यह नहीं है कि प्रश्नपत्र लीक करने वालों को सजा मिले। उनका सवाल यह भी है कि पूरी व्यवस्था में इतनी बड़ी सेंध बार-बार क्यों लगती है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रश्नपत्र लीक होने का असर केवल परीक्षा देने वाले छात्रों तक सीमित नहीं रहता। जब किसी परीक्षा की विश्वसनीयता खत्म होती है तो पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। जो छात्र ईमानदारी से परीक्षा देता है, उसे यह संदेह सताता है कि कहीं वह उन लोगों से मुकाबला तो नहीं कर रहा जिनके पास पहले से प्रश्नपत्र पहुंच चुका है।
ऐसी स्थिति में मेहनत और योग्यता का अर्थ ही बदल जाता है।
फिर सफलता प्रतिभा से नहीं, व्यवस्था तक पहुंच से तय होने लगती है।
और यही किसी भी देश के लिए सबसे खतरनाक स्थिति है।
सोनम वांगचुक का अनशन इसी व्यापक संकट की ओर ध्यान खींचता है। उनकी मांग है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था की विफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकार करे और प्रश्नपत्र लीक जैसे मामलों को संसद में गंभीरता से उठाया जाए। यह मांग किसी राजनीतिक दल के लिए असुविधाजनक हो सकती है, लेकिन देश के छात्रों के लिए यह जीवन-मरण का सवाल है सरकार को यह समझना होगा कि छात्रों को केवल भावनात्मक भाषणों और आश्वासनों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उन्हें पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। उन्हें समयबद्ध जांच चाहिए। उन्हें दोषियों के खिलाफ कार्रवाई चाहिए। और सबसे बढ़कर उन्हें यह भरोसा चाहिए कि अगली परीक्षा में उनके साथ फिर धोखा नहीं होगा।
इस भरोसे के बिना कोई भी परीक्षा निष्पक्ष नहीं हो सकती।
सरकारें अक्सर कहती हैं कि प्रश्नपत्र लीक करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। लेकिन कड़ी कार्रवाई का अर्थ केवल गिरफ्तारियां नहीं है। कड़ी कार्रवाई का अर्थ यह भी है कि व्यवस्था में मौजूद उन लोगों की जिम्मेदारी तय हो जो सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
यदि एक बार प्रश्नपत्र लीक होता है तो यह अपराध है।
यदि बार-बार प्रश्नपत्र लीक होते हैं तो यह व्यवस्था की बीमारी है। और बीमारी का इलाज केवल कुछ लोगों को गिरफ्तार करने से नहीं होता।
सरकार को यह भी बताना होगा कि वह परीक्षा व्यवस्था को सुरक्षित बनाने के लिए क्या कर रही है। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परीक्षा परिणाम घोषित होने तक पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? निजी एजेंसियों की भूमिका क्या है? डेटा और प्रश्नपत्र की सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं? परीक्षा केंद्रों की निगरानी कैसे होती है? शिकायतों की जांच कितने समय में पूरी होती है?
इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए।
क्योंकि परीक्षा व्यवस्था में भरोसा सरकार का उपकार नहीं, उसकी जिम्मेदारी है।
सोमवार को दिल्ली में हजारों छात्र और अभिभावक इसी भरोसे की मांग कर रहे थे। कुछ छात्र 22 दिन से भूख हड़ताल पर थे। उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा था। फिर भी उन्हें अपनी आवाज सुनाने के लिए सड़क पर बैठना पड़ा।
यह लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है।
सरकार को यह समझना होगा कि हर आंदोलन को राजनीतिक चश्मे से देखने की आदत खतरनाक है। हर विरोधी आवाज किसी राजनीतिक दल की आवाज नहीं होती। हर प्रदर्शन सत्ता को अस्थिर करने की साजिश नहीं होता। कभी-कभी छात्र सिर्फ छात्र होते हैं। अभिभावक सिर्फ अभिभावक होते हैं। और उनकी मांग सिर्फ इतनी होती है कि उनके बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो।
बच्चों का भविष्य किसी परीक्षा बोर्ड, किसी विभाग या किसी ठेकेदार की लापरवाही का शिकार नहीं हो सकता।
सरकार यदि देश के युवाओं से ईमानदारी की उम्मीद करती है तो उसे भी परीक्षा व्यवस्था में ईमानदारी सुनिश्चित करनी होगी। यदि वह छात्रों से मेहनत की उम्मीद करती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी मेहनत किसी प्रश्नपत्र लीक की भेंट न चढ़े।
क्योंकि प्रश्नपत्र लीक होने से केवल परीक्षा नहीं टूटती। भरोसा टूटता है।
और जब युवाओं का व्यवस्था से भरोसा टूटता है तो उसका असर बहुत दूर तक जाता है। आज सवाल यह नहीं है कि अगला प्रश्नपत्र लीक होगा या नहीं।
सवाल यह है कि सरकार ऐसी व्यवस्था कब बनाएगी जिसमें प्रश्नपत्र लीक होने की गुंजाइश ही न रहे?
सवाल यह है कि बच्चों के भविष्य की कीमत कौन चुकाएगा?
और सवाल यह भी है कि जब बार-बार बच्चों का भविष्य लीक हो रहा है, तो सरकार जवाब कब देगी?

