दुनिया में होने वाली हर दस सिकल सेल बर्थ में से एक भारत में होती है। इसलिए डॉक्टर समय पर स्क्रीनिंग, जेनेटिक काउंसलिंग और इलाज पर जोर देते हैं ताकि इस बीमारी के भार को कम किया जा सके।

कुलवंत कौर की रिपोर्ट :-


जीवन भर की तकलीफ से राहत: वर्ल्ड सिकल सेल डे के अवसर पर अपोलो हॉस्पिटल्स ने 200 से अधिक सिकल सेल ट्रांसप्लांट किए।

नई दिल्ली, :-17 जून, 2026: वर्ल्ड सिकल सेल डे के अवसर पर इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स, नई दिल्ली ने सिकल सेल डिजीज की रोकथाम, निदान और इलाज पर जोर दिया। यह भारत में पाई जाने वाली सबसे आम अनुवांशिक खून की बीमारियों में से एक है।

डॉ. गौरव खार्या, क्लिनिकल लीड, सेंटर फॉर बोन मैरो ट्रांसप्लांट एंड सेलुलर थेरेपी, सीनियर कंसल्टैंट, पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी एवं इम्युनोलॉजी, इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स सिकल सेल डिजीज के लिए 215 से अधिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट कर चुके हैं। यह इस बीमारी के इलाज में दुनिया के सबसे बड़े सिंगल-सेंटर अनुभवों में से एक है।

सिकल सेल डिजीज एक अनुवांशिक रोग है, जो रेड ब्लड सेल की संरचना और काम में गड़बड़ी पैदा कर देता है। इसकी वजह से गंभीर एनेमिया, बार-बार दर्द, संक्रमण, अंगों के खराब होने, स्ट्रोक या आयु घटने का खतरा होता है। यह बीमारी भारत में मध्य, पश्चिमी और आदिवासी इलाकों तथा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गुजरात, ओडिशा और राजस्थान जैसे राज्यों में फैली है।

आँकड़ों के मुताबिक, दुनिया में हर साल लगभग 300,000 से 400,000 बच्चे सिकल सेल रोग के साथ जन्म लेते हैं, जिनमें भारत में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या लगभग 10 से 13 प्रतिशत है। यह रोग जनस्वास्थ्य की एक बड़ी समस्या है, जिससे लाखों लोग प्रभावित हैं। इसकी वजह से परिवारों पर काफी ज्यादा सामाजिक, भावनात्मक और आर्थिक बोझ पड़ता है।

हालाँकि मेडिकल साईंस ने सर्वाईवल की प्रतिशत और जीवन में सुधार लाया है। पर इसके लिए समय पर परीक्षण काफी महत्वपूर्ण होता है। सिकल सेल रोग के मरीजों को स्थायी क्षति से बचाने और दीर्घकालिक नतीजों में सुधार करने के लिए तुरंत इलाज बहुत जरूरी है।

इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में मरीजों को प्राप्त हुए बेहतर परिणाम समय पर जाँच और विशेषज्ञ इलाज का महत्व प्रदर्शित करते हैं। ऐसा ही एक मामला तब सामने आया, जब पाँच साल की बच्ची भव्या को इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल लाया गया था। उसे बचपन से ही गंभीर सिकल सेल रोग था, जिसकी वजह से बार-बार उसे इतना तेज दर्द उठता था कि उसे हॉस्पिटल लाना पड़ता था। यह बच्ची बचपन से ही ब्लड ट्रांसफ्यूज़न पर निर्भर थी। उसकी गंभीर हालत को देखते हुए डॉ. गौरव खार्या और उनकी मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने हैप्लो-आईडेंटिकल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट करके उसका इलाज किया। इस प्रक्रिया में उसकी बहन आंशिक मैच्ड डोनर बनी। ऑपरेशन के बाद भाव्या पूरी तरह से स्वस्थ हो गई। उसे कोई बड़ी समस्या नहीं हुई और उसे बार-बार होने वाले ब्लड ट्रांसफ्यूज़न से छुटकारा मिल गया।

ऐसा ही एक मामला 23 साल की महिला का है, जिसे 10 साल की उम्र से सिकल सेल रोग था। उसकी छोटी रक्तनलिकाओं में खून का बहाव अवरुद्ध हो जाता था, जिसकी वजह से उसे बार-बार एक्यूट चेस्ट सिंड्रोम के साथ तेज दर्द का दौरा पड़ता था। लंबे समय तक इस बीमारी का कष्ट झेलने के बाद इस महिला ने अपने भाई-बहनों में मैंचिंग डोनर की मदद से स्टेम सेल ट्रांसप्लांट कराया, जिसके बाद वो स्वस्थ हो गईं और उन्हें अब कोई बड़ी समस्या नहीं है।

डॉ. गौरव खार्या, क्लिनिकल लीड, सेंटर फॉर बोन मैरो ट्रांसप्लांट एंड सेलुलर थेरेपी, सीनियर कंसल्टैंट, पीडियाट्रिक हेमेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी एवं इम्युनोलॉजी, इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स ने कहा, ‘‘भारत में सिकल सेल डिजीज और खून की अन्य अनुवांशिक बीमारियों का काफी बोझ है। इससे हर साल हजारों परिवार प्रभावित होते हैं। ट्रांसप्लांट की तकनीकों और सपोर्टिव केयर में हुई प्रगति ने बड़ी संख्या में मरीजों के लिए इलाज संभव बना दिया है। लेकिन रोकथाम भी उतनी ही जरूरी है। नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग, कैरियर डिटेक्शन, जेनेटिक काउंसलिंग और समय पर विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए रिफर करके स्थिति को गंभीर होने से रोका जा सकता है। इससे इलाज के नतीजों में सुधार होता है और इन बीमारियों का दीर्घकालिक भार कम करने में मदद मिलती है।

डॉ. खार्या और उनकी मल्टीडिसिप्लिनरी टीम ने पिछले दशक में सिकल सेल रोग के लिए न केवल भारत के, बल्कि अफ्रीका, मिडिल ईस्ट और एशिया के कई अन्य देशों के मरीजों का इलाज किया है।

भारत में सिकल सेल एनेमिया को खत्म करने के मिशन 2047 के अंतर्गत इस बीमारी पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया गया है। आदिवासी और वंचित समुदायों में यह बीमारी एक बड़ी आबादी को प्रभावित करती आई है, फिर भी इसको नजरंदाज किया जाता रहा है। हैल्थकेयर विशेषज्ञों का मानना है कि नवजात शिशुओं के स्क्रीनिंग प्रोग्राम में इसको शामिल करने से समय पर जेनेटिक काउंसलिंग उपलब्ध हो सकेगी। देश से इस बीमारी को खत्म करने के लिए विशेषज्ञ ट्रीटमेंट सेंटर्स उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है।

विशेषज्ञों के मुताबिक जैसे-जैसे रिसर्च आगे बढ़ रही है और इलाज के विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं, वैसे-वैसे भारत में सिकल सेल डिजीज की रोकथाम, समय पर निदान और इलाज इसे खत्म करने के सबसे प्रभावशाली तरीके बनते जा रहे हैं, जो हजारों बच्चों और परिवारों के जीवन को बेहतर बना रहे हैं।

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