

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत क्या है? चुनाव? संसद? संविधान? निस्संदेह यह सब महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन सबसे पहले एक चीज आती है l सवाल पूछने का अधिकार। क्योंकि जिस दिन जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, उसी दिन सत्ता जवाब देना छोड़ देती है। और जिस दिन सत्ता जवाब देना छोड़ दे, उस दिन लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था बनकर रह जाता है, उसकी आत्मा मरने लगती है।
दुर्भाग्य से आज देश में एक नई राजनीतिक संस्कृति विकसित होती दिखाई दे रही है। किसी भी सार्वजनिक संस्था, योजना, निर्णय या फंड के बारे में सवाल पूछिए, जवाब कम और आपकी नीयत पर बहस ज्यादा होने लगती है। तथ्य पीछे छूट जाते हैं और आरोप आगे निकल जाते हैं। जवाबदेही की मांग करने वाला व्यक्ति अचानक संदेह के घेरे में आ जाता है। उससे पूछा जाता है कि तुम्हारे पीछे कौन है? तुम्हारा एजेंडा क्या है? तुम यह सवाल क्यों पूछ रहे हो?
और जब तर्कों का भंडार खत्म हो जाता है, तब एक वाक्य उछाल दिया जाता है”अरे, ये पैसा कहां लेकर जाएंगे?” सुनने में यह एक साधारण प्रतिक्रिया लग सकती है, लेकिन दरअसल यही हमारे समय का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संकट है। क्योंकि यह वाक्य सवाल का जवाब नहीं देता, बल्कि सवाल को ही अवैध ठहराने की कोशिश करता है। जैसे जनता को यह अधिकार ही नहीं कि वह पूछ सके कि उसके नाम पर जुटाया गया धन कहां गया, कैसे खर्च हुआ और उसका हिसाब कौन रखता है।

कोरोना महामारी का वह भयावह दौर अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है। लोग अस्पतालों के बाहर लाइन में खड़े थे। ऑक्सीजन के लिए सोशल मीडिया पर गुहार लगा रहे थे। परिवार अपने प्रियजनों को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे थे। उस समय देश से सहयोग की अपील की गई। लोगों ने भरोसा किया। करोड़ों रुपये दान दिए गए। किसी ने अपनी बचत से योगदान दिया, किसी ने वेतन का हिस्सा दिया, किसी ने अपनी कंपनी के माध्यम से सहयोग किया। सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों, सरकारी संस्थानों और आम नागरिकों ने भी हाथ बढ़ाया। उस समय किसी ने हिसाब नहीं मांगा। क्योंकि संकट के समय विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होता है। लेकिन क्या विश्वास का अर्थ यह है कि बाद में कोई सवाल भी न पूछा जाए? क्या लोकतंत्र में जनता का काम केवल पैसा देना और ताली बजाना है?
क्या नागरिक का अधिकार मतदान केंद्र तक सीमित है?
यदि किसी व्यवस्था में जनता से योगदान लिया जाता है, यदि उसका संबंध सार्वजनिक जीवन से है, यदि उसमें सरकारी संस्थाओं की भागीदारी है, यदि उसके नाम के साथ देश की सर्वोच्च राजनीतिक प्रतिष्ठा जुड़ी है, तो यह पूछना पूरी तरह स्वाभाविक है कि उसकी जवाबदेही किसके प्रति है।
दरअसल समस्या सवालों में नहीं है। समस्या जवाबदेही से असहज होती राजनीति में है।
आज देश में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिसमें प्रश्न पूछना ही अपराध जैसा प्रतीत होने लगा है। सरकार से सवाल पूछिए तो आपको विपक्षी बता दिया जाएगा। किसी नीति पर सवाल उठाइए तो आपको विकास विरोधी कहा जाएगा। किसी संस्था की पारदर्शिता पर चर्चा कीजिए तो आपकी देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांगा जाएगा। यह प्रवृत्ति केवल किसी एक सरकार या एक दल का प्रश्न नहीं है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण का प्रश्न है। लोकतंत्र में सत्ता की विश्वसनीयता उसके समर्थकों की तालियों से नहीं, बल्कि आलोचकों के सवालों का सामना करने की क्षमता से तय होती है। कोई भी सरकार, संस्था या नेतृत्व यह कह सकता है कि उसने कोई गलती नहीं की। लेकिन लोकतंत्र का सिद्धांत यह है कि इस दावे की पुष्टि स्वतंत्र जांच, पारदर्शी व्यवस्था और सार्वजनिक निगरानी से होगी, न कि केवल सत्ता के बयान से। यही कारण है कि दुनिया के विकसित लोकतंत्रों में सार्वजनिक महत्व की संस्थाओं को अधिक पारदर्शी बनाया जाता है। वहां जानकारी छिपाने को मजबूती नहीं, कमजोरी माना जाता है। वहां यह समझा जाता है कि जनता का विश्वास आदेश से नहीं, पारदर्शिता से अर्जित होता है।
हमारे यहां अक्सर स्थिति उलटी दिखाई देती है। यहां जानकारी मांगने वाला कठघरे में होता है और जानकारी रोकने वाला राष्ट्रहित की दुहाई देता है। यहां जवाब देने की जगह भावनाएं परोसी जाती हैं। यहां तथ्यों की जगह नारे खड़े कर दिए जाते हैं। लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज में यह स्थिति खतरनाक है। क्योंकि आज यदि जनता यह पूछने का अधिकार खो देती है कि सार्वजनिक धन कहां और कैसे खर्च हुआ, तो कल वह यह पूछने का अधिकार भी खो देगी कि कोई नीति क्यों बनाई गई, कोई फैसला कैसे लिया गया या किसी संस्था को विशेष अधिकार क्यों दिए गए।
लोकतंत्र धीरे-धीरे खत्म नहीं होता। वह पहले सवालों से असहज होता है, फिर सवाल पूछने वालों को बदनाम करता है, उसके बाद सवाल पूछने की संस्कृति को ही संदिग्ध बना देता है। यही कारण है कि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में प्रश्न पूछने वाले नागरिक को समस्या नहीं, संपत्ति माना जाता है।
जनता का सवाल सरकार का अपमान नहीं होता।
जनता का सवाल लोकतंत्र का सम्मान होता है।
हिसाब मांगना अविश्वास नहीं होता। हिसाब मांगना विश्वास को मजबूत करने का माध्यम होता है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो पारदर्शिता से भय कैसा? यदि सब कुछ सही है तो स्वतंत्र जांच से परेशानी क्यों? यदि कोई गड़बड़ी नहीं है तो जानकारी सार्वजनिक करने में संकोच किस बात का? इन सवालों का उत्तर नारे नहीं दे सकते। इनका उत्तर केवल तथ्य दे सकते हैं।
इसलिए जब अगली बार कोई कहे कि “यह पैसा कहां लेकर जाएंगे?”, तो उससे विनम्रता से कहिए कि मुद्दा पैसा लेकर जाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि पैसा गया कहां। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार केवल वोट डालना नहीं होता, बल्कि वोट देने के बाद भी सत्ता से सवाल पूछते रहने का अधिकार होता है। और याद रखिए, जिस दिन हिसाब मांगने वालों को देशद्रोही और जवाब मांगने वालों को दुश्मन घोषित किया जाने लगे, उस दिन खतरा केवल किसी व्यक्ति या संस्था को नहीं होता है l उस दिन खतरा लोकतंत्र को होता है।

