

किसी देश की परीक्षा व्यवस्था की असली ताकत क्या होती है?प्रश्नपत्र की सुरक्षा? परीक्षा केंद्रों पर पुलिस का पहरा? इंटरनेट पर निगरानी? या फिर छात्रों और अभिभावकों का वह भरोसा कि जो परीक्षा होने जा रही है, वह निष्पक्ष होगी और उसका परिणाम केवल योग्यता से तय होगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नीट-यूजी की दोबारा परीक्षा से पहले देश एक असामान्य स्थिति का गवाह बन रहा है। एक तरफ टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगा दी गई है। मैसेज एडिटिंग जैसे फीचर्स पर अंकुश लगाया गया है। दूसरी तरफ परीक्षा की सुरक्षा के लिए अभूतपूर्व इंतजाम किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर सेना और अर्धसैनिक बलों की सहायता लेने की बात कही जा रही है। प्रश्नपत्रों की आवाजाही से लेकर परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षा का ऐसा घेरा बनाया जा रहा है मानो देश किसी बड़े सुरक्षा अभियान की तैयारी कर रहा हो।
यह सब देखकर एक सामान्य नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा करा रहे हैं या कोई राष्ट्रीय सुरक्षा अभियान चला रहे हैं?

सरकार का पक्ष भी समझा जा सकता है। पिछले वर्षों में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, जांच एजेंसियों की छापेमारी और अदालतों में चल रही बहसों ने परीक्षा प्रणाली की साख को गहरा नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में सरकार किसी भी कीमत पर यह संदेश देना चाहती है कि इस बार कोई चूक नहीं होगी।
लेकिन यहीं से असली बहस शुरू होती है। क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि सरकार क्या कर रही है। यह भी देखना पड़ता है कि उसे ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। नीट कोई साधारण परीक्षा नहीं है। यह लाखों युवाओं के सपनों का प्रवेश द्वार है। कोई छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर वर्षों तैयारी करता है। कोई किसान अपने बेटे को कोचिंग दिलाने के लिए कर्ज लेता है। कोई परिवार अपनी बचत खत्म कर देता है। लाखों घरों में यह परीक्षा केवल एक टेस्ट नहीं, जीवन की दिशा तय करने वाला अवसर होती है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परीक्षा का नाम आते ही छात्रों को सबसे पहले पाठ्यक्रम नहीं, विवाद याद आने लगे हैं। पेपर लीक, जांच, गिरफ्तारी, पुनर्परीक्षा, अदालत, राजनीतिl यह शब्द अब लगभग हर बड़ी परीक्षा के साथ जुड़ने लगे हैं। यह संकट केवल नीट तक सीमित नहीं है। देश ने भर्ती परीक्षा के पेपर लीक होते देखे हैं। शिक्षक भर्ती से लेकर पुलिस भर्ती तक सवाल उठे हैं। विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षाएं विवादों में आई हैं। अनेक राज्यों में युवाओं ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किए हैं। अदालतों को दखल देना पड़ा है। जांच एजेंसियों को सक्रिय होना पड़ा है। यानी समस्या किसी एक परीक्षा, किसी एक संस्था या किसी एक सरकार की नहीं है। समस्या कहीं ज्यादा गहरी है।
यही कारण है कि आज जब सरकार टेलीग्राम पर रोक लगाती है तो बहस केवल एक ऐप की नहीं रह जाती। सवाल यह उठता है कि आखिर हमारी परीक्षा प्रणाली को बचाने के लिए इतने असाधारण उपायों की जरूरत क्यों पड़ रही है?
कहा जा रहा है कि टेलीग्राम पर ऐसे संदेश फैलाए जाते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि प्रश्नपत्र पहले से उपलब्ध था। यह भी कहा जा रहा है कि मैसेज एडिटिंग फीचर का इस्तेमाल करके बाद में सबूत गढ़े जाते हैं। संभव है कि कुछ मामलों में ऐसा हुआ भी हो।
लेकिन एक प्रश्न यहां भी है।
यदि व्यवस्था पर जनता का भरोसा मजबूत हो तो क्या किसी एडिटेड मैसेज की इतनी ताकत होती है कि वह पूरे परीक्षा तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दे? सच्चाई यह है कि अफवाहें वहां सबसे तेजी से फैलती हैं जहां विश्वास कमजोर हो चुका हो।
जब लोगों को व्यवस्था पर भरोसा होता है तो झूठ टिक नहीं पाता। लेकिन जब विश्वास दरकने लगता है तो सच और झूठ दोनों एक साथ दौड़ने लगते हैं। आज देश का युवा इसी संकट से गुजर रहा है। वह केवल परीक्षा नहीं दे रहा, वह व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी परख रहा है। विडंबना देखिए।
एक ओर भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करता है। हम डिजिटल क्रांति की बात करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीकी प्रगति की चर्चा करते हैं। हम दुनिया को बताते हैं कि भारत ज्ञान और प्रतिभा की महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है। लेकिन दूसरी ओर एक प्रवेश परीक्षा को निष्पक्ष ढंग से कराने के लिए मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर रोक लगानी पड़ती है, संचार पर निगरानी रखनी पड़ती है और सुरक्षा के असाधारण इंतजाम करने पड़ते हैं। यह विरोधाभास असहज करने वाला है।
किसी भी राष्ट्र की ताकत केवल उसकी सेना, उसकी अर्थव्यवस्था या उसकी तकनीक से नहीं मापी जाती। उसकी ताकत इस बात से भी मापी जाती है कि उसके नागरिक उसकी संस्थाओं पर कितना भरोसा करते हैं।
और यदि करोड़ों युवाओं के भविष्य का फैसला करने वाली परीक्षा बार-बार संदेह के घेरे में आ जाए तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं रहती। यह राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि पेपर लीक केवल कानूनी अपराध नहीं है। यह सामाजिक अन्याय भी है।
एक छात्र जो वर्षों तक मेहनत करता है, वह केवल सीट नहीं खोता। वह व्यवस्था पर भरोसा भी खोता है।
उसके मन में यह सवाल पैदा होता है कि क्या ईमानदार परिश्रम वास्तव में पर्याप्त है?
और किसी भी समाज के लिए इससे बड़ा खतरा दूसरा नहीं हो सकता। क्योंकि जब मेहनत का मूल्य घटता है तो निराशा बढ़ती है।
जब निराशा बढ़ती है तो व्यवस्था पर विश्वास घटता है। और जब विश्वास घटता है तो लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी कमजोर पड़ने लगती है।
सरकार को परीक्षा की सुरक्षा सुनिश्चित करनी ही चाहिए। यदि टेलीग्राम पर रोक आवश्यक है तो वह भी लगाए। यदि अतिरिक्त सुरक्षा बलों की जरूरत है तो उनका भी उपयोग करे। लेकिन इन कदमों को समाधान नहीं, आपातकालीन व्यवस्था के रूप में देखना चाहिए।
समाधान कहीं और है।
समाधान उस तंत्र को मजबूत करने में है जहां से प्रश्नपत्र बाहर निकलता है। समाधान जवाबदेही तय करने में है।
समाधान दोषियों को ऐसी सजा देने में है जो उदाहरण बने। समाधान पारदर्शिता बढ़ाने में है। और सबसे बढ़कर समाधान विश्वास बहाल करने में है।
मुद्दे की बात यह है कि 22 जून के बाद टेलीग्राम फिर खुल जाएगा। सुरक्षा घेरा भी हट जाएगा। सैनिक और सुरक्षाकर्मी अपने-अपने दायित्वों में लौट जाएंगे। परीक्षा भी समाप्त हो जाएगी। लेकिन एक सवाल फिर भी बचा रहेगा।
क्या करोड़ों छात्रों और उनके परिवारों का भरोसा भी उतनी ही आसानी से वापस आ जाएगा? क्योंकि किसी परीक्षा की असली सुरक्षा बंदूकधारी जवान, इंटरनेट प्रतिबंध या डिजिटल निगरानी नहीं करते।
उसकी असली सुरक्षा उस विश्वास से होती है जो छात्र की आंखों में होता है।
और आज सबसे बड़ा संकट प्रश्नपत्र का नहीं, उसी विश्वास का है।

