दिल्ली ऊंचा सुनती हैकबीरा खड़ा बाजार में,मांगे सबकी खैरना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैरसौ प्याज भी खाए, सौ जूते भी :-लेखक वरिष्ठ संपादक :-आलोक गौड़.

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दिल्ली में खूब छीछालेदर होने के बाद, न चाहते हुए भी मोदी सरकार को देश के नौजवानों के आगे आखिरकार झुकना ही पड़ा। वैसे भी अब कोई रास्ता बचा भी नहीं था। सत्ता के अहंकार की भी एक सीमा होती है और जनता के धैर्य की भी। जब सरकार अपनी सीमा पार कर देती है तो फिर फैसले सत्ता के दफ्तरों में नहीं, सड़कों पर होने लगते हैं।
यह इस्तीफा केवल एक मंत्री का इस्तीफा नहीं है। यह उस सोच के खिलाफ पहला बड़ा जवाब है जो सत्ता में पहुंचते ही खुद को जनता से ऊपर समझने लगती है। यह उस अहंकार के खिलाफ जवाब है जो सवाल पूछने वाले नौजवानों को देशद्रोही, आंदोलन करने वालों को अराजक और असहमति जताने वालों को साजिशकर्ता समझने लगता है। और यह उस राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ भी एक संकेत है जिसमें मंत्री पद पर बैठे लोग अपनी जिम्मेदारियों की विफलता के बाद भी कुर्सी से चिपके रहते हैं और सरकार उन्हें बचाने के लिए तमाम तर्क खोजती रहती हैं।
लेकिन इस बार मामला कुछ अलग था। सामने देश के नौजवान थे। वह नौजवान जिन्हें सरकार अक्सर अपने भाषणों में देश का भविष्य बताती हैं। जिनके नाम पर योजनाएं बनती हैं । जिनके नाम पर रोजगार, कौशल, स्टार्टअप और विकसित भारत के सपने बेचे जाते हैं। वही नौजवान जब अपने अधिकार और अपने भविष्य के लिए सड़कों पर उतरे तो सत्ता को उनका सवाल सुनाई नहीं दिया।
या शायद सरकार सुनना ही नहीं चाहती थी। सवाल था कि जिम्मेदारी किसकी है?


जवाब होना चाहिए था कि जिसकी जिम्मेदारी है, उसकी। लेकिन जवाब देने के बजाय सत्ता ने वही पुराना रास्ता चुना। सवालों को टालो। आंदोलन को बदनाम करो। प्रदर्शनकारियों को डराओ। पुलिस भेजो। लाठियां चलवाओ। आंसू गैस छोड़ो। रास्ते बंद करो। आवाज दबाने की कोशिश करो। सत्ता को शायद लगा होगा कि कुछ दिनों में मामला ठंडा पड़ जाएगा।
लेकिन यह 2026 है।
यह जेन-जी का दौर है।
यह वह पीढ़ी है जो सत्ता के भाषण सुनकर चुप नहीं बैठती। यह वह पीढ़ी है जो सवाल पूछती है। जवाब मांगती है। दस्तावेज पढ़ती है। आंकड़े खंगालती है। सोशल मीडिया पर सवाल उठाती है। सरकार के दावों की जांच करती है। और जब उसे लगता है कि उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है तो सड़क पर उतरने से भी नहीं डरती।
इसीलिए इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल यह नहीं है कि एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि देश के नौजवानों ने सत्ता को यह बता दिया है कि लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन नागरिक नहीं होती। सरकार बनने के बाद भी वह नागरिक रहती है। सवाल पूछती है। हिसाब मांगती है। और जरूरत पड़ने पर सरकार को जवाबदेह बनाती है।
अब शायद देश की सभी सरकारों और सभी राजनीतिक दलों के लिए जवाबदेही का एक नया दौर शुरू हो रहा है।कोई भी पार्टी हो।कोई भी सरकार हो।कोई भी मंत्री हो। अगर गलती करेंगे, अगर अपने पद की जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे, अगर जनता के सवालों को अहंकार से कुचलने की कोशिश करेंगे, अगर अपनी विफलता को छिपाने के लिए पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल करेंगे, तो उन्हें जवाब देना पड़ेगा। और जरूरत पड़ी तो जाना भी पड़ेगा।
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है।
अब यह मत समझिए कि इस्तीफा हो गया और कहानी खत्म हो गई। कहानी तो अब शुरू हुई है। क्योंकि सवाल केवल एक मंत्री का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें किसी बड़ी विफलता के बाद भी जिम्मेदारी तय करने में सरकारों को महीनों और वर्षों लग जाते हैं। सवाल उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें पद पर बने रहना ही सफलता मान लिया गया है और इस्तीफा देना अपराध।
हमारे यहां मंत्री इस्तीफा तब देते हैं जब विपक्ष दबाव बनाए। जब मीडिया लगातार सवाल उठाए। जब जनता सड़कों पर आ जाए। जब अदालतें सवाल पूछें। जब पार्टी के भीतर बेचैनी शुरू हो जाए। यानी जिम्मेदारी स्वीकार करना अंतिम विकल्प बन गया है।
ऐसा लोकतंत्र स्वस्थ लोकतंत्र नहीं हो सकता।
लोकतंत्र में मंत्री का इस्तीफा हार नहीं होना चाहिए। अगर किसी मंत्री के विभाग में गंभीर विफलता हुई है, अगर उसकी जिम्मेदारी बनती है और वह नैतिक आधार पर इस्तीफा देता है तो यह सरकार की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत होती है।
लेकिन यहां समस्या यह है कि हमारे नेता इस्तीफा देने को अपनी हार समझते हैं।
क्यों? क्योंकि सत्ता को सेवा नहीं, अधिकार समझ लिया गया है। कुर्सी को जिम्मेदारी नहीं, विशेषाधिकार समझ लिया गया है। जनता को मालिक नहीं, वोट बैंक समझ लिया गया है। और लोकतंत्र को संवाद नहीं, चुनाव जीतने की मशीन समझ लिया गया है।
कितना अच्छा हो अगर हमारे देश की सरकारें और नेता खुद को राजा और जनता को प्रजा समझना छोड़ दें। लोकतंत्र में कोई राजा नहीं होता। न कोई स्थायी शासक होता है।
न कोई अजेय होता है।
जनता पांच साल के लिए सरकार चुनती है, किसी को आजीवन शासन का लाइसेंस नहीं देती।
लेकिन सत्ता में पहुंचते ही कई नेताओं को लगता है कि अब जनता को केवल तालियां बजानी हैं। सवाल पूछने का अधिकार केवल संसद में बैठे लोगों के पास है। सरकार से असहमति देश के खिलाफ है। आलोचना विपक्ष की साजिश है और आंदोलन किसी विदेशी ताकत की योजना।
यह सोच जितनी पुरानी है, उतनी ही खतरनाक भी।
काश… यह इस्तीफा छात्रों के सिर फोड़ने और उनकी टांगें तोड़ने से पहले दे दिया गया होता। तब सरकार का इकबाल बुलंद रहता।
काश… सरकार ने शुरुआत में ही छात्रों की आवाज सुनी होती। उनके प्रतिनिधियों से बातचीत की होती। उनके सवालों का जवाब दिया होता। अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की होती। तो शायद बात यहां तक नहीं पहुंचती। लेकिन सरकार की हठधर्मिता ने उसे उस स्थिति तक पहुंचा दिया जहां उसे अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय अंततः जनता के दबाव के आगे झुकना पड़ा।
यही तो फर्क है संवेदनशील सरकार और अहंकारी सरकार में। संवेदनशील सरकार सवाल सुनती है।
अहंकारी सरकार सवाल पूछने वाले को ही समस्या मान लेती है। संवेदनशील सरकार बातचीत करती है।
अहंकारी सरकार पुलिस भेजती है। संवेदनशील सरकार गलती स्वीकार करती है। अहंकारी सरकार गलती छिपाने के लिए नए-नए तर्क गढ़ती है।
और जब तर्क खत्म हो जाते हैं तो राष्ट्रवाद, साजिश और षड्यंत्र के प्रमाणपत्र बांटने लगती है।
पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने सरकार की छवि को धूल-धूसरित किया है। जिस संकट को समय रहते बातचीत और संवेदनशीलता से हल किया जा सकता था, उसे सत्ता के अहंकार ने सड़क का संघर्ष बना दिया।छात्रों पर लाठियां चलीं आंसू गैस छोड़ी गई। प्रदर्शनकारियों को रोका गया। आवाजों को दबाने की कोशिश हुई।
और फिर वही हुआ जो अक्सर सत्ता के अहंकार के साथ होता है। जिस आंदोलन को दबाने की कोशिश की गई, वह और बड़ा होता गया।
जिस आवाज को रोकने की कोशिश की गई, वह देश भर में सुनाई देने लगी।
जिस सवाल से बचने की कोशिश की गई, वह सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गया।
यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
आप लोगों को कुछ समय के लिए चुप करा सकते हैं। लेकिन उनके सवालों को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकते।
आज देश के नौजवानों ने यह साबित कर दिया है।
यह केवल किसी एक परीक्षा, किसी एक भर्ती, किसी एक मंत्री या किसी एक सरकार का सवाल नहीं है। यह उस पीढ़ी का सवाल है जिसका भविष्य लगातार अनिश्चित होता जा रहा है। वर्षों की पढ़ाई के बाद परीक्षा होती है। परीक्षा के बाद पेपर लीक की खबरें आती हैं। फिर परीक्षा रद्द होती है। फिर जांच होती है। फिर नई तारीख आती है। फिर नौजवान वर्षों तक इंतजार करते हैं। इस बीच उम्र निकल जाती है।
पैसा खर्च हो जाता है।
परिवार टूटते हैं। और भविष्य अधर में लटक जाता है। फिर सरकार कहती है कि धैर्य रखिए।
लेकिन सरकारों को यह समझना होगा कि नौजवानों का धैर्य कोई अनंत संसाधन नहीं है।
एक सीमा के बाद धैर्य आक्रोश में बदलता है।
और जब आक्रोश को भी अनसुना किया जाता है तो वह आंदोलन बन जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सीख यही है कि नेताओं को, सभी राजनीतिक दलों को और सभी सरकारों को जनता के प्रति और लोकतंत्र के प्रति अधिक संवेदनशील और सजग होना होगा।
आज सत्ता में भाजपा है।
कल कोई और पार्टी होगी।
आज कोई एक मंत्री जिम्मेदार है। कल किसी दूसरी सरकार का कोई दूसरा मंत्री जिम्मेदार होगा।
लेकिन नियम एक ही होना चाहिए। गलती होगी तो जवाबदेही तय होगी।
विफलता होगी तो जिम्मेदारी तय होगी।
लापरवाही होगी तो कार्रवाई होगी।
और जनता को पीटकर कोई सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यही लोकतंत्र है।
इसीलिए मोदी सरकार और भाजपा को अब इस मुद्दे को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन आगे बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि इस पूरे घटनाक्रम को भुला दिया जाए। आगे बढ़ने का अर्थ है कि इससे सीख ली जाए।
अगर भाजपा के नेता इस मामले को लेकर अहंकार में रहे, बयानबाजी में उलझे या बदले की भावना से भरे दिखाई दिए, तो लोग उन्हें माफ नहीं करेंगे। जनता सब देखती है। कौन बातचीत के लिए आगे आया। कौन चुप रहा।
किसने छात्रों के दर्द को समझा। किसने उन्हें बदनाम किया। किसने समाधान खोजा। और किसने अपनी कुर्सी बचाने के लिए पूरी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।
सत्ता में बैठे लोगों को यह बात समझनी होगी कि बदले की राजनीति लोकतंत्र को कमजोर करती है। सरकार का काम विरोध करने वालों से बदला लेना नहीं है। सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि अगली बार ऐसी स्थिति पैदा ही न हो।
किसी आंदोलन को दबाने के बजाय उसके कारणों को खत्म करना होगा।
किसी छात्र को अपराधी समझने के बजाय उसकी चिंता को समझना होगा।
किसी सवाल को साजिश बताने के बजाय उसका जवाब देना होगा। और किसी मंत्री को बचाने के बजाय जनता को जवाब देना होगा। यही जवाबदेही है। यही लोकतंत्र है। लेकिन इस जीत का अर्थ यह कतई नहीं है कि अब नौजवानों को हर बार सड़क पर उतरना पड़े। लोकतंत्र की असली सफलता तो तब होगी जब सरकारें आंदोलन शुरू होने से पहले ही जनता की आवाज सुन लेंगी। जब किसी छात्र को अपनी बात कहने के लिए लाठी नहीं, संवाद मिलेगा। जब किसी अभिभावक को अपने बच्चे के भविष्य के लिए सत्ता के दरवाजे पर धरना नहीं देना पड़ेगा। जब किसी मंत्री को अपनी जिम्मेदारी याद दिलाने के लिए देश के नौजवानों को अपना करियर, अपनी पढ़ाई और अपना समय दांव पर नहीं लगाना पड़ेगा।
सरकारों को यह भी समझना होगा कि हर असहमति विपक्ष की साजिश नहीं होती। हर आंदोलन देश विरोधी नहीं होता। हर सवाल सरकार गिराने की कोशिश नहीं होता। लोकतंत्र में सवाल सरकार को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसे बेहतर बनाते हैं। जो सरकार सवालों से डरती है, वह जनता से दूर होती जाती है। और जो सरकार जनता से दूर हो जाती है, उसे एक दिन जनता ही जवाब देती है।
इसलिए यह इस्तीफा अंत नहीं, शुरुआत होना चाहिए। जवाबदेही की शुरुआत। संवेदनशील शासन की शुरुआत। और उस राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत जिसमें गलती होने पर जिम्मेदारी तय करने के लिए जनता को सड़कों पर उतरने की जरूरत न पड़े। और शायद यही इस पूरे आंदोलन की सबसे बड़ी जीत है। यह लोकतंत्र की जीत है। बच्चों के साहस की जीत है।
देश के भविष्य की जीत है।
यह उन माता-पिताओं की जीत है जिन्होंने अपने बच्चों को डरने के बजाय सवाल पूछना सिखाया।
यह उन नौजवानों की जीत है जिन्होंने यह साबित किया कि सत्ता चाहे कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, जनता की एकजुट आवाज उससे बड़ी होती है।
और यह उन तमाम सरकारों के लिए चेतावनी भी है जो यह समझती हैं कि जनता को हमेशा मूर्ख बनाया जा सकता है।
नहीं।अब ऐसा नहीं होगा।
यह जेन-जी है। यह पीढ़ी सवाल पूछेगी। जवाब मांगेगी। हिसाब लेगी।
और अगर सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई तो सत्ता बदलने का अधिकार भी इसी जनता के पास है।
अब समय आ गया है कि सरकारें अपने नेताओं को राजा समझना बंद करें।
मंत्री को महाराज नहीं, जनसेवक समझें। कुर्सी को सिंहासन नहीं, जिम्मेदारी समझें। और जनता को भीड़ नहीं, लोकतंत्र का मालिक समझें।
क्योंकि आखिरकार…
सत्ता जनता से आती है।
सत्ता जनता के लिए होती है। और सत्ता को जनता के सामने जवाब देना ही पड़ता है। देर से सही। लेकिन जवाबदेही तय हुई नौजवान जीते। लोकतंत्र जीता।
सरकार को झुकना पड़ा।
और सत्ता के अहंकार को एक बार फिर याद दिलाना पड़ा कि उसने सौ प्याज भी खाए और सौ जूते भी।

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