
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा सिर्फ एक मंत्री के पद से हटने की खबर नहीं है। यह पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार के शिक्षा मंत्रालय की पूरी कहानी पर एक बड़ा सवाल है। 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से अब तक शिक्षा मंत्रालय की कमान चार मंत्रियों के हाथों में रही है l स्मृति ईरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और धर्मेंद्र प्रधान। इनमें से कोई भी अपने कार्यकाल को सहजता से पूरा नहीं कर सका। एक के बाद एक चेहरे बदलते रहे। मंत्रालय का नाम बदला। नीतियां बदलीं। नारों और दावों में शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार के वादे किए गए। लेकिन शिक्षा की बुनियादी समस्याएं वहीं खड़ी रहीं। बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी घटती गई। विश्वविद्यालयों और संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर सवाल उठे। परीक्षा व्यवस्था लगातार विवादों में रही। पेपर लीक हुए। एनटीए की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। और जब संकट गहराया, तो सरकार के पास सबसे आसान रास्ता था—एक नया चेहरा सामने कर देना।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि धर्मेंद्र प्रधान क्यों गए। असली सवाल यह है कि शिक्षा मंत्रालय में कोई टिकता क्यों नहीं?
मोदी सरकार के 12 वर्षों में गृह, वित्त, रक्षा, विदेश और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों में अपेक्षाकृत स्थिरता दिखाई दी। लेकिन शिक्षा मंत्रालय ऐसा प्रमुख मंत्रालय रहा, जिसकी कमान चार अलग-अलग मंत्रियों को सौंपी गई। तीन पूर्व शिक्षा मंत्री बाद में अलग-अलग कारणों से केंद्रीय कैबिनेट से भी बाहर हो गए।क्या यह महज संयोग है? शायद नहीं।
शिक्षा मंत्रालय किसी भी सरकार के लिए केवल एक प्रशासनिक विभाग नहीं होता। यह देश के भविष्य, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, पाठ्यक्रमों और नई पीढ़ी की सोच से जुड़ा मंत्रालय है। इसलिए इस मंत्रालय पर नियंत्रण का अर्थ केवल शिक्षा नीति तय करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की बौद्धिक दिशा तय करना भी है।
यही वजह है कि मोदी सरकार के दौर में शिक्षा मंत्रालय लगातार राजनीतिक और वैचारिक बहस के केंद्र में रहा।
स्मृति ईरानी को 2014 में मानव संसाधन विकास मंत्री बनाया गया। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की करीबी मानी जाती थीं और उनकी राजनीतिक शैली मुखर थी। लेकिन उनके कार्यकाल में डिग्री विवाद से लेकर जेएनयू विवाद और रोहित वेमुला कीआत्महत्या तक कई मुद्दे विवाद का कारण बने। नई शिक्षा नीति पर काम भी उनके कार्यकाल में शुरू हुआ, लेकिन नीति लागू होने से पहले ही मंत्रालय उनसे ले लिया गया।
उनके बाद प्रकाश जावड़ेकर आए। उनकी शैली बिल्कुल अलग थी। कम बोलना, कम विवाद और अधिक प्रशासनिक संतुलन। उनके कार्यकाल में एनटीए की स्थापना और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस’ जैसी पहलें हुईं। लेकिन सीबीएसई पेपर लीक का विवाद भी इसी दौर में सामने आया। दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं के पेपर लीक होने के बाद पुनर्परीक्षा की घोषणा करनी पड़ी। छात्रों का विरोध हुआ और जंतर-मंतर तक प्रदर्शन हुए। आज वही एनटीए नीट जैसी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों के कारण सवालों के घेरे में है। यानी संस्थागत सुधार के नाम पर बनाई गई व्यवस्था पर ही कुछ वर्षों बाद भरोसे का संकट खड़ा हो गया।
2020 में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के कार्यकाल में नई शिक्षा नीति लागू हुई। इसी दौर में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया गया। सरकार ने इसे शिक्षा पर अधिक ध्यान केंद्रित करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया। नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का छह प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य रखा गया l लेकिन लक्ष्य और वास्तविकता के बीच की दूरी लगातार बढ़ती गई।
हाल की रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी पिछले 12 वर्षों में घट गई। 2013-14 में शिक्षा की हिस्सेदारी 4.6 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर करीब 2.5 प्रतिशत रह गई। यानी जिस दौर में शिक्षा को देश के भविष्य का आधार बताया जा रहा था, उसी दौर में शिक्षा के लिए बजट की प्राथमिकता कम होती गई।
फिर सवाल उठता है—क्या शिक्षा में सुधार केवल नई नीति का नाम बदलने और नए संस्थान बनाने से होता है?
रमेश पोखरियाल के कार्यकाल में कोविड महामारी के बीच जेईई और नीट परीक्षाएं कराने का फैसला भी विवादों में रहा। छात्रों ने विरोध किया। अदालतों का दरवाजा खटखटाया गया। सरकार अपने फैसले पर कायम रही। लेकिन बड़ी संख्या में छात्रों के परीक्षा से वंचित रहने और परीक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता को लेकर सवाल उठते रहे।
उनके बाद धर्मेंद्र प्रधान आए। वह चारों मंत्रियों में सबसे लंबे समय तक शिक्षा मंत्रालय संभालने वाले मंत्री बने। वह मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में पेट्रोलियम मंत्री रहे थे और संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले मजबूत राजनीतिक चेहरों में गिने जाते थे।
उनके कार्यकाल में नई शिक्षा नीति को आगे बढ़ाया गया। मातृभाषा और भारतीय भाषाओं में शिक्षा पर जोर दिया गया। लेकिन तीन-भाषा नीति को लेकर तमिलनाडु जैसे राज्यों के साथ टकराव हुआ। विपक्ष ने हिंदी थोपने का आरोप लगाया। शिक्षा का विषय केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बन गया।
फिर आया नीट और भर्ती परीक्षाओं का संकट।
युवाओं का आक्रोश बढ़ता गया। पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों ने उस पीढ़ी को सड़क पर ला दिया, जिसका भविष्य प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों पर टिका है। जंतर-मंतर का आंदोलन धीरे-धीरे देशभर में फैल गया। अंततः धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा।
लेकिन क्या उनके इस्तीफ़े से समस्या समाप्त हो गई?
बिल्कुल नहीं।
क्योंकि यदि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी है, तो मंत्री बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। यदि एनटीए की विश्वसनीयता पर सवाल हैं, तो नया मंत्री नियुक्त करने से सवाल खत्म नहीं होते। यदि शिक्षा का बजट लगातार घट रहा है, तो मंत्रालय का नाम बदलने से शिक्षा मजबूत नहीं होती। और यदि विश्वविद्यालयों में विचारधारा को योग्यता से ऊपर रखने के आरोप लग रहे हैं, तो एक मंत्री की विदाई से उस बहस का अंत नहीं हो सकता।
यही मोदी सरकार के शिक्षा मंत्रालय की सबसे बड़ी विडंबना है—चेहरे बदलते रहे, लेकिन सवाल नहीं बदले।
सरकार समर्थक इसे लंबे समय से लंबित संरचनात्मक सुधारों की प्रक्रिया कह सकते हैं। नई शिक्षा नीति को ऐतिहासिक उपलब्धि बता सकते हैं। भारतीय भाषाओं पर जोर को शिक्षा का भारतीयकरण कह सकते हैं। लेकिन आलोचकों का सवाल भी उतना ही गंभीर है कि क्या शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के नाम पर उसे वैचारिक रूप से बदलने की कोशिश अधिक महत्वपूर्ण हो गई?
शिक्षा संस्थानों में नियुक्तियों, पाठ्यक्रमों, शोध और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जेएनयू जैसे संस्थानों को लेकर वैचारिक संघर्ष खुलकर सामने आया। इतिहास और पाठ्यक्रमों में बदलाव को लेकर बहस हुई। एक पक्ष इसे औपनिवेशिक और वामपंथी प्रभाव से मुक्ति कहता रहा, दूसरा पक्ष इसे शिक्षा के राजनीतिकरण और इतिहास के पुनर्लेखन की कोशिश बताता रहा।
लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक सवाल दब गया—बच्चों को अच्छी शिक्षा कौन देगा?
सरकारी स्कूलों की स्थिति क्या है? विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के कितने पद खाली हैं? शोध पर कितना खर्च हो रहा है? कितने युवा डिग्री लेकर रोजगार के योग्य नहीं बन पा रहे हैं? प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार गड़बड़ियां क्यों हो रही हैं? और शिक्षा का बजट उस छह प्रतिशत के लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुंच रहा, जिसका वादा नई शिक्षा नीति में किया गया था? इन सवालों का जवाब किसी भी विचारधारा के पास नहीं है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस बार युवाओं ने सत्ता को यह संदेश दे दिया है कि शिक्षा और रोजगार के सवालों को केवल भाषणों से नहीं दबाया जा सकता। नई पीढ़ी अब केवल नारे नहीं सुनना चाहती। वह परीक्षा में पारदर्शिता, रोजगार में अवसर और अपने भविष्य की सुरक्षा चाहती है।
और यही वह जगह है, जहां सरकार को सबसे ज्यादा सावधान होना चाहिए।
क्योंकि मंत्री बदलना आसान है। किसी को हटाकर किसी और को कुर्सी पर बैठा देना भी आसान है। मुश्किल यह है कि व्यवस्था बदली जाए।
पिछले 12 वर्षों में शिक्षा मंत्रालय में चार मंत्री बदल गए। लेकिन पेपर लीक का सवाल बना रहा। परीक्षा व्यवस्था का संकट बना रहा। बजट का सवाल बना रहा। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का सवाल बना रहा। वैचारिक हस्तक्षेप का सवाल बना रहा। युवाओं का आक्रोश भी बना रहा।
इसलिए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा अंत नहीं है। यह सरकार के लिए एक चेतावनी है।
क्योंकि शिक्षा मंत्री बदलते रहने से शिक्षा नहीं बदलती। शिक्षा तब बदलती है, जब सरकार अपनी प्राथमिकताएं बदलती है।

