

नई दिल्ली l मालवीय नगर के एक होटल में लगी आग बुझ चुकी है। दमकल की गाड़ियां लौट चुकी हैं। अधिकारी अपनी रिपोर्टें तैयार कर रहे हैं। राजनीतिक बयान भी आ चुके हैं। लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा है जहां हर बड़े हादसे के बाद खड़ा मिलता है कि क्या हम सचमुच अगली त्रासदी का इंतजार कर रहे हैं ? या फिर हमने इस हादसे से सबक लेते हुए भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय या प्रबंध किए हैं ?
दिल्ली में अग्निकांड होना कोई नई खबर नहीं है। अनाज मंडी में आग लगी, लोग मरे। करोल बाग में आग लगी, लोग मरे। मुंडका में आग लगी, लोग मरे। हर बार सरकारों ने दुख जताया, अधिकारियों ने जांच बैठाई, मीडिया ने बहस की और फिर सब सामान्य हो गया। सामान्य इसलिए नहीं कि खतरा खत्म हो गया था, बल्कि इसलिए कि हम खतरे के साथ जीना सीख चुके हैं।
यही सबसे बड़ा संकट है।
मालवीय नगर की आग को यदि केवल एक स्थानीय दुर्घटना मान लिया गया तो हम फिर वही गलती करेंगे जो दशकों से करते आए हैं। यह आग एक चेतावनी है। वह चेतावनी जिसे पहाड़गंज की गलियां वर्षों से दे रही हैं। वह चेतावनी जिसे पुरानी दिल्ली के तंग बाजार रोज दोहराते हैं। वह चेतावनी जिसे करोल बाग, गांधी नगर, लक्ष्मी नगर, संगम विहार और उत्तम नगर बार-बार हमारे सामने रखते हैं। सवाल यह नहीं है कि आग कहां लगी। सवाल यह है कि अगली बार आग कहां लगेगी। दिल्ली का सबसे बड़ा संकट प्रदूषण नहीं है। ट्रैफिक नहीं है। पानी की कमी भी नहीं है। दिल्ली का सबसे बड़ा संकट हैl यहां का अनियोजित विकास और उस अनियोजित विकास को मिला राजनीतिक तथा प्रशासनिक संरक्षण।
राजधानी में हजारों ऐसी इमारतें खड़ी हैं जो कागजों पर कुछ और हैं और जमीन पर कुछ और। जो मकानों परिवार रहने के लिए बने थे, वहां होटल चल रहे हैं। जहां दो मंजिल की अनुमति थी, वहां पांच मंजिलें खड़ी हैं। जहां पार्किंग होनी चाहिए थी, वहां दुकानें हैं। जहां सुरक्षा निकास होना चाहिए था, वहां गोदाम बने हुए हैं।और यह सब किसी अंधेरे में नहीं हुआ। नगर निगम देख रहा था।पुलिस देख रही थी।
अग्निशमन विभाग देख रहा था। राजनीतिक प्रतिनिधि देख रहे थे। स्थानीय लोग भी देख रहे थे। फिर भी सब चलता रहा। यही वह बिंदु है जहां हादसा दुर्घटना नहीं रह जाता। वह प्रशासनिक असफलता और राजनीतिक संरक्षण का परिणाम बन जाता है। पहाड़गंज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। देश-दुनिया से आने वाले लाखों पर्यटकों का यह इलाका अब दिल्ली की नियोजन विफलता का जीवंत संग्रहालय बन चुका है। संकरी गलियां, एक-दूसरे से सटी इमारतें, बिजली के तारों का जाल, गैस सिलेंडरों की मौजूदगी, सैकड़ों होटल और हजारों लोग। जरा कल्पना कीजिए कि यदि यहां किसी दिन अनाज मंडी या मुंडका जैसी आग लग जाए तो क्या होगा? क्या दमकल की गाड़ियां समय पर पहुंच पाएंगी? क्या लोग बाहर निकल पाएंगे? क्या बचाव अभियान चल सकेगा?
या फिर हम केवल मौतों की संख्या गिनते रह जाएंगे?
यह काल्पनिक प्रश्न नहीं हैं। यह वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर प्रशासन के पास आज होना चाहिए, हादसे के बाद नहीं।
दिल्ली में अवैध निर्माण केवल निर्माण नहीं होता। वह एक पूरी व्यवस्था का प्रमाणपत्र होता है। कोई भी बहुमंजिला अवैध ढांचा रातोंरात खड़ा नहीं होता। उसकी हर मंजिल यह बताती है कि किसी ने आंखें बंद की थीं। उसकी हर दीवार यह बताती है कि किसी ने नियमों को नजरअंदाज किया था। उसकी हर छत यह बताती है कि किसी न किसी स्तर पर संरक्षण उपलब्ध था।
इसीलिए दिल्ली में अवैध निर्माण का प्रश्न केवल नगर निगम का प्रश्न नहीं है। यह शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है।
सबसे दुखद तथ्य यह है कि हम हादसों के बाद सक्रिय होते हैं। आग लगने के बाद निरीक्षण शुरू होते हैं। मौतों के बाद नियम याद आते हैं। मीडिया में खबरें आने के बाद फाइलें खुलती हैं। यानी व्यवस्था का पूरा मॉडल प्रतिक्रिया पर आधारित है, रोकथाम पर नहीं। और जब शासन की संस्कृति रोकथाम के बजाय प्रतिक्रिया पर आधारित हो जाए, तब त्रासदियां अपवाद नहीं रहतीं, नियति बन जाती हैं। आज जरूरत किसी नई जांच समिति की नहीं है। बल्कि
जरूरत राजधानी के संवेदनशील इलाकों का युद्धस्तर पर सुरक्षा ऑडिट कराने की है। जरूरत यह बताने की है कि कितने होटल अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन कर रहे हैं। कितनी इमारतें संरचनात्मक रूप से सुरक्षित हैं। कितने अवैध निर्माणों पर वास्तविक कार्रवाई हुई। और कितने मामलों में कार्रवाई फाइलों के कब्रिस्तान में दफन हो गई।
मालवीय नगर की आग ने दिल्ली को आईना दिखाया है। सवाल यह है कि दिल्ली उस आईने में अपना चेहरा देखने को तैयार है या नहीं।
क्योंकि सच यही है कि राजधानी आज केवल गर्मी से नहीं झुलस रही। वह भ्रष्टाचार, समझौतों और अनियोजित विकास के उस बारूद पर बैठी है जिसकी गंध हर गली में महसूस की जा सकती है। चिंगारी कब और कहां गिरेगी, यह कोई नहीं जानता। लेकिन बारूद मौजूद है। और उससे भी बड़ा खतरा यह है कि व्यवस्था अब भी यह मानने को तैयार नहीं कि वह बारूद पर बैठी हुई है। पहाड़गंज एक उदाहरण है, लेकिन निशाने पर पूरी व्यवस्था है l

