

नई दिल्ली l दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर में हुए अग्निकांड ने एक बार फिर राजधानी को झकझोर दिया है। कुछ लोगों के लिए यह एक और “दुर्भाग्यपूर्ण हादसा” होगा, कुछ के लिए कुछ दिनों तक चर्चा का विषय और कुछ के लिए राजनीतिक बयानबाजी का अवसर। लेकिन जो लोग ऐसी घटनाओं में अपने परिजन खो देते हैं, उनके लिए यह सिर्फ एक हादसा नहीं होता, पूरी जिंदगी को दो हिस्सों में बांट देने वाली त्रासदी होता हैl एक वह समय जब उनका अपना व्यक्ति जीवित था और दूसरा वह समय जब वह केवल याद बनकर रह गया।
लेकिन इस लेख का प्रश्न शोक व्यक्त करना नहीं है। प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों होती हैं? क्यों हर बड़े अग्निकांड के बाद वही कारण सामने आते हैं? क्यों हर जांच रिपोर्ट में सुरक्षा मानकों की अनदेखी, अवैध निर्माण, बंद आपातकालीन निकास, खराब अग्निशमन व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही का जिक्र मिलता है? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि जब कारण वर्षों से ज्ञात हैं तो समाधान आज तक क्यों नहीं हुआ? यदि हर त्रासदी के बाद निष्कर्ष एक जैसे निकलते हैं तो समस्या आग नहीं है, समस्या व्यवस्था है।

दिल्ली का इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पड़ा है। अस्सी के दशक में राजेंद्र प्लेस स्थित गोपाल टावर में लगी आग ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। उसके बाद कनॉट प्लेस और अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में कई बार आग ने तबाही मचाई। उपहार सिनेमा त्रासदी तो भारतीय शहरी प्रशासन और सुरक्षा प्रबंधन की विफलताओं का प्रतीक बन गई। उसके बाद भी अनाज मंडी, बवाना, मुंडका, करोल बाग और अनेक अन्य अग्निकांड सामने आए। हर बार मौतें हुईं, हर बार जांच हुई, हर बार वादे हुए और हर बार कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो गया। यही वह बिंदु है जहां एक हादसा केवल तकनीकी या प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न बन जाता है। सवाल यह है कि क्या हमारे शासन तंत्र ने नागरिक जीवन की सुरक्षा को वास्तव में प्राथमिकता दी है? हमारे यहां कानूनों की कमी नहीं है। अग्नि सुरक्षा से संबंधित नियम मौजूद हैं। भवन निर्माण के मानक मौजूद हैं। निरीक्षण की व्यवस्थाएं मौजूद हैं। नगर निकाय हैं, अग्निशमन विभाग हैं, पुलिस है, विकास प्राधिकरण हैं और विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदार अधिकारी भी हैं। इसके बावजूद यदि बार-बार ऐसी घटनाएं हो रही हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि नियम कमजोर हैं। इसका अर्थ यह है कि नियमों को लागू करने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति कमजोर है। सच यह है कि भारत के अधिकांश महानगरों की तरह दिल्ली में भी सुरक्षा नियमों का पालन अक्सर कागजों तक सीमित रहता है। भवन निर्माण की अनुमति एक उद्देश्य के लिए ली जाती है और उपयोग किसी दूसरे उद्देश्य के लिए होने लगता है। बेसमेंट पार्किंग के लिए स्वीकृत होता है लेकिन बाद में उसे गोदाम या व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाने लगता है। आपातकालीन निकास मार्गों पर सामान रख दिया जाता है। अग्निशमन उपकरणों का रखरखाव नहीं होता। विद्युत तारों का जाल वर्षों तक बिना सुधार के चलता रहता है। निरीक्षण होते भी हैं तो अक्सर उनका परिणाम सुधार नहीं, औपचारिकता बनकर रह जाता है। यहीं से वह प्रश्न पैदा होता है जिसे टालना अब संभव नहीं है कि क्या यह केवल लापरवाही है या एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम है जिसमें नियमों से अधिक प्रभावशाली पैसा और पहुंच है? क्योंकि कोई भी अवैध निर्माण या नियमों का उल्लंघन वर्षों तक तब तक नहीं चल सकता जब तक उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष संरक्षण प्राप्त न हो। यह मान लेना कि हजारों वर्गफुट में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों, अतिरिक्त मंजिलों, अवैध बदलावों और सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की जानकारी संबंधित एजेंसियों को नहीं होती, वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा होगा। समस्या केवल प्रशासनिक नहीं है। यह सामाजिक और आर्थिक भी है। हम एक ऐसे दौर में पहुंच चुके हैं जहां सुरक्षा को अक्सर खर्च माना जाता है, निवेश नहीं। भवन मालिकों को अतिरिक्त निकास मार्ग बनाने से अधिक लाभ अतिरिक्त दुकान बनाने में दिखाई देता है। अग्निशमन प्रणाली पर खर्च करने से अधिक लाभ क्षेत्रफल बढ़ाने में दिखाई देता है। सुरक्षा प्रशिक्षण की अपेक्षा विज्ञापन पर खर्च अधिक उपयोगी समझा जाता है। परिणामस्वरूप जब तक सब कुछ सामान्य चलता है, मुनाफा बढ़ता रहता है। लेकिन जैसे ही कोई दुर्घटना होती है, वही बचत की गई राशि कई जिंदगियों की कीमत बन जाती है।
विडंबना यह है कि हर त्रासदी के बाद हम कारणों पर चर्चा करते हैं, लेकिन जवाबदेही पर नहीं। कितने अग्निकांडों में वास्तव में उच्च स्तर की जिम्मेदारी तय हुई?
कितनी बार उन अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई हुई जिन्होंने निरीक्षण की जिम्मेदारी निभाने में विफलता दिखाई?
कितनी बार उन लोगों को वास्तविक दंड मिला जिन्होंने सुरक्षा मानकों को जानबूझकर नजरअंदाज किया? और कितनी बार राजनीतिक संरक्षण प्राप्त लोगों को कानून के सामने जवाब देना पड़ा? इन प्रश्नों के उत्तर उत्साहजनक नहीं हैं।
हमारी व्यवस्था में अक्सर सबसे निचले स्तर पर मौजूद व्यक्ति जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, जबकि निर्णय लेने वाली और निगरानी करने वाली बड़ी संरचनाएं लगभग अछूती रह जाती हैं। यही कारण है कि एक घटना के बाद कुछ समय के लिए भय पैदा होता है, लेकिन स्थायी सुधार नहीं होता।
मालवीय नगर की घटना का सबसे बड़ा सबक यही है कि हमें अग्निकांडों को केवल “दुर्घटना” के रूप में देखना बंद करना होगा। दुर्घटना वह होती है जिसे रोकना संभव न हो। लेकिन यदि नियम पहले से मौजूद हों, जोखिम पहले से ज्ञात हो, निरीक्षण की व्यवस्था भी हो और फिर भी घटना घट जाए, तो उसे केवल दुर्घटना कह देना वास्तविक समस्या से बच निकलने का आसान तरीका बन जाता है।
भारत तेजी से शहरीकरण की ओर बढ़ रहा है। बहुमंजिला इमारतें बढ़ रही हैं। व्यावसायिक परिसरों का विस्तार हो रहा है। जनसंख्या का घनत्व लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था को भी उसी अनुपात में मजबूत होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कई मामलों में विकास की गति सुरक्षा प्रबंधन की क्षमता से कहीं आगे निकल चुकी है।
यही कारण है कि आज आवश्यकता केवल नए नियमों की नहीं, बल्कि मौजूदा नियमों के कठोर और पारदर्शी क्रियान्वयन की है। नियमित स्वतंत्र निरीक्षण, निरीक्षण रिपोर्टों को सार्वजनिक करना, दोषियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करना, सुरक्षा मानकों के उल्लंघन पर त्वरित कार्रवाई और नागरिकों को भी जागरूक बनाना—ये सभी कदम अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं। लेकिन इन सबके बीच एक नैतिक प्रश्न भी खड़ा होता है। क्या हमारे समाज में मानव जीवन का मूल्य वास्तव में सर्वोच्च है?
यदि है, तो फिर सुरक्षा को प्राथमिकता क्यों नहीं मिलती? यदि है, तो फिर हर बड़े हादसे के बाद वही कमियां क्यों सामने आती हैं?
यदि है, तो फिर हर त्रासदी के बाद मुआवजे की घोषणा तो तुरंत हो जाती है, लेकिन सुधार की प्रक्रिया उतनी तेज क्यों नहीं होती?
मुआवजा आवश्यक हो सकता है, लेकिन वह न्याय का विकल्प नहीं है। किसी परिवार का सदस्य वापस नहीं लौट सकता। किसी बच्चे को उसका पिता नहीं मिल सकता। किसी मां को उसका बेटा नहीं मिल सकता। इसलिए किसी भी संवेदनशील समाज का लक्ष्य मुआवजा देना नहीं, ऐसी घटनाओं को रोकना होना चाहिए।
मालवीय नगर का अग्निकांड केवल एक स्थानीय घटना नहीं है। यह दिल्ली और देश के अन्य महानगरों के लिए चेतावनी है। यह याद दिलाता है कि विकास केवल इमारतें खड़ी करने का नाम नहीं है। विकास का अर्थ उन इमारतों में रहने, काम करने और आने-जाने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।
आखिरकार सवाल आग का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जो हर त्रासदी के बाद जागती है और कुछ समय बाद फिर सो जाती है।
सवाल उन प्राथमिकताओं का है जिनमें अक्सर मुनाफा सुरक्षा पर भारी पड़ जाता है।
और सवाल उस जवाबदेही का है जिसकी अनुपस्थिति ने अनेक हादसों को केवल समाचार बनाकर छोड़ दिया।
जब तक इन प्रश्नों का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक हर अग्निकांड के बाद हम वही शोक व्यक्त करेंगे, वही जांच बैठाएंगे, वही वादे करेंगे और फिर अगली त्रासदी का इंतजार करेंगे। और तब सच यही रहेगा कि आग केवल इमारतों में नहीं लगती, व्यवस्था में भी लगती है।

