संयुक्त अभिभावक संघ के नेतृत्व में हुआ ध्वजारोहण समारोह, छात्रों-अभिभावकों ने राष्ट्रगान गाकर बांटे लड्डू

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RTE में चयनित होने के बावजूद शिक्षा का इंतजार कर रहे नन्हे छात्रों ने शिक्षा संकुल के मुख्य द्वार पर फहराया तिरंगा

जयपुर। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर संयुक्त अभिभावक संघ की ओर से शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान स्थिति पर चिंता जताते हुए शिक्षा संकुल के मुख्य द्वार पर सांकेतिक ध्वजारोहण समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम में RTE के तहत चयनित होने के बावजूद अब तक विद्यालय में प्रवेश और शिक्षा का इंतजार कर रहे नन्हे छात्र-छात्राओं सहित उनके अभिभावकों ने भाग लिया।

अभिभावकों और बच्चों ने तिरंगा फहराकर राष्ट्रगान किया तथा एक-दूसरे को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए लड्डू वितरित किए। कार्यक्रम का उद्देश्य सरकार और शिक्षा विभाग का ध्यान उन बच्चों की ओर आकर्षित करना था, जो RTE प्रक्रिया में चयनित होने के बावजूद अभी तक नियमित शिक्षा से वंचित हैं।

संयुक्त अभिभावक संघ के राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता एवं मीडिया प्रभारी अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि आजादी के 79 वर्षों बाद भी यदि किसी जरूरतमंद बच्चे और उसके अभिभावक को शिक्षा के अधिकार के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ें, निजी स्कूलों के दरवाजे पर खड़ा होना पड़े और अधिकारियों से गुहार लगानी पड़े, तो यह पूरी शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि RTE सत्र 2026-27 की लॉटरी 12 मार्च को निकाली गई थी और 1 अप्रैल से शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हो चुका है। लगभग 140 दिन बीत जाने के बावजूद करीब 1.80 लाख चयनित बच्चे आज भी प्रवेश और शिक्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकार के स्तर पर बार-बार आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन जमीन पर अभिभावकों की परेशानी समाप्त नहीं हुई है।

निजी स्कूलों की मनमानी पर भी उठाए सवाल

जैन ने कहा कि RTE के नाम पर निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों को अलग-अलग दस्तावेजों, फीस, किताबों, यूनिफॉर्म और अन्य व्यवस्थाओं के नाम पर परेशान किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। यदि सरकार ने RTE कानून बनाया है तो उसकी जिम्मेदारी भी सरकार की है कि प्रत्येक पात्र बच्चे को बिना किसी बाधा के शिक्षा मिले।

उन्होंने सवाल किया कि जब सरकार RTE के तहत बच्चों का चयन कर सकती है तो उन्हें विद्यालय में प्रवेश दिलाने की जिम्मेदारी से पीछे क्यों हटती है? स्कूलों द्वारा मनमानी की शिकायतों पर केवल नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दोषी संस्थानों पर प्रभावी कार्रवाई भी होनी चाहिए।

सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं पर भी सरकार जवाब दे

संयुक्त अभिभावक संघ ने केवल निजी स्कूलों ही नहीं, बल्कि सरकारी विद्यालयों की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि अनेक सरकारी स्कूल आज भी आधारभूत सुविधाओं, पर्याप्त शिक्षकों, स्वच्छता, सुरक्षित भवन, पेयजल, शौचालय और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसी आवश्यकताओं से जूझ रहे हैं।

जैन ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का मतलब केवल स्कूल खोल देना नहीं, बल्कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक भविष्य देना है।

कॉलेज और कोचिंग व्यवस्था भी चिंता का विषय

उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा में कॉलेजों की व्यवस्थाओं, विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त संसाधनों और रोजगारपरक शिक्षा को लेकर भी सरकार को गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। वहीं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के बीच बढ़ते मानसिक दबाव और कोचिंग व्यवस्था से जुड़ी चिंताएं भी सरकार की जवाबदेही का विषय हैं।

उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को केवल परीक्षा और परिणाम की मशीन समझना बंद करना होगा। शिक्षा व्यवस्था का केंद्र विद्यार्थी होना चाहिए, न कि केवल फीस, परीक्षा और परिणाम।

स्कूलों में हो रही दुर्घटनाएं और विद्यार्थियों की मौतें बेहद चिंताजनक

अभिभावक संघ ने स्कूलों में विद्यार्थियों के साथ होने वाली दुर्घटनाओं और विद्यार्थियों की मौतों की घटनाओं पर गहरा दुख व्यक्त किया। संघ ने कहा कि प्रत्येक स्कूल में बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। स्कूल परिसर, कैंटीन, परिवहन, खेल मैदान, भवन, विद्युत व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा तथा प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था की नियमित जांच अनिवार्य रूप से होनी चाहिए।

जैन ने कहा कि किसी बच्चे की जान जाने के बाद जांच और कार्रवाई की बातें करने के बजाय सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि दुर्घटना होने की नौबत ही न आए।

उन्होंने विद्यार्थियों द्वारा आत्महत्या की घटनाओं पर भी गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह केवल परिवार की नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था और समाज की विफलता का संकेत है। बच्चों पर अनावश्यक शैक्षणिक दबाव, असफलता का भय, बुलिंग, मानसिक तनाव और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा जैसे विषयों पर स्कूलों, कॉलेजों और सरकार को गंभीरता से काम करना होगा।

अभिषेक जैन बिट्टू ने सख्त शब्दों में कहा— “आजादी के 79 वर्ष बाद भी यदि एक नन्हा बच्चा शिक्षा के अधिकार के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहा है तो हमें यह सोचने की जरूरत है कि आखिर हमारी शिक्षा व्यवस्था किस दिशा में जा रही है। 12 मार्च को RTE की लॉटरी निकलती है, 1 अप्रैल से सत्र शुरू होता है और लगभग 140 दिन बाद भी 1.80 लाख बच्चे शिक्षा का इंतजार कर रहे हैं—यह आंकड़ा नहीं, लाखों परिवारों की पीड़ा है।”

उन्होंने कहा कि सरकार केवल घोषणाओं और कागजों में शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित न करे, बल्कि धरातल पर बच्चों को शिक्षा उपलब्ध करवाए। प्रशासन अपनी जिम्मेदारी उठाए, निजी स्कूलों की मनमानी पर तत्काल रोक लगे और RTE के चयनित बच्चों को बिना किसी बाधा के विद्यालयों में प्रवेश दिलाया जाए।

उन्होंने आगे कहा— “तिरंगा हमें अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। जिस देश में हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार दिया गया है, वहां किसी बच्चे को प्रवेश के लिए ठोकरें खाना पड़े, किसी अभिभावक को अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ें और किसी परिवार को अपने बच्चे की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहना पड़े—यह स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

संयुक्त अभिभावक संघ ने सरकार से मांग की कि RTE के सभी लंबित प्रवेश तत्काल करवाए जाएं, निजी स्कूलों की मनमानी पर कठोर कार्रवाई हो, सरकारी विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं को मजबूत किया जाए, स्कूल-कॉलेज-कोचिंग संस्थानों में विद्यार्थियों की सुरक्षा एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए तथा विद्यालयों में होने वाली दुर्घटनाओं और विद्यार्थियों की मौतों के प्रत्येक मामले में समयबद्ध एवं निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

संघ ने स्पष्ट किया कि शिक्षा किसी बच्चे पर एहसान नहीं, उसका अधिकार है और इस अधिकार की रक्षा करना सरकार, प्रशासन तथा पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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