
मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग नहीं, मजबूत स्कूल और विश्वविद्यालय चाहिए — संयुक्त अभिभावक संघ
— प्रधानमंत्री की घोषणा पर अभिभावक संघ ने उठाए सवाल, कहा—क्या सरकार ने मान लिया है कि देश की स्कूली और विश्वविद्यालय शिक्षा व्यवस्था विफल हो चुकी है?
जयपुर। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग व्यवस्था की घोषणा का संयुक्त अभिभावक संघ ने स्वागत करने के बजाय इसके पीछे की शिक्षा नीति और सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि विद्यार्थियों को मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई कि देश के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों से अधिक कोचिंग संस्थानों पर निर्भर होना पड़ रहा है?
अभिषेक जैन बिट्टू ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की घोषणा को यदि सरकार की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में देखा जाए तो देश के सामने एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा होता है—क्या केंद्र सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि देश की स्कूली शिक्षा और विश्वविद्यालय व्यवस्था विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं रही, इसलिए अब छात्रों को कोचिंग के सहारे आगे बढ़ना पड़ेगा?
उन्होंने कहा कि सरकार को कोचिंग व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय सरकारी स्कूलों, विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को इतना सक्षम बनाना चाहिए था कि विद्यार्थियों को अलग से महंगी कोचिंग लेने की जरूरत ही न पड़े। ऑनलाइन कोचिंग को समाधान बताना कहीं न कहीं उस मूल समस्या को नजरअंदाज करना है, जिसने देश में कोचिंग संस्कृति को जन्म दिया है।
स्कूल और विश्वविद्यालय मजबूत होंगे तो कोचिंग की मजबूरी खत्म होगी
संयुक्त अभिभावक संघ का कहना है कि आज देश में लाखों अभिभावक बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन, गतिविधियों और अन्य शुल्कों का बोझ उठा रहे हैं। इसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अलग से कोचिंग का खर्च परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालता है।
प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि सरकार को अभिभावकों की जेब से निकलने वाले पैसे का नया रास्ता खोजने के बजाय शिक्षा की मूल व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहिए। यदि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, मार्गदर्शन, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और करियर काउंसलिंग उपलब्ध हो, तो कोचिंग उद्योग पर विद्यार्थियों की निर्भरता स्वाभाविक रूप से कम होगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार बढ़ती कोचिंग संस्कृति ने शिक्षा को ज्ञान और व्यक्तित्व निर्माण की व्यवस्था से हटाकर प्रतिस्पर्धा और बाजार आधारित व्यवस्था में बदल दिया है। सरकार की जिम्मेदारी इस बाजार को बढ़ावा देना नहीं बल्कि ऐसी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था तैयार करना है जिसमें गरीब, मध्यमवर्गीय और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे भी समान अवसर प्राप्त कर सकें।
देश को निजी शिक्षा की मनमानी से आजादी चाहिए
अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि आजादी के 79वें वर्ष में देश के अभिभावकों और विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है। निजी शिक्षण संस्थानों की फीस, अतिरिक्त शुल्क और विभिन्न प्रकार के आर्थिक दबावों को लेकर अभिभावक लगातार शिकायतें उठा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि सरकार शिक्षा को व्यापार बनने से रोके और निजी शिक्षण संस्थानों की मनमानी पर प्रभावी नियमन लागू करे। अभिभावकों को स्कूल और कॉलेज चुनने की आजादी तभी सार्थक होगी, जब उन्हें आर्थिक शोषण से भी सुरक्षा मिले।
छात्रों के मानसिक दबाव और सुरक्षा पर सरकार गंभीर हो
संघ ने कहा कि देश में विद्यार्थियों पर बढ़ते शैक्षणिक और प्रतियोगी दबाव को केवल कोचिंग की सुविधा देकर समाप्त नहीं किया जा सकता। विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षित विद्यालय वातावरण, काउंसलिंग, शिक्षक-विद्यार्थी संबंध, अभिभावक संवाद और संस्थानों की जवाबदेही पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।
अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि जब किसी शिक्षण संस्थान में लापरवाही के कारण विद्यार्थी की सुरक्षा प्रभावित होती है या कोई छात्र अत्यधिक दबाव का सामना करता है, तो सरकार और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी केवल जांच बैठाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संस्थानों की जवाबदेही तय होनी चाहिए और विद्यार्थियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
पहले युवा सड़कों पर थे, अब स्कूलों के बच्चे भी अधिकार मांग रहे हैं
संयुक्त अभिभावक संघ ने कहा कि देश में शिक्षा से जुड़े सवाल अब केवल विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं हैं। स्कूलों के बच्चे और उनके अभिभावक भी अपने शिक्षा अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। यह किसी राजनीतिक दल के खिलाफ आंदोलन नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति का संकेत है।
प्रदेश प्रवक्ता ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों को अभिभावकों और विद्यार्थियों के साथ राजनीति करने के बजाय शिक्षा व्यवस्था पर राजनीति से ऊपर उठकर काम करना चाहिए। घोषणाओं और नारों से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी; इसके लिए पर्याप्त सरकारी विद्यालय, प्रशिक्षित शिक्षक, मजबूत विश्वविद्यालय, पारदर्शी फीस व्यवस्था, सुरक्षित स्कूल, प्रभावी नियामक तंत्र और विद्यार्थियों के लिए समान अवसर आवश्यक हैं।
संयुक्त अभिभावक संघ ने केंद्र सरकार से मांग की है कि—
- मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग के साथ-साथ सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने की ठोस कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए।
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को विद्यालय एवं उच्च शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की व्यवस्था की जाए।
- निजी शिक्षण संस्थानों की फीस और अन्य शुल्कों पर प्रभावी नियमन लागू किया जाए।
- विद्यार्थियों पर अनावश्यक शैक्षणिक एवं आर्थिक दबाव कम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाई जाए।
- प्रत्येक शिक्षण संस्थान में विद्यार्थियों की सुरक्षा, शिकायत निवारण और काउंसलिंग की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- शिक्षा को व्यावसायिक शोषण से बचाने के लिए मजबूत नियामक तंत्र बनाया जाए।
- सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में निवेश बढ़ाकर उन्हें इतना सक्षम बनाया जाए कि किसी विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निजी संस्थान अथवा कोचिंग पर मजबूरन निर्भर न रहना पड़े।
अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि देश के बच्चों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहिए जिसमें सफलता का रास्ता परिवार की आर्थिक क्षमता से तय न हो। सरकार यदि वास्तव में युवाओं और विद्यार्थियों के भविष्य की चिंता करती है तो उसे कोचिंग के सहारे शिक्षा व्यवस्था चलाने के बजाय स्कूल और विश्वविद्यालयों को मजबूत करना होगा। आज जरूरत मुफ्त कोचिंग की ही नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा व्यवस्था से आजादी की है जिसमें अभिभावक फीस और मनमानी के बोझ तले दबे हों और बच्चे अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हों। संयुक्त अभिभावक संघ इस मुद्दे पर देशभर के अभिभावकों और विद्यार्थियों की आवाज को मजबूती से उठाता रहेगा।

