
दक्षिणी दिल्ली -भारत नदियों का देश कहलाता है, फिर भी जल संकट उसकी गरदन पर मंडराता साया बनता जा रहा है। पर्यावरण कॉलिंग ग्रुप द्वारा आयोजित ‘जल बचाओ पदयात्रा 3.0’ ने रविवार को बदरपुर में इस कड़वी सच्चाई को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया। संयोजक अनिल महाशय के नेतृत्व में सैकड़ों पर्यावरण प्रेमियों ने पदयात्रा निकालकर स्पष्ट संदेश दिया पानी बचाया जा सकता है, बनाया नहीं जा सकता। अनिल महाशय ने पदयात्रा को संबोधित करते हुए कहा, “यह चिंतन का विषय है कि नदियों, झीलों और अच्छी वर्षा वाले क्षेत्रों वाला हमारा देश तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश को नदियों का मायका कहा जाता है, अनेक शहर झीलों के लिए प्रसिद्ध हैं, फिर भी जल की बर्बादी, स्रोतों का प्रदूषण और उदासीनता ने स्थिति को भयावह बना दिया है।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप नहीं दिया गया, तो भविष्य में जल युद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। “जल ही जीवन है, लेकिन दूषित जल बीमारी और मौत का कारण बन रहा है। आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए आज हमें हर बूंद का महत्व समझना होगा,” महाशय ने जोर देकर कहा।

पदयात्रा में रमाकांत चौधरी अध्यक्ष प्रवासी चेतना मंच, राजेश शर्मा, भूपसिंह यादव, श्याम सिंह यादव, अजय मित्तल, एडवोकेट गोविन्द गोयल, एडवोकेट आर. बी. सिंह, डॉ. जगदीश चौधरी, के. पी. सिंह, किरण त्रिपाठी, रघुबीर सिंह, अरुण सिंह, गोविन्द गोयल एडवोकेट, आ बी सिंह एडवोकेट, मयंक शर्मा एडवोकेट, सत्यपाल सिंह, किरण त्रिपाठी, मनीष बंसल, अरुण सिंह, भोपाल सिंह पुंडीर, नरेंद्र मिश्रा, रमाकांत दीक्षित, डंबर सिंह तनवर विजय पाल, रोशनलाल कौनड़ल, हरि प्रकाश गुप्ता, पवन वशिष्ठ, अनिल रस्तोगी, सहित बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक शामिल हुए। प्रतिभागियों ने जल संरक्षण के नारे लगाते हुए आमजन को जागरूक किया और पानी बचाने को व्यापक जन आंदोलन बनाने का आह्वान किया। वक्ताओं ने जल संकट को मात्र पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बताया। उन्होंने वर्षा जल संचयन, जल पुनर्भरण, स्रोतों की सफाई और प्रदूषण रोकथाम को हर नागरिक की जिम्मेदारी बनाने पर जोर दिया। अभियान के समापन पर सभी उपस्थित लोगों ने जल संरक्षण को जीवन का संकल्प बनाने और समाज में इसके प्रति निरंतर जागरूकता फैलाने का सामूहिक संकल्प लिया। जल संकट अब कोई दूर की कहानी नहीं है। दिल्ली जैसे महानगरों से लेकर ग्रामीण भारत तक पानी की किल्लत बढ़ रही है। ऐसे में पर्यावरण कॉलिंग ग्रुप जैसी पहलें न केवल जागरूकता फैला रही हैं, बल्कि इस बात की याद दिला रही हैं कि प्रकृति के साथ किए गए विश्वासघात का खामियाजा आने वाली पीढ़ियां भुगतेंगी।
समय अब है—हर बूंद, हर नागरिक, हर कदम। इति

