
नई दिल्ली। भारत का सीमलेस पाइप उद्योग आयात पर निर्भरता कम करने और ‘मेक इन इंडिया’ के तहत नए प्रोडक्ट के उत्पादन में लगा हुआ है। जहां कुछ साल पहले भारत के तेल और गैस खोज़ में लगने वाले सीमलेस पाइप विदेशों से आयात होते थे, लेकिन अब यह सभी उत्पाद भारतीय कंपनियां बनाने लगी है। साथ ही अब भारतीय कंपनियां इन उत्पादों का निर्यात भी करने लगी है। सीमलेस ट्यूब मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, आयात पर रोक और निर्यात में बढ़ोतरी की वजह से देश को हर साल करीब 1.4 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 11,600 करोड़ रुपये) की विदेशी मुद्रा बचत और आय हो रही है।
एसोसिएशन की सदस्य लाल बाबा सीमलेस के अमित धानुका ने कहा कि भारतीय निर्माता आज लगभग सभी महत्वपूर्ण सीमलेस पाइप और ट्यूब का उत्पादन कर रहे हैं, कुछ साल पहले इनमें से बहुत सारे विशेष सीमलेस पाइप विदेशों से आयात किए जाते थे। फिलहाल तेल-गैस खोज़ में काम आने वाले सभी तरह के सीमलेस पाइप का उत्पादन भारतीय कंपनियां कर रही हैं, इसमें क्रोम-13 एक विशेष उत्पाद है, जिसको अब कई भारतीय कंपनियां बना रही है, पहले इस उत्पाद के लिए पूरी तरह से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। इस तरह से मेक इन इंडिया के चलते हर साल करीब देश को हर साल लगभग 6000 हज़ार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है और घरेलू कंपनियां हर साल करीब इतना ही सीमलेस पाइप और ट्यूब का निर्यात कर रही हैं। दोनों को मिलाकर भारतीय सीमलेस कंपनियां करीब 12 हजार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा का फायदा देश को दे रही हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय उद्योग ने अत्याधुनिक तकनीक विकसित कर उन विशेष ग्रेड के सीमलेस पाइपों का निर्माण शुरू कर दिया है, जिनके लिए पहले लगभग पूरी तरह विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता था। इससे ऊर्जा, तेल एवं गैस, रक्षा और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में भारत की आत्मनिर्भरता को मजबूती मिली है।
जे आर सीमलेस के नरेंद्र अग्रवाल के मुताबिक, सीमलेस पाइप उद्योग की यह उपलब्धि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के विजन की सफलता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियां अब विश्वस्तरीय गुणवत्ता वाले सीमलेस पाइप का निर्माण कर वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रही हैं।

