
लोकतंत्र में सरकारें जनता के सवालों का जवाब देती हैं या सवाल पूछने वालों पर पेलेट गन चलाती हैं? क्या सरकार बच्चों को सुरक्षा देती है या उनके खिलाफ करंट लगाने वाली बैटन का इस्तेमाल करती है? क्या बच्चियों की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है या प्रदर्शन के दौरान पुरुष पुलिसकर्मियों को उनके साथ बदसलूकी की छूट दी जा सकती है?

यह सवाल किसी राजनीतिक बयान या विपक्ष के आरोपों से पैदा नहीं हुए हैं। द हिंदू की एक रिपोर्ट में संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक , बच्चों के खिलाफ पेलेट गन और करंट लगाने वाली बैटन का इस्तेमाल किया गया। पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा बच्चियों के साथ बदसलूकी के आरोप भी सामने आए हैं।
अगर यह आरोप सही हैं तो मामला सिर्फ पुलिस कार्रवाई का नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल है, जिसमें अपने सवाल लेकर संसद की ओर बढ़ रहे बच्चों को राज्य की ताकत का सामना करना पड़ता है।
यह कैसा लोकतंत्र है?
एक तरफ संसद का सत्र चल रहा है। दूसरी तरफ संसद से कुछ ही दूरी पर नागरिकों की आवाज को दबाने के लिए पुलिस बल तैनात है। बच्चे अपनी मांगों और सवालों के साथ संसद की ओर बढ़ते हैं तो उन्हें रोकने के लिए लाठियां चलती हैं। पेलेट गन और करंट लगाने वाली बैटन के इस्तेमाल के आरोप सामने आते हैं। बच्चियों के साथ पुलिसकर्मियों की बदसलूकी के आरोप लगते हैं। और फिर सरकार कहती है कि देश में लोकतंत्र मजबूत हो रहा है।
लोकतंत्र मजबूत होने का अर्थ क्या है? क्या इसका अर्थ सिर्फ यह है कि चुनाव समय पर हो जाएं और सरकार बहुमत से बन जाए? क्या चुनाव जीतने के बाद सरकार को यह अधिकार मिल जाता है कि वह नागरिकों के सवालों का जवाब देने के बजाय पुलिस भेज दे? लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं है। लोकतंत्र चुनाव के बाद शुरू होता है। चुनाव जीतने वाली सरकार को पांच साल तक जनता के सवालों का सामना करना पड़ता है। उसे आलोचना सुननी पड़ती है। उसे विरोध झेलना पड़ता है। उसे असहमति का सम्मान करना पड़ता है।
लेकिन अगर सरकार हर असहमति को खतरा समझने लगे तो लोकतंत्र का अर्थ ही बदल जाता है।
आज जो तस्वीर दिखाई दे रही है, उसमें सवाल पूछने वाले हर वर्ग के सामने राज्य की ताकत खड़ी है।
बच्चे संसद की ओर जाते हैं तो पुलिस खड़ी है। विपक्ष प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन करता है तो हिरासत तैयार है। किसान दिल्ली में महापंचायत करना चाहते हैं तो राजधानी की सीमाओं पर दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। लोग प्रदर्शनकारियों तक पहुंच न सकें, इसके लिए दिल्ली मेट्रो के 16 स्टेशन बंद कर दिए जाते हैं।
सवाल यह है कि सरकार आखिर किससे डर रही है?
बच्चों से? किसानों से? विपक्ष से? या उन सवालों से, जिनका उसके पास कोई जवाब नहीं है?
अगर बच्चे गलत हैं तो सरकार उन्हें समझा सकती है। अगर उनकी मांग गलत है तो सरकार तथ्य रख सकती है। अगर उनका आंदोलन कानून के खिलाफ है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन पेलेट गन और करंट लगाने वाली बैटन का इस्तेमाल किसी लोकतांत्रिक सरकार की पहली प्रतिक्रिया नहीं हो सकती। किसी भी लोकतंत्र में पुलिस बल का इस्तेमाल अंतिम विकल्प होना चाहिए। खासकर तब, जब सामने बच्चे हों। बच्चों के खिलाफ बल प्रयोग के आरोप अपने आप में गंभीर हैं। और अगर इस बल प्रयोग में पेलेट गन और करंट लगाने वाली बैटन का इस्तेमाल हुआ है तो इसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
सरकार को सिर्फ यह कहकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए कि पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की। कानून-व्यवस्था का अर्थ यह नहीं है कि नागरिकों के अधिकारों को ही खत्म कर दिया जाए।
कानून-व्यवस्था नागरिकों की सुरक्षा के लिए होती है, नागरिकों को डराने के लिए नहीं। बच्चियों के साथ पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा बदसलूकी के आरोप तो और भी गंभीर हैं। यहां सवाल सिर्फ पुलिस की कार्रवाई का नहीं, बल्कि राज्य की जवाबदेही का है। अगर किसी प्रदर्शन के दौरान बच्चियों के साथ बदसलूकी हुई है तो दोषी कौन है? क्या सरकार ने इसकी जांच कराई? क्या किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई हुई? क्या सरकार ने पीड़ित बच्चियों की शिकायत सुनी?
या फिर हर बार की तरह यह भी कुछ दिनों बाद खबरों की भीड़ में दब जाएगा?
यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पुलिस की वर्दी किसी को कानून से ऊपर कर दे। पुलिस का काम नागरिकों की सुरक्षा करना है। प्रदर्शनकारी नागरिक भी नागरिक हैं। उनके विचार सरकार के खिलाफ हो सकते हैं, लेकिन वे कानून के संरक्षण से बाहर नहीं हो जाते। और अगर वह बच्चे हैं तो राज्य की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक पुलिस कार्रवाई के रूप में देखना भी पर्याप्त नहीं होगा। क्योंकि यह अकेली घटना नहीं है। विपक्षी नेता प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना देने जाते हैं तो उन्हें जबरन हिरासत में ले लिया जाता है। विपक्ष सरकार से असहमति जताता है तो उसे राजनीतिक विरोध के बजाय कानून-व्यवस्था की समस्या बना दिया जाता है।
किसान दिल्ली में महापंचायत करना चाहते हैं तो राजधानी की सीमाओं पर दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं। वही किसान, जिनके नाम पर राजनीतिक दल चुनावों में बड़े-बड़े वादे करते हैं, जब अपनी बात कहने राजधानी आते हैं तो अचानक वे सरकार के लिए खतरा बन जाते हैं। किसानों को रोकने के लिए सड़कें खोदना, बैरिकेड लगाना, कंटीले तार लगाना और दीवारें खड़ी करना क्या लोकतांत्रिक समाधान है? सरकार किसान नेताओं से बात कर सकती है। उन्हें दिल्ली आने की अनुमति दे सकती है। उनके लिए निर्धारित स्थान तय कर सकती है। उनकी मांगें सुन सकती है। लेकिन बातचीत के बजाय राजधानी को किले में बदल देना किस लोकतांत्रिक सोच का प्रमाण है? और जब सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली मेट्रो के 16 स्टेशन बंद कर देती है कि लोग आंदोलन तक न पहुंच सकें, तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है।
मेट्रो सार्वजनिक परिवहन है। वह किसी सरकार या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। आम आदमी उसका इस्तेमाल करता है। छात्र, कर्मचारी, मजदूर, व्यापारी और मरीज l हर वर्ग मेट्रो पर निर्भर है।
अगर किसी आंदोलन के कारण मेट्रो स्टेशन बंद किए जाते हैं तो सरकार को जनता को स्पष्ट जवाब देना चाहिए कि यह निर्णय क्यों लिया गया। क्या हर विरोध को रोकने के लिए सार्वजनिक परिवहन बंद कर देना लोकतंत्र का नया तरीका है? अगर कल किसी सरकार को किसी विरोध से परेशानी हो तो क्या वह सड़कें बंद कर देगी? मेट्रो रोक देगी? इंटरनेट बंद कर देगी? राजधानी की सीमाओं पर दीवार खड़ी कर देगी?
फिर जनता अपनी बात कहेगी कहां?
लोकतंत्र में जनता के पास विरोध करने का अधिकार है। यह अधिकार सरकार की कृपा से नहीं मिला है। यह संविधान ने दिया है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिक अधिकार है। सरकार को उससे असहमति हो सकती है, लेकिन वह असहमति के अधिकार को ही समाप्त नहीं कर सकती।
यहां एक बुनियादी फर्क समझना जरूरी है। सरकार के पास कानून लागू करने की शक्ति है, लेकिन जनता की आवाज बंद करने का अधिकार नहीं। सरकार के पास पुलिस है, लेकिन पुलिस को राजनीतिक असहमति कुचलने का हथियार बनाने का अधिकार नहीं। सरकार के पास बहुमत है, लेकिन बहुमत उसे निरंकुश होने का लाइसेंस नहीं देता।
संसद में बहुमत सरकार को कानून बनाने की शक्ति देता है। जनता पर शासन करने की निरंकुश शक्ति नहीं।
लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब सरकार के सामने उसके समर्थक नहीं, उसके आलोचक खड़े होते हैं। जब जनता उसकी नीतियों पर सवाल उठाती है। जब किसान उसके फैसलों से असहमत होते हैं। जब बच्चे अपनी मांगों को लेकर संसद की ओर बढ़ते हैं। जब विपक्ष प्रधानमंत्री के आवास के बाहर विरोध करता है।
ऐसे समय में सरकार का व्यवहार बताता है कि लोकतंत्र कितना मजबूत है।
अगर जवाब संवाद है तो लोकतंत्र मजबूत है।
अगर जवाब बहस है तो लोकतंत्र मजबूत है।
अगर जवाब तथ्यों और तर्कों से दिया जाता है तो लोकतंत्र मजबूत है।
लेकिन अगर जवाब लाठी है, पेलेट गन है, करंट वाली बैटन है, हिरासत है, बैरिकेड है, दीवार है और बंद मेट्रो स्टेशन है,तो फिर सवाल उठेगा ही कि लोकतंत्र की ताकत बढ़ रही है या सत्ता का डर?
सरकारों को यह समझना होगा कि जनता को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है, लेकिन उसके सवालों को नहीं। किसी नेता को हिरासत में लिया जा सकता है, लेकिन उसकी राजनीतिक आवाज को नहीं। किसानों को दिल्ली आने से रोका जा सकता है, लेकिन उनकी मांगों को नहीं। मेट्रो स्टेशन बंद किए जा सकते हैं, लेकिन लोगों के भीतर उठ रहे सवालों को नहीं।
और बच्चों पर पेलेट गन चलाने या करंट लगाने वाली बैटन के इस्तेमाल के आरोपों को तो किसी भी हालत में सामान्य कानून-व्यवस्था की घटना मानकर टाला नहीं जा सकता।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। जांच यह तय करे कि पुलिस ने किस परिस्थिति में बल का इस्तेमाल किया, किसके आदेश पर किया और क्या बच्चों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई कानून और मानवीय मर्यादा के अनुरूप थी। बच्चियों के साथ बदसलूकी के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को उसकी वर्दी या पद के कारण संरक्षण नहीं मिलना चाहिए। क्योंकि राज्य की ताकत का अर्थ यह नहीं कि वह नागरिकों से जवाबदेही से मुक्त हो जाए।
सरकार को यह भी तय करना होगा कि वह नागरिकों को अपने विरोधी मानती है या लोकतंत्र का हिस्सा। क्योंकि सरकारें आती-जाती रहती हैं। सत्ता बदलती रहती है। आज जो सरकार सत्ता में है, कल विपक्ष में हो सकती है। आज जो विपक्ष सड़क पर है, कल सरकार में हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र और नागरिक अधिकार किसी एक सरकार की संपत्ति नहीं हैं।
आज अगर सरकार विपक्ष की आवाज दबाने के लिए हिरासत का इस्तेमाल करती है तो कल कोई दूसरी सरकार उसके खिलाफ उसी हथियार का इस्तेमाल कर सकती है। आज अगर किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए दीवारें खड़ी की जाती हैं तो कल कोई और सरकार किसी दूसरे आंदोलन के रास्ते में दीवार खड़ी कर सकती है। आज अगर बच्चों के खिलाफ बल प्रयोग को सामान्य बना दिया जाता है तो कल किसी भी नागरिक आंदोलन के खिलाफ राज्य की ताकत के इस्तेमाल को सही ठहराया जा सकता है।
यही कारण है कि सवाल किसी एक आंदोलन का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या भारत में असहमति की जगह बची है? क्या सरकार से सवाल पूछना अभी भी नागरिक अधिकार है? क्या संसद के बाहर जनता की आवाज सुनी जा सकती है? क्या किसान अपनी राजधानी में आकर अपनी बात कह सकते हैं? क्या विपक्ष प्रधानमंत्री आवास के बाहर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकता है? क्या बच्चे अपने सवाल लेकर संसद की ओर जा सकते हैं? और क्या बच्चियां पुलिस की मौजूदगी में खुद को सुरक्षित महसूस कर सकती हैं?
इन सवालों का जवाब सरकार को देना होगा।
क्योंकि लाठी किसी सवाल का जवाब नहीं होती। पेलेट गन लोकतंत्र की भाषा नहीं है। करंट देने वाली बैटन शासन का विकल्प नहीं है। हिरासत असहमति का समाधान नहीं है। दीवारें जनता के सवालों को रोक नहीं सकतीं। और मेट्रो स्टेशन बंद करने से लोकतंत्र की आवाज बंद नहीं होती। लोकतंत्र में सरकार जनता से ऊपर नहीं होती। सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
और जिस दिन सरकार जनता के सवालों का जवाब देने के बजाय जनता को ही रोकने लगे, उस दिन समस्या जनता में नहीं होती। समस्या सत्ता के कानों में होती है। क्योंकि लोकतंत्र में जनता को डराया नहीं जाता बल्कि उसे सुना जाता है।

