नीरजा मोदी स्कूल मामला : अमायरा प्रकरण में न्यायालय ने संज्ञान के प्रश्न पर आदेश के लिए 27 जुलाई की तारीख तय की, पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद

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जयपुर। 9 वर्षीय 4 कक्षा की छात्रा अमायरा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई नीरजा मोदी स्कूल में मृत्यु से जुड़े बहुचर्चित प्रकरण में आज माननीय न्यायालय में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान पीड़ित पक्ष की ओर से अधिवक्ता ने आरोप-पत्र में उपलब्ध साक्ष्यों एवं न्यायालय में पूर्व में दायर आवेदन के आधार पर विस्तृत बहस करते हुए आग्रह किया कि कक्षा अध्यापिका के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 107 के अंतर्गत नाबालिग बच्चे को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने के आरोप में संज्ञान लिया जाए।

साथ ही अधिवक्ता ने न्यायालय से यह भी निवेदन किया कि विद्यालय की प्रधानाचार्या एवं चेयरमैन/प्रबंधन के विरुद्ध किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 75 के तहत भी संज्ञान लिया जाए, क्योंकि विद्यालय में अध्ययनरत बच्चों की सुरक्षा, संरक्षण और गरिमापूर्ण वातावरण सुनिश्चित करना केवल कक्षा अध्यापक का ही नहीं, बल्कि प्रधानाचार्य एवं विद्यालय प्रबंधन का भी वैधानिक दायित्व है।

सुनवाई के दौरान शिक्षा मंत्रालय की स्कूल सेफ्टी एंड सिक्योरिटी गाइडलाइंस तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया गया। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यदि विद्यालय प्रबंधन बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहता है तो उसकी जवाबदेही तय होना आवश्यक है और संस्थागत लापरवाही को केवल व्यक्तिगत त्रुटि मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।

पीड़ित पक्ष की दलील सुनने के उपरांत माननीय न्यायालय ने आवेदन एवं उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर संज्ञान के प्रश्न पर आदेश पारित करने के लिए सोमवार 27 जुलाई 2026 की तारीख निर्धारित की है।

अमायरा के पिता विजय मीणा ने कहा, “हम पिछले कई महीनों से अपनी बेटी के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारी केवल यही मांग है कि जिन लोगों की लापरवाही और जिम्मेदारी इस मामले में सामने आई है, उन सभी के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो। हमें विश्वास है कि न्यायालय तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर उचित निर्णय देगा। यह लड़ाई केवल अमायरा की नहीं, बल्कि देश के हर उस बच्चे की सुरक्षा की लड़ाई है जो विद्यालयों में पढ़ने जाता है।”

संयुक्त अभिभावक संघ के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा, “यदि किसी विद्यालय में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था विफल होती है तो केवल एक शिक्षक को जिम्मेदार ठहराकर संस्थागत जवाबदेही से बचा नहीं जा सकता। प्रधानाचार्य और विद्यालय प्रबंधन की जिम्मेदारी कानून और सरकारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट रूप से निर्धारित है। आज न्यायालय में इन्हीं महत्वपूर्ण बिंदुओं को रखा गया है। हमें उम्मीद है कि न्यायालय का आगामी आदेश देशभर के निजी एवं सरकारी विद्यालयों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देगा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसमें लापरवाही किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जा सकती।”

उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि देश के करोड़ों विद्यार्थियों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों से जुड़ा हुआ है। यदि संस्थागत जवाबदेही तय होती है तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम सरहानीय है।

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