मुद्दे की बात :गौरैया नहीं, हमारी विकास की समझ गायब हो रही है:लेखक वरिष्ठ संपादक :आलोक गौड़

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गौरैया के कम होते जाने पर चिंता जताना आसान है, लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर वह जाए तो जाए कहां? जिस शहर में कभी हर आंगन, छज्जे, खिड़की और पेड़ पर उसकी चहचहाहट सुनाई देती थी, उसी शहर ने धीरे-धीरे उसके लिए जगह ही कितनी छोड़ी है। कंक्रीट के जंगल बढ़ते गए, पेड़ और झाड़ियां घटती गईं, कीड़े-मकोड़े और प्राकृतिक भोजन कम होते गए और घरों की बनावट ऐसी होती चली गई कि घोंसला बनाने की जगह तक नहीं बची। हमने विकास को इतना एकतरफा बना दिया कि उसमें इंसान के अलावा किसी दूसरे जीव के लिए जगह बची ही नहीं।


गौरैया का गायब होना इसलिए महज एक पक्षी की प्रजाति के पूरी तरह से विलुप्त हो जाने के संकट की खबर नहीं है। यह उस शहरी विकास के उस मॉडल पर भी गंभीर सवाल खडे करता है, जिसमें सड़कें चौड़ी होती हैं, इमारतें ऊंची होती हैं, बाजार फैलते जाते हैं और आबादी लगातार बढ़ती है, लेकिन हवा, हरियाली, पानी और जैव विविधता के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जाती है। शहरों को आधुनिक बनाने की होड़ में हमने यह पूछना ही छोड़ दिया कि इस आधुनिकता की कीमत कौन चुका रहा है।
कभी गौरैया हमारे घरों की स्थायी पड़ोसी हुआ करती थी। सुबह उसकी चहचहाहट से दिन शुरू होता था और शाम को वह छज्जों, पेड़ों और आसपास की झाड़ियों में लौट आती थी। उसे किसी विशेष संरक्षण केंद्र की जरूरत नहीं थी। हमारे घर ही उसका आश्रय थे, हमारे आंगन उसका संसार और हमारे आसपास की हरियाली उसका भोजन जुटाने का आधार। लेकिन धीरे-धीरे हमने अपने घरों को बंद डिब्बों में और शहरों को कंक्रीट के जंगलों में बदल दिया। पुराने मकान टूटे तो उनकी जगह ऐसी इमारतें खड़ी हो गईं जिनमें गौरैया के लिए एक छोटा-सा कोना भी नहीं बचा। सवाल केवल घोंसले का भी नहीं है। गौरैया के जीवन के लिए भोजन चाहिए और भोजन के लिए वह प्राकृतिक वातावरण चाहिए जिसमें कीड़े-
मकोड़े , छोटे पौधे, झाड़ियां और स्थानीय वनस्पतियां मौजूद हों। जब शहरों में हर खाली जगह पर सीमेंट बिछा दिया जाएगा, झाड़ियों को ‘गंदगी’ समझकर साफ कर दिया जाएगा और पेड़ों की जगह सजावटी पौधों से काम चलाया जाएगा तो गौरैया के लिए भोजन कहां से आएगा? जिस पर्यावरण को हमने उसके लिए अनुपयोगी बनाया है, उसी पर्यावरण में हम खुद भी सांस ले रहे हैं। दिल्ली जैसे महानगर में यह सवाल और गंभीर हो जाता है। यहां प्रदूषण केवल हवा में मौजूद जहरीले कणों का नाम नहीं है। प्रदूषण उस पूरी जीवन-व्यवस्था का संकट है जिसमें पेड़ कम हो रहे हैं, खुले स्थान सिकुड़ रहे हैं, जलस्रोत दब रहे हैं, मिट्टी कंक्रीट के नीचे दफन हो रही है और गर्मी लगातार बढ़ रही है। गौरैया इस बदलाव की सबसे छोटी और सबसे बेआवाज गवाहों में से एक है।
हम अक्सर पूछते हैं कि गौरैया की संख्या क्यों घट रही है। लेकिन शायद सवाल उलटा पूछा जाना चाहिए कि हमने ऐसा शहर क्यों बना दिया जिसमें गौरैया रह ही नहीं सकती? हमने उसके रहने की जगह छीनी, भोजन का प्राकृतिक आधार छीना, पेड़-पौधों और झाड़ियों को हटाया और फिर उसके गायब होने पर चिंता जताने लगे। यह कुछ वैसा ही है जैसे बीमारी पैदा होने के कारण का पता लगा कर उनका निदान करने के बजाय सिर्फ उसके लक्षण का इलाज करने की कोशिश करना।
मोबाइल टावरों और दूसरी वजहों को लेकर भी बहस होती रही है, लेकिन गौरैया के संकट को किसी एक कारण तक सीमित कर देना आसान जवाब होगा। असली तस्वीर कहीं बड़ी है। बदलता शहरीकरण, भवन निर्माण का तरीका, हरियाली में कमी, कीटनाशकों का इस्तेमाल, प्राकृतिक भोजन का संकट और प्रदूषित वातावरणl यह सभी मिलकर उस दुनिया को बदल रहे हैं जिसमें गौरैया कभी सहजता से रहती थी।
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस बदलाव को हम विकास कहते हैं।
विकास जरूरी है, शहर भी जरूरी हैं, सड़कें और इमारतें भी जरूरी हैं। लेकिन ऐसा विकास किस काम का, जिसमें पेड़ काटकर सड़क तो बन जाए, मगर उस सड़क पर चलने वाले इंसान को साफ हवा न मिले? ऐसा शहर किस काम का, जहां गगनचुंबी इमारतें तो हों, लेकिन पक्षियों के लिए घोंसले की जगह न हो? ऐसी आधुनिकता का क्या अर्थ, जिसमें प्रकृति को केवल सजावट के लिए जगह मिले और जीवन के लिए नहीं? गौरैया कोई भाषण नहीं देती, कोई शिकायत दर्ज नहीं कराती और न ही अपने लिए कोई आंदोलन खड़ा कर सकती है। वह बस धीरे-धीरे हमारे आसपास से गायब हो जाती है। लेकिन उसकी खामोशी को नजरअंदाज करना खतरनाक है। प्रकृति में किसी छोटे जीव का गायब होना अक्सर किसी बड़े असंतुलन का संकेत होता है।
इसलिए गौरैया को बचाने की बात केवल उसे बचाने की बात नहीं है। यह अपने शहरों को फिर से रहने लायक बनाने की बात है। पेड़ बचाने, झाड़ियां बचाने, खुले स्थान बचाने, पानी बचाने और ऐसी वास्तुकला विकसित करने की बात है जिसमें मनुष्य के साथ दूसरे जीवों के लिए भी थोड़ी जगह हो। क्योंकि सवाल अंततः गौरैया का नहीं, हमारा है। जिस शहर में गौरैया के लिए जगह नहीं बची, क्या वह शहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और स्वस्थ रह पाएगा?
गौरैया की चहचहाहट अगर हमारे शहरों से गायब हो रही है तो इसे सिर्फ एक पक्षी की विदाई मत समझिए। यह हमारे विकास की उस सोच पर सवाल है, जिसने प्रकृति को साथ लेकर चलने के बजाय उसे रास्ते से हटाना सीख लिया है। और अगर अब भी हमने यह सवाल नहीं पूछा कि विकास की इस कीमत का भुगतान कौन कर रहा है, तो कल शायद गौरैया के साथ-साथ वह दुनिया भी गायब मिले, जिसमें हम खुद रहना चाहते हैं।

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