ऊंचा सुनती है :—कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैरना ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर, पानी पीजिए, राष्ट्र निर्माण कीजिए! –: लेखक वरिष्ठ सम्पादक :- आलोक गौड़


नई दिल्ली। देश को आखिरकार वह सौभाग्य प्राप्त हो ही गया, जिसका इंतजार उसे पिछले अठहत्तर वर्षों से था। आज़ादी के बाद अनेक प्रधानमंत्री आए, अनेक गए। किसी ने हरित क्रांति की बात की, किसी ने श्वेत क्रांति की, किसी ने उदारीकरण किया, किसी ने परमाणु शक्ति का प्रदर्शन किया, किसी ने सूचना क्रांति की नींव रखी, लेकिन किसी के मन में यह दिव्य विचार नहीं आया कि भीषण गर्मी में मंत्रियों से लेकर आम नागरिकों को पानी पीने की सलाह दी जाए। यह नहीं प्रधानमंत्री जी मंत्रियों से लेकर आम जनता के स्वास्थ्य को लेकर इतने चिंतित हो गए कि सारा कामकाज व जिम्मेदारी भूल कर उन्होंने पहले अपनी सरकार के मंत्रियों को बुला कर उन्हें पानी पीने की नसीहत दी l बाद में अपने मन की बात कार्यक्रम के जरिये लोगों तक भी यही संदेश पहुंचाया l
इतिहास गवाह है कि इस महान कमी के कारण देश ने कितना कुछ खोया। अगर 1952 में मंत्रियों को पानी पीने का निर्देश मिल गया होता तो शायद भारत आज अमेरिका को नहीं, अमेरिका भारत को विकासशील देश कह रहा होता। अगर 1975 में पानी पीने का राष्ट्रीय अभियान चल गया होता तो शायद आपातकाल की नौबत ही न आती। अगर 1991 में आर्थिक सुधारों के साथ-साथ “हर मंत्री, हर घंटे पानी” योजना लागू हो जाती तो विदेशी निवेशकों की लाइनें संसद मार्ग से लेकर इंडिया गेट तक लगी होतीं।


लेकिन जो काम नेहरू नहीं कर पाए, जो इंदिरा गांधी नहीं कर पाईं, जो अटल बिहारी वाजपेयी नहीं कर पाए, जो मनमोहन सिंह नहीं कर पाए, वह आखिरकार इस युग में संभव हुआ। मंत्रिमंडल की बैठक में मंत्रियों को समझाया गया कि गर्मी में खूब पानी पीना चाहिए। प्यास न लगे तो भी पीना चाहिए। शरीर में पानी की कमी नहीं होने देनी चाहिए।
सुनने में यह आपको सामान्य सलाह लग सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि आप मंत्री नहीं हैं।
आप नहीं जानते कि मंत्री होना कितना कठिन काम है। सुबह से शाम तक कैमरों के सामने मुस्कुराना, उद्घाटन करना, फीता काटना, ट्वीट करना, विपक्ष को कोसना, पार्टी की उपलब्धियों को ऐतिहासिक बताना और हर तीसरे वाक्य में नेतृत्व की दूरदर्शिता का उल्लेख करनाl इन सबके बीच पानी पीने का समय निकालना आसान नहीं होता। सूत्र बताते हैं कि कुछ मंत्री तो बैठक में आने से पहले घर में भी पानी नहीं पी पाए थे। उनकी पत्नी ने हाथ जोड़कर कहा होगाकि “इतनी गर्मी है, कम से कम एक गिलास पानी तो पी लीजिए।”
मंत्री महोदय भड़क गए होंगे।
“तुम राजनीति को नहीं समझती। मैं यहां पानी पीता रह जाऊं और उधर बैठक में मेरी कुर्सी पर कोई और बैठ जाए तो? तुम चाहती क्या हो? मैं मंत्री रहूं या हाइड्रेटेड रहूं?” पत्नी ने फिर भी साहस करके कहा होगा कि “लेकिन गर्मी बहुत है।” “गर्मी देश में है, मेरे विभाग में नहीं। और फिर प्रधानमंत्री जी को मुझसे ज्यादा मेरी सेहत की चिंता है। जब उन्हें उचित लगेगा, वे स्वयं बता देंगे कि पानी कब पीना है।”
यह कहकर मंत्री जी निकल पड़े होंगे। प्रधानमंत्री निवास पहुंचने पर सभी मंत्रियों के सामने पानी की ठंडी बोतलें रखी थीं। मगर समस्या यह थी कि प्रधानमंत्री बोल रहे थे। अब कोई मंत्री पानी की बोतल खोले भी तो कैसे? कहीं ऐसा न लगे कि उसका ध्यान प्रधानमंत्री के वचनों से ज्यादा पानी में है। यह जोखिम कोई क्यों उठाए?
इसलिए सारे मंत्री प्यासे बैठे रहे। कुछ तो इतने श्रद्धालु निकले कि उन्होंने बोतल को अपनी दृष्टि से ही दूर कर दिया। कहीं नज़र पड़ गई तो मन डोल सकता था।
फिर वह ऐतिहासिक क्षण आया जिसने भारतीय प्रशासनिक इतिहास को नई दिशा दे दी।
एक मंत्री ने धीरे-धीरे बोतल की तरफ हाथ बढ़ाया। दूसरे मंत्री ने यह दृश्य देखा तो समझ गया कि मामला गंभीर है। अगर यह प्रधानमंत्री की सलाह का पहला पालनकर्ता बन गया तो सारी सुर्खियां ले जाएगा। उसने तत्काल बोतल उठाई और गटागट पूरा पानी पी गया। इसके बाद जो हुआ, वह किसी जल संरक्षण अभियान से कम नहीं था।
मंत्री एक-दूसरे से आगे निकलने लगे। कोई एक सांस में बोतल खाली कर रहा था। कोई दूसरी मांग रहा था। कोई यह सिद्ध करने में जुटा था कि प्रधानमंत्री के निर्देशों के प्रति उसकी निष्ठा दूसरों से अधिक है।
जिन्हें डॉक्टर ने कम पानी पीने की सलाह दी थी, वे भी पी रहे थे। जिन्हें बार-बार शौचालय जाने की समस्या थी, वे भी पी रहे थे।
जिन्होंने पहले ही दो लीटर पानी पी रखा था, वे भी पी रहे थे। क्योंकि अब पानी केवल पानी नहीं था। वह निष्ठा का प्रमाणपत्र था।
वफादारी की परीक्षा थी।
राजनीतिक संस्कारों की मौखिक नहीं, तरल परीक्षा थी। कहते हैं बैठक में इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई कि मंत्री पानी क्यों पिएं, कितना पिएं और किस भावना से पिएं। कुछ ने सुझाव दिया कि इस विषय पर एक राष्ट्रीय मिशन चलाया जाना चाहिए। कुछ ने कहा कि इसे नई शिक्षा नीति में शामिल किया जाना चाहिए। एक उत्साही मंत्री ने तो शायद यह भी प्रस्ताव रखा होगा कि हर सरकारी कार्यालय में प्रधानमंत्री के चित्र के नीचे लिखा जाएकि “गर्मी में पानी पीना न भूलें।”बैठक यहीं समाप्त नहीं हुई। फिर चर्चा इस बात पर हुई होगी कि आखिर पिछले प्रधानमंत्रियों ने ऐसी सलाह क्यों नहीं दी। देश को इस लापरवाही का कितना नुकसान उठाना पड़ा। इस ऐतिहासिक चूक के लिए कौन जिम्मेदार है। एक आयोग बनना चाहिए या नहीं। एक श्वेत पत्र जारी होना चाहिए या नहीं। क्योंकि हमारे यहां हर समस्या की जड़ आखिरकार अतीत में ही मिलती है। वर्तमान केवल उपलब्धियों का गोदाम होता है। लेकिन व्यंग्य से अलग हटकर एक प्रश्न पूछना जरूरी है। क्या देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मंत्री पानी पी रहे हैं या नहीं? क्या देश के सामने बेरोजगारी नहीं है? क्या किसानों की आय का संकट समाप्त हो गया?
क्या शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था आदर्श हो चुकी है?
क्या करोड़ों लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो गया?क्या गांवों की महिलाएं सिर पर मटके ढोना छोड़ चुकी हैं?
क्या सूखती नदियां और गिरता भूजल अब चिंता का विषय नहीं रहे? अगर नहीं, तो फिर यह दौर आखिर किस चीज़ का है? शायद यह उस राजनीति का दौर है जिसमें सामान्य बातों को असामान्य उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किया जाता है और असली सवालों को सामान्य शोर समझकर किनारे कर दिया जाता है।
देश को पानी पीने की सलाह से कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आपत्ति तब होती है जब सलाह खबर बन जाए और समस्याएं फुटनोट।
जब प्रतीक नीति पर भारी पड़ जाएं। जब प्रचार शासन पर भारी पड़ जाए। और जब लोकतंत्र में सवालों की जगह तालियां ले लें।पानी पीना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। लेकिन लोकतंत्र के लिए सवाल पूछना उससे भी ज्यादा आवश्यक है।
क्योंकि जिस दिन सवाल सूख जाते हैं, उसी दिन लोकतंत्र निर्जलीकरण का शिकार होने लगता है।

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