
नरेगा (NREGA) को खत्म करने का मतलब है कि अब रोजगार पाना आपका ‘अधिकार’ नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकार की मर्जी पर चलने वाली एक साधारण “योजना” बन जाएगी।
नई दिल्ली: प्रस्तावित बिल के मुताबिक, केंद्र सरकार हर साल हर राज्य के लिए एक 'तय बजट (normative allocation) निश्चित करेगी। अगर इससे ज्यादा कोई खर्च होता है, तो वह राज्य सरकारों को खुद उठाना होगा। यह पहले से तय बजट असल में राज्यों में मिलने वाले रोजगार के दिनों की संख्या पर एक सीमा लगा देगा। मौजूदा बजट में तो केंद्र सरकार अभी एक परिवार को साल में 50 दिन का काम भी नहीं दे पा रही है। और अब, बजट पर रोक लगाकर और राज्यों पर पैसा जुटाने का बोझ डालकर जबकि कई राज्यों के पास पहले से ही पैसे की भारी कमी है, बीजेपी सरकार का 125 दिन रोजगार का दावा महज एक धोखा है।
हक से हटकर सरकारी मर्जी तकः नरेगा (NREGA) को खत्म करने का मतलब है कि अब रोजगार पाना आपका ‘अधिकार’ नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकार की मर्जी पर चलने वाली एक साधारण “योजना” बन जाएगी। यह ‘मांग” पर नहीं, बल्कि सरकार की ‘सप्लाई’ पर निर्भर करेगी।
सिर्फ चुनिंदा इलाकों में कामः काम का अधिकार अब सिर्फ उन ग्रामीण इलाकों तक सीमित रहेगा जिन्हें केंद्र सरकार चुनेगी। जिन इलाकों का नाम सरकार की लिस्ट में नहीं होगा, वहां के मजदूरों को काम की कोई गारंटी नहीं मिलेगी।
काम के दिनों पर रोक: केंद्र सरकार राज्यों के लिए एक बजट (normative allocation) तय कर देगी, जिससे काम के दिनों पर एक सीमा लग जाएगी। अगर काम की मांग उस बजट से ज्यादा होती है, तो उसका खर्चा राज्य सरकार को उठाना होगा। ऐसा माना जा रहा है कि इस तरीके से बीजेपी शासित राज्यों को फायदा पहुंचाया जाएगा और दूसरे राज्यों का नुकसान होगा।
मजदूरी का बोझ राज्यों परः नए नियम के मुताबिक खर्च का बंटवारा 60:40 होगा। इसका मतलब है कि केंद्र सरकार अब पूरी मजदूरी देने की जिम्मेदारी से पीछे हट रही है। इससे गरीब राज्यों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा, वहां काम कम होगा और मजबूरी में लोगों को पलायन करना पड़ेगा।
2 महीने काम की तालाबंदी (Blackout Period): खेती के मुख्य सीजन के दौरान साल में 60 दिनों तक नरेगा का काम पूरी तरह बंद रखा जाएगा। इससे महिलाओं, भूमिहीन मजदूरों और पिछड़े वर्गों की कमाई और उनकी सौदा शक्ति पर बुरा असर पड़ेगा।
ग्राम सभाओं की ताकत खत्म: अब गांवों के काम ग्राम सभा की योजना से नहीं, बल्कि ‘पीएम गति शक्ति योजना’ से जुड़े’ विकसित ग्राम पंचायत प्लान के जरिए तय होंगे। यह पंचायतों की आजादी और 73वां संवैधानिक संशोधन में मिले अधिकारों के खिलाफ है।
तकनीक का अनावश्यक कब्जाः मजदूरों और कर्मचारियों के लिए बायोमेट्रिक जांच बढ़ाई जा रही है। जबकि यह साबित हो चुका है कि डिजिटल हाजिरी (NMMS) और आधार पेमेंट (ABPS) जैसी तकनीकों की वजह से बहुत से मजदूर काम और पैसे से वंचित रह जाते हैं। भ्रष्टाचार रोकने का असली तरीका तकनीक नहीं, बल्कि ग्राम सभा द्वारा की जाने वाली जांच (सामाजिक अंकेक्षण) है।
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का संचालन योगेंद्र यादव ने किया। इसमें अर्थशास्त्री, राजनीतिक नेता, नरेगा मजदूर, विशेषज्ञ और किसान संगठनों के नेता शामिल हुए। प्रभात पटनायक (जेएनयू के वरिष्ठ प्रोफेसर और केरल योजना बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष): उन्होंने जोर देकर कहा कि जब गांवों में संकट का समय होता है, तब ‘रोजगार की गारंटी का अधिकार सबसे अहम भूमिका निभाता है। कमला देवी (ब्यावर, राजस्थान): कमला देवी एक विधवा हैं जो पिछले 18 सालों से नरेगा में काम कर रही हैं। उन्होंने भी यही दर्द बयां किया। उन्होंने बताया कि जब उनके पति की मौत हुई, तो उनके पास न जमीन थी और न ही बच्चे, तब नरेगा ही उनकी कमाई का एकमात्र सहारा था। उन्होंने सवाल पूछा, “नरेगा के बिना में जिंदा कैसे रहूँगी?’ एनी राजा (उपाध्यक्ष, NFIW और मजदूर अधिकार कार्यकर्ता): उन्होंने उस लंबे संघर्ष के बारे में बात की जिसकी वजह से नरेगा कानून बना था। उन्होंने बताया कि समाज के हर तबके की महिलाओं, भूमिहीनों, पिछड़े लोगों और युवाओं ने मिलकर इसके लिए लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने खास तौर पर बताया कि नरेगा ने महिलाओं को ‘समान वेतन’ और ‘आर्थिक आजादी’ देकर उनके जीवन को बेहतर बनाया है।
जयती घोष (प्रसिद्ध अर्थशास्त्री): उन्होंने जोर देकर कहा कि यह बिल भारत के संघीय ढांचे के लिए बहुत खतरनाक है। केंद्र सरकार अक्सर फंड का इस्तेमाल राज्यों को इनाम देने या ‘सजा’ देने के लिए करती है। नरेगा को सबको साथ लेकर चलने के लिए बनाया गया था, लेकिन
नया बिल (GRAMG) केंद्र को पूरी ताकत देता है कि वह खुद तय करे कि काम कहाँ होगा और क्या होगा। सबसे खतरनाक बात यह है कि केंद्र बजट की एक सीमा तय कर देगा, जिसके बाद का सारा खर्चा राज्यों को उठाना होगा। इससे उन गरीब राज्यों पर सबसे बुरा असर पड़ेगा जहाँ नरेगा की सबसे ज्यादा जरूरत है।
मुकेश निर्वासित (MKSS और राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन): उन्होंने नए बिल की धाराओं के बारे में बताया कि कैसे यह बिल काम के अधिकार’ को छीनकर एक ऐसी खोखली गारंटी दे रहा है, जिसे निभाने के लिए सरकार कानूनी रूप से मजबूर नहीं है। श्रावणी देवी (नरेगा मजदूर, राजस्थान): उन्होंने साफ कहा कि नरेगा को जनता ने लड़कर हासिल किया है और जनता इसे खत्म नहीं होने देगी। उन्होंने चेतावनी दी, ‘हम सड़कों पर उतरेंगे और हर मुमकिन विरोध करेंगे, सरकार मजदूरों की ताकत को कम न आंके।”
बी वेंकट (अखिल भारतीय कृषि मजदूर संघ): उन्होंने कहा कि सरकार नरेगा मजदूरों और किसानों के बीच फूट डालने की कोशिश कर रही है। हकीकत यह है कि नरेगा से खेती के काम पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि छोटे किसान और कारीगर भी मजदूरों के इस संघर्ष में साथ हैं। उन्होंने कहा कि यह नया बिल भारत में फिर से एक तरह की बंधुआ मजदूरी और सामंती व्यवस्था पैदा कर देगा। और यह उन सकारात्मक प्रभावों को भी खत्म कर देगा जो नरेगा ने ग्रामीण मजदूरी को बढ़ाने में डाले हैं।
ज्यां ट्रेज (अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता): उन्होंने कहा, “अगर भारत में कोई ऐसा कानून है जिसकी वजह से भारत को विश्वगुरु कहा जा सकता है, तो वह नरेगा है। “उन्होंने बिल के जरिए केंद्र को मिलने वाली असीमित ताकतों पर सवाल उठाए। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे बंगाल में 2021 से काम बंद है और तकनीक के नाम पर मजदूरों को बाहर किया जा रहा है। उन्होंने भी श्रावणी देवी की बात दोहराई कि जब तक यह नया बिल वापस नहीं होता और नरेगा मजबूत नहीं होता, हम नहीं रुकेंगे।
इस हफ्ते मजदूर प्रतिनिधियों ने सांसदों से मुलाकात की ताकि बीजेपी इस बिल को बिना चर्चा के संसद में पास न करा सके। उन्होंने विपक्षी दलों के सांसदों जैसे शशिकांत सेंथिल (कांग्रेस), मनोज कुमार झा (RJD), कनिमोझी करुणानिधि (DMK) और एनडीए के सहयोगी दल TDP के लावू श्री कृष्णा देवारयालु से भी मुलाकात की। साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राष्ट्रीय नेताओं के साथ भी चर्चा की गई।
नरेगा को रद्द करने वाला (VB-G RAM G) बिल कोई सुधार नहीं है, बल्कि यह उन संवैधानिक गारंटियों को वापस छीनने की कोशिश है जिन्हें मजदूरों ने दशकों के कड़े संघर्ष के बाद हासिल किया था। नरेगा संघर्ष मोर्चा स्पष्ट रूप से इस बिल को खारिज करता है और इसे तुरंत वापस लेने की मांग करता है।
नरेगा संघर्ष मोर्चा ने 19 दिसंबर 2025 को राष्ट्रीय विरोध दिवस घोषित किया है। इस दिन ग्रामीण और कृषि मजदूर इस जनविरोधी बिल के खिलाफ राष्ट्रीय, राज्य, जिला और स्थानीय स्तर पर विरोध करेंगे, ताकि एनडीए (NDA) सरकार को इसे वापस लेने के लिए मजबूर किया जा सके। मजदूरों और उनके संगठनों की सहमति और भागीदारी के बिना मनरेगा को खत्म करने या उसमें मौलिक बदलाव करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
