मुद्दे की बात :वर्दी पर सत्ता का आदेश भारी पड़ेगा या संविधान?:लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-आलोक गौड़

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लोकतंत्र में सरकार को चुनौती देना अपराध नहीं है। सरकार से सवाल पूछना अपराध नहीं है। अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरना भी अपराध नहीं है। अपराध तब बनता है जब कानून टूटता है। लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर राज्य की ताकत का इस्तेमाल भी कानून की सीमा से बाहर नहीं जा सकता। यही वह बुनियादी बात है जिसे 20 जुलाई के छात्र आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने एक बार फिर सामने ला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि छात्रों का प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और प्रदर्शन करना उनका संवैधानिक अधिकार है। जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने वालों की जवाबदेही तय होगी। पहली नजर में मामले में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत दिखाई देती है। अदालत ने प्रदर्शन से जुड़े सीसीटीवी, ड्रोन फुटेज, बॉडी कैमरा और दूसरे डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का आदेश दिया है। जिन नाबालिग प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया है। यह महज किसी एक आंदोलन के बारे में अदालत की टिप्पणी नहीं है। यह लोकतंत्र में राज्य की शक्ति की सीमा को लेकर एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है।
और शायद इसीलिए इस सुनवाई को केवल 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। सवाल बड़ा है कि क्या सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वाले नागरिक के अधिकार वहीं खत्म हो जाते हैं, जहां पुलिस की वर्दी शुरू होती है? अगर जवाब हां है तो फिर संविधान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार किसलिए है? और अगर जवाब नहीं है तो फिर पुलिस कार्रवाई की भी एक संवैधानिक सीमा तय करनी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने आज इसी सीमा की तलाश शुरू की है।
अदालत ने 2018 में बनाए गए पुलिस कार्रवाई संबंधी दिशा-निर्देशों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाया और कहा कि 2026 के हालात में उन्हें फिर से देखने और अपडेट करने का समय आ गया है। यह टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि पिछले आठ वर्षों में तकनीक बदली है, विरोध प्रदर्शन का स्वरूप बदला है, पुलिस के पास उपलब्ध संसाधन बदले हैं और नागरिकों के पास अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने के साधन भी बदल गए हैं। लेकिन क्या पुलिस का रवैया भी बदला है?
यही असली सवाल है।
आज किसी प्रदर्शन स्थल पर पुलिस की कार्रवाई कुछ मिनटों में देश के सामने आ सकती है। एक मोबाइल फोन का कैमरा किसी सरकारी रिपोर्ट से ज्यादा विश्वसनीय दृश्य उपलब्ध करा सकता है। ड्रोन फुटेज घटनास्थल का पूरा परिप्रेक्ष्य दिखा सकता है। बॉडी कैमरा पुलिसकर्मी की अपनी कार्रवाई दर्ज कर सकता है। सीसीटीवी घटनाओं की कड़ियां जोड़ सकता है। इसलिए अदालत का डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का आदेश महज तकनीकी आदेश नहीं है। यह बदलते समय में सत्ता और नागरिक के बीच जवाबदेही के नए युग की शुरुआत भी हो सकता है।
पहले पुलिस की रिपोर्ट को ही घटना का आधिकारिक दस्तावेज मान लेने की प्रवृत्ति रही है। अब तस्वीर बदल रही है। राज्य के पास रिकॉर्ड है तो नागरिक के पास भी रिकॉर्ड है। पुलिस के पास कैमरा है तो प्रदर्शनकारी के हाथ में भी कैमरा है। अब सवाल यह नहीं होगा कि किसकी कहानी ज्यादा ऊंची आवाज में सुनाई गई।
सवाल यह होगा कि रिकॉर्ड में क्या दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट के सामने पुलिस की कार्रवाई को लेकर जो आरोप आए हैं, वह इसलिए गंभीर हैं क्योंकि इनमें सिर्फ लाठीचार्ज का सवाल नहीं है। पेलेट गन और रबर बुलेट से छात्रों के घायल होने, एक छात्र की आंख की रोशनी चले जाने, इलेक्ट्रिक बैटन के इस्तेमाल, कीलों वाली लाठियों, आंसू गैस के कथित जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल, महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और सादी वर्दी में पुलिसकर्मियों द्वारा हिंसा के आरोप अदालत के सामने रखे गए हैं। इनमें से हर आरोप की जांच होनी चाहिए। न तो प्रदर्शनकारी का आरोप अपने आप सच मान लिया जाना चाहिए और न पुलिस का बचाव अपने आप अंतिम सत्य। इसीलिए स्वतंत्र जांच जरूरी है।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने भी अदालत में कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है और अगर पुलिसकर्मियों के साथ गलत हुआ है तो उसकी भी जांच होनी चाहिए। करीब 250 पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात अदालत में रखी गई। अदालत ने पुलिस के अधिकारों और सुरक्षा को भी नजरअंदाज नहीं किया। बल्कि उसने साफ कहा कि स्वतंत्र जांच से प्रदर्शनकारियों और पुलिस दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो सकेगी।
यही न्याय का सही रास्ता है।
किसी लोकतंत्र में पुलिस को खलनायक बनाना भी उतना ही गलत है जितना पुलिस की वर्दी को हर कार्रवाई के लिए स्वतः सही मान लेना। लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर समझना होगा। पुलिस को कानून लागू करने का अधिकार है।
कानून बनाने या संविधान को किनारे करने का अधिकार नहीं।
प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार है।
कानून तोड़ने का अधिकार नहीं। दोनों सीमाएं एक साथ लागू होती हैं।
यही लोकतंत्र है। इसलिए अदालत का यह कहना कि लोकतंत्र में आंदोलन होते रहेंगे, मामूली टिप्पणी नहीं है। यह उस सोच के लिए सीधा उत्तर है जिसमें हर असहमति को कानून- व्यवस्था की समस्या मान लेने का खतरा रहता है।
सरकार के लिए असहमति असुविधाजनक हो सकती है। पुलिस के लिए भीड़ को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ ही यह है कि असुविधाजनक आवाजों के लिए भी जगह बची रहे।
यदि शांतिपूर्ण प्रदर्शन केवल इसलिए अपराध जैसा व्यवहार पाने लगे क्योंकि वह सरकार के खिलाफ है, तो फिर लोकतंत्र और प्रशासनिक नियंत्रण के बीच की रेखा मिटने लगेगी। और यही कारण है कि इस सुनवाई का सबसे बड़ा संदेश सिर्फ पुलिस के लिए नहीं, सरकारों के लिए है।
शांतिपूर्ण विरोध को कुचलना कानून-व्यवस्था नहीं हो सकता कानून- व्यवस्था का अर्थ है कानून के भीतर व्यवस्था।
कानून के बाहर जाकर व्यवस्था कायम करना लोकतंत्र की रक्षा नहीं, उसकी कमजोरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण बात कही कि अगर जिम्मेदारी तय नहीं होगी तो जांच का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसका अर्थ साफ है कि स्वतंत्र जांच केवल औपचारिकता नहीं हो सकती। जांच का उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि घटनाक्रम में किस स्तर पर क्या हुआ और किसकी जिम्मेदारी बनती है।
यहीं से जवाबदेही की असली शुरुआत होगी।
क्योंकि हमारे यहां अक्सर जांच होती है, रिपोर्ट बनती है, फाइल चलती है और कुछ समय बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। लेकिन अगर जांच के बाद जिम्मेदारी तय न हो तो जांच नागरिकों के भरोसे के साथ एक और मजाक बन जाती है।
इस मामले में अदालत ने जिस तरह डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने का आदेश दिया है, उससे संकेत साफ है कि अब घटनाओं की जांच केवल कागज पर दर्ज बयानों से नहीं होगी।
और यह अच्छी बात है।
क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक को यह भरोसा होना चाहिए कि अगर उसके साथ राज्य की शक्ति का गलत इस्तेमाल हुआ है तो उसके पास न्याय का रास्ता खुला है। यहां बिहार का घटनाक्रम भी महत्वपूर्ण है। अगर राज्य सरकार प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और दंडात्मक या प्रतिशोधात्मक कार्रवाई न करने का निर्णय लेती है, तो यह सवाल और बड़ा हो जाता है कि शांतिपूर्ण आंदोलन और आपराधिक कार्रवाई के बीच सीमा आखिर तय कौन करेगा।
राज्य सरकारें अपने स्तर पर फैसले ले सकती हैं। केंद्र सरकार अपनी स्थिति रख सकता है। लेकिन नागरिक अधिकारों की अंतिम व्याख्या संविधान और न्यायपालिका के दायरे में ही होगी। यही लोकतांत्रिक संतुलन है। और इसी संतुलन को समझने की जरूरत आज सबसे ज्यादा है।
सरकार कोई भी हो, आंदोलनकारी किसी भी विचारधारा के हों, पुलिस किसी भी राज्य की हो—नियम एक ही होना चाहिए।
आज सत्ता के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले छात्र हैं। कल किसान हो सकते हैं। परसों कर्मचारी। उसके बाद कोई दूसरा नागरिक समूह।
अगर हर बार सरकार के खिलाफ उठी आवाज को ‘उपद्रव’ कहकर दबाने का रास्ता चुन लिया जाएगा तो एक दिन हर असहमति प्रशासन के लिए खतरा दिखाई देने लगेगी।
लोकतंत्र में सरकार से असहमति लोकतंत्र-विरोधी नहीं है। असहमति लोकतंत्र की परीक्षा है।
सरकार की ताकत का पता इस बात से नहीं चलता कि वह कितने लोगों को चुप करा सकती है। उसकी लोकतांत्रिक ताकत का पता इस बात से चलता है कि वह अपने आलोचकों को कितनी जगह देती है।
और पुलिस की ताकत का पता इस बात से नहीं चलता कि उसकी लाठी कितनी जोर से चलती है।
उसकी ताकत का पता इस बात से चलता है कि वह सबसे उत्तेजित क्षण में भी कानून की सीमा के भीतर रह सकती है या नहीं।
इसीलिए सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को 20 जुलाई की घटना से आगे जाकर देखना चाहिए। यह सवाल आने वाले समय के पुलिस प्रोटोकॉल का भी है।
किस परिस्थिति में चेतावनी दी जाएगी? कब वाटर कैनन का इस्तेमाल होगा?
लाठीचार्ज की सीमा क्या होगी?
महिलाओं के साथ कार्रवाई की प्रक्रिया क्या होगी?
नाबालिगों की पहचान होने पर क्या प्रोटोकॉल होगा?
सादी वर्दी में पुलिसकर्मियों की भूमिका क्या होगी?
पेलेट गन या दूसरे हथियारों के इस्तेमाल की सीमा क्या होगी? और सबसे महत्वपूर्ण कि किस अधिकारी की अनुमति से कितना बल प्रयोग किया जा सकेगा और बाद में उसकी जवाबदेही किसकी होगी? 2018 के नियमों को 2026 में अपडेट करने की जरूरत पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल पुराने नियमों की समीक्षा नहीं है। यह पुलिस व्यवस्था को यह याद दिलाने की कोशिश है कि लोकतंत्र बदलता है, तकनीक बदलती है और नागरिक अधिकारों को देखने का नजरिया भी समय के साथ विकसित होता है। अब अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी। उम्मीद यही होनी चाहिए कि अदालत का हस्तक्षेप किसी एक मामले तक सीमित न रहे। अगर जांच होती है तो निष्पक्ष हो। अगर गलती हुई है तो जिम्मेदारी तय हो। अगर पुलिसकर्मियों पर झूठे आरोप हैं तो वे भी साफ हों। और अगर नियम पुराने पड़ चुके हैं तो नए नियम इतने स्पष्ट हों कि अगली बार किसी प्रदर्शन स्थल पर खड़े पुलिसकर्मी को यह अनुमान न लगाना पड़े कि कितनी ताकत इस्तेमाल की जा सकती है। क्योंकि लोकतंत्र में नागरिक और पुलिस आमने-सामने के दुश्मन नहीं हैं। दोनों एक ही संविधान के भीतर हैं।
नागरिक अपने अधिकार के साथ सड़क पर है और पुलिस कानून की जिम्मेदारी के साथ वहां मौजूद है। इन दोनों के बीच टकराव नहीं, संतुलन होना चाहिए। और अगर कभी यह संतुलन बिगड़ता है तो सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि प्रदर्शनकारी ने क्या किया।
सवाल यह भी होना चाहिए कि राज्य ने क्या किया।
यही वह सवाल है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मजबूती से सामने रखा है।
अब देखना यह है कि वर्दी पर सत्ता का आदेश भारी पड़ेगा या संविधान।

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