

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत चुनाव नहीं, जनादेश होता है। चुनाव तो केवल एक प्रक्रिया है, लेकिन जनादेश जनता का वह सामूहिक विश्वास है जिसे कभी मतपेटी के माध्यम से और आज इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन के जरिये अभिव्यक्ति मिलती है। जनता किसी व्यक्ति को नहीं, एक विचार, एक दल, एक गठबंधन और एक राजनीतिक वादे को सत्ता सौंपती है। इसलिए जनादेश केवल सीटों का गणित नहीं, लोकतंत्र की नैतिकता का सबसे बड़ा आधार होता है।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से भारतीय राजनीति में एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभरी है। चुनाव जनता लड़ती है, लेकिन सरकारें बाद में बनने लगती हैं। मतदाता मतदान करके घर लौट जाता है, मगर सत्ता का असली खेल तब शुरू होता है। कहीं विधायक टूटते हैं, कहीं सांसद। कहीं पूरी पार्टी दो हिस्सों में बंट जाती है तो कहीं चुनाव चिन्ह तक बदल जाता है। संविधान की धाराओं, कानूनी व्याख्याओं और राजनीतिक जोड़-तोड़ के बीच सबसे बड़ी हार उस मतदाता की होती है, जिसने विश्वास के साथ अपना वोट डाला था।

महाराष्ट्र इस बदलती राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। 2022 में शिवसेना का विभाजन हुआ। उसके बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो हिस्सों में बंट गई। सरकार का स्वरूप बदला, राजनीतिक पहचानें बदलीं, चुनाव आयोग और अदालतों तक विवाद पहुंचे और अब सांसदों के नए राजनीतिक ठिकानों की चर्चा है। यह घटनाएं केवल महाराष्ट्र की नहीं हैं। वे उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक हैं, जिसमें चुनाव के बाद भी जनादेश को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश होती है।
लोकतंत्र में दल बदलना नया नहीं है। सत्ता परिवर्तन भी कोई असामान्य घटना नहीं है। असली चिंता तब पैदा होती है, जब जनादेश को नैतिक आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक प्रबंधन के जरिए बदला जाने लगे। सवाल किसी एक दल का नहीं है। आज जो सत्ता में है, कल विपक्ष में होगा। जो आज विपक्ष में है, वह कल सत्ता में होगा। लेकिन यदि सत्ता तक पहुंचने का रास्ता मतदाता के निर्णय से ज्यादा राजनीतिक अभियानों पर निर्भर होने लगे, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर पड़ने लगती है।
भारतीय राजनीति ने इस संस्कृति को नया नाम दिया गया ऑपरेशन’। कभी ऑपरेशन कमल, कभी ऑपरेशन लोटस, कभी किसी और नाम से। शब्द अलग-अलग हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही था सत्ता का अंकगणित बदलना। प्रश्न यह नहीं कि यह किस दल ने किया। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में सरकारें जनता बनाएगी या राजनीतिक अभियानों की प्रयोगशालाएं?
याद कीजिए, 1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने बार-बार दल बदलकर पूरे देश को चौंका दिया था। तभी राजनीति में एक मुहावरा जन्मा था आया राम, गया राम’। उस घटना ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल खड़ा किया। इसी चिंता के कारण 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून लाया गया। उद्देश्य स्पष्ट थाकि जनादेश की रक्षा करना। लेकिन राजनीति ने कानून की भावना से ज्यादा उसकी तकनीकी कमजोरियों को समझा। अब व्यक्ति नहीं, पूरे समूह टूटते हैं, दल नहीं बदलते, दलों का स्वरूप बदल जाता है। कानून बचा रहता है, लेकिन जनादेश घायल हो जाता है।
यहीं लोकतंत्र का सबसे कठिन प्रश्न खड़ा होता है। क्या जनादेश निर्वाचित प्रतिनिधि की निजी संपत्ति है? क्या मतदाता केवल मतदान के दिन तक महत्वपूर्ण है? क्या चुनाव के बाद उसके फैसले को राजनीतिक सौदेबाजी के जरिए बदला जा सकता है? यदि उत्तर ‘हां’ है, तो फिर लोकतंत्र और अवसरवाद के बीच की रेखा कहां बचती है?
संविधान केवल सत्ता हस्तांतरण का दस्तावेज नहीं है। वह जनता की सर्वोच्चता की घोषणा है। जनप्रतिनिधि जनता के विश्वास के ट्रस्टी होते हैं, उसके मालिक नहीं। इसलिए जब राजनीतिक निष्ठाएं विचारधारा से अधिक सत्ता के समीकरणों पर निर्भर होने लगती हैं, तब सबसे बड़ी क्षति किसी दल की नहीं, लोकतंत्र की होती है।

