

अलोक गौड़ :-लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-
यह वाक्य अब किसी वैज्ञानिक रिपोर्ट का निष्कर्ष भर नहीं रह गया है। यह हमारे समय का सबसे बड़ा सच बन चुका है। यह सच खेतों में दिखाई देता है, जंगलों में दिखाई देता है, शहरों की तपती सड़कों पर दिखाई देता है और सबसे ज्यादा उन लोगों की जिंदगी में दिखाई देता है जिनकी रोजी-रोटी मौसम पर निर्भर है।
हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2024, जो अब तक दर्ज इतिहास का सबसे गर्म वर्ष रहा, भारत के खेतिहर मजदूरों के लिए भारी आर्थिक संकट लेकर आया। अत्यधिक गर्मी के कारण एक खेतिहर मजदूर औसतन 648 घंटे काम नहीं कर पाया। यह लगभग 54 दिन की मजदूरी के बराबर है।

यह आंकड़ा केवल श्रम घंटों का नुकसान नहीं है। इसके पीछे करोड़ों परिवारों की रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन संघर्ष की कहानी छिपी हुई है। एक ऐसा मजदूर, जो रोज काम करके अपने परिवार का पेट भरता है, यदि लगभग दो महीने काम न कर सके तो इसका असर केवल उसकी आय पर नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार के भविष्य पर पड़ता है।
जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसकी सबसे अधिक कीमत वही लोग चुका रहे हैं जिन्होंने इस संकट को पैदा करने में सबसे कम भूमिका निभाई है। खेतिहर मजदूर, छोटे किसान, आदिवासी समुदाय और रोज कमाने-खाने वाले लोग आज उस वैश्विक संकट का बोझ उठा रहे हैं जिसके निर्माण में उनका योगदान नगण्य रहा है।
चिंता की बात यह है कि वैज्ञानिक अब संभावित ‘सुपर अल नीनो’ की आशंका जता रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो 2026 और 2027 में तापमान और अधिक बढ़ सकता है। इसका सीधा असर खेती, जल संसाधनों, श्रम उत्पादकता और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य का सबसे दुखद पक्ष यह है कि हम संकट के कारणों को कम करने के बजाय उन्हें और बढ़ाने में लगे हुए हैं।
देश के अनेक हिस्सों में जंगलों की कटाई जारी है। बस्तर और अबूझमाड़ जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जा रहे हैं। अंडमान जैसे पारिस्थितिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी विकास परियोजनाओं के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।
यहां मूल प्रश्न विकास का विरोध या समर्थन नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी मान लिया गया है?
क्या विकास का अर्थ केवल सड़कें, उद्योग, खनन और निर्माण गतिविधियां हैं?
क्या जंगल, नदियां, जैव विविधता और स्वच्छ वातावरण विकास के दायरे से बाहर की चीजें हैं?
दरअसल हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमने प्रकृति को संसाधन तो माना, लेकिन साझेदार नहीं माना। हमने जंगलों को लकड़ी का स्रोत समझा, नदियों को जल भंडार समझा, पहाड़ों को खनिजों का भंडार समझा; लेकिन उनके अस्तित्व की अपनी स्वतंत्र उपयोगिता को समझने की कोशिश नहीं की।
आज जब तापमान नए रिकॉर्ड बना रहा है, तब यह स्वीकार करने का समय है कि पर्यावरण का प्रश्न केवल पेड़ों और पक्षियों का प्रश्न नहीं है। यह अर्थव्यवस्था का प्रश्न है। यह रोजगार का प्रश्न है। यह खाद्य सुरक्षा का प्रश्न है। यह सामाजिक न्याय का प्रश्न है।
जिस देश में करोड़ों लोग खुले आसमान के नीचे श्रम करते हैं, वहां जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रह जाता, वह मानवीय संकट का रूप ले लेता है।
कुदरत लगातार संकेत दे रही है। कभी बढ़ती गर्मी के रूप में, कभी अनियमित वर्षा के रूप में, कभी बाढ़ और सूखे के रूप में। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम चेतावनियों को सुनने के बजाय उन्हें नजरअंदाज करने के अभ्यस्त हो चुके हैं।
इतिहास बताता है कि प्रकृति के साथ संघर्ष में मनुष्य कभी विजेता नहीं बनता। वह तभी आगे बढ़ता है जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास की अवधारणा को नए सिरे से परिभाषित किया जाए। ऐसी विकास नीति बनाई जाए जो आर्थिक प्रगति और पर्यावरणीय संतुलन दोनों को साथ लेकर चले। क्योंकि यदि विकास की कीमत जंगलों, नदियों और भविष्य की पीढ़ियों से वसूली जाएगी तो अंततः उसका भुगतान पूरा समाज करेगा।
मुद्दे की बात
कुदरत हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। सवाल यह नहीं है कि चेतावनी मिल रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम उसे सुनना चाहते हैं?
फिलहाल तो ऐसा लगता है कि हम कुदरत की चेतावनी से ज्यादा विकास की आरी और कुल्हाड़ी की आवाज सुनना पसंद कर रहे हैं।

