

लोकतंत्र में कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें किसी राजनीतिक दल, नेता या विचारधारा के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। वे सवाल सीधे देश, समाज और आने वाली पीढ़ियों से जुड़े होते हैं। खाद्य सुरक्षा ऐसा ही एक सवाल है।
आज देश में एक नई बहस जन्म ले रही है। बहस इस बात की नहीं है कि कौन-सी कंपनी बड़ी है और कौन-सी छोटी। बहस इस बात की भी नहीं है कि निजी क्षेत्र को व्यवस्था में शामिल होना चाहिए या नहीं। असली बहस यह है कि क्या देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्था इतनी केंद्रित हो सकती है कि भविष्य में उसका नियंत्रण कुछ गिने-चुने हाथों तक सीमित हो जाए?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत केवल एक बाजार नहीं है। यह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक है, जहां करोड़ों लोग आज भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के राशन पर निर्भर हैं। जहां किसान सिर्फ अन्नदाता नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। जहां सूखा, बाढ़, महामारी या आर्थिक संकट आने पर सरकारी भंडार ही सबसे बड़ी सुरक्षा कवच बनते हैं।

यही कारण है कि खाद्यान्न भंडारण का मुद्दा केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं है। यह राष्ट्रीय महत्व का विषय है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने एक बड़ा किसान आंदोलन देखा। सरकार ने तीन कृषि कानूनों को कृषि सुधार बताया था। किसानों का एक बड़ा वर्ग उन्हें अपने भविष्य के लिए खतरा मान रहा था। महीनों चले संघर्ष, टकराव और अंततः कानूनों की वापसी के बाद ऐसा लगा था कि यह अध्याय समाप्त हो गया।
लेकिन अब जब खाद्यान्न भंडारण व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो पुरानी आशंकाएं फिर सिर उठाने लगी हैं।
सरकार का पक्ष साफ है। उसका कहना है कि आधुनिक साइलो प्रणाली से अनाज की बर्बादी कम होगी, भंडारण क्षमता बढ़ेगी और लॉजिस्टिक्स बेहतर होंगे। यह तर्क पहली नजर में गलत भी नहीं लगता। आखिर भारत में हर साल लाखों टन अनाज खराब होने की खबरें आती रही हैं। आधुनिक तकनीक की जरूरत से कोई इनकार नहीं कर सकता।
लेकिन लोकतंत्र में हर नीति का दूसरा पक्ष भी होता है।
और दूसरा पक्ष पूछ रहा है कि क्या आधुनिकीकरण के नाम पर खाद्य सुरक्षा के ढांचे में अत्यधिक केंद्रीकरण तो नहीं हो रहा?
क्या पर्याप्त प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की गई है?
क्या भविष्य में किसी प्रकार की निर्भरता पैदा हो सकती है?
क्या ऐसी व्यवस्था बनाई गई है जिसमें किसी एक या दो बड़े समूह का प्रभाव असामान्य रूप से बढ़ जाए?
ये सवाल किसी राजनीतिक पार्टी के नहीं हैं। ये सवाल जनता के हैं।
दुर्भाग्य यह है कि आज के दौर में सवाल पूछना ही सबसे बड़ा अपराध बना दिया गया है।
अगर आप बेरोजगारी पर सवाल पूछें तो कहा जाएगा कि देश तेजी से आगे बढ़ रहा है।
अगर महंगाई पर सवाल पूछें तो बताया जाएगा कि पूरी दुनिया संकट में है।
अगर किसानों की बात करें तो आपको विकास विरोधी साबित करने की कोशिश होगी।
और अगर खाद्य सुरक्षा पर चिंता व्यक्त कर दें तो आपको किसी न किसी राजनीतिक खांचे में डाल दिया जाएगा।
यही वह प्रवृत्ति है जो लोकतंत्र को कमजोर करती है।
किसी भी सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसके समर्थकों की तालियां नहीं, बल्कि आलोचना सहने की क्षमता होती है। जो सरकार सवालों से डरने लगे, उसे अपने ही दावों पर पुनर्विचार करना चाहिए।
सवाल यह भी है कि आखिर हम किस दिशा में जा रहे हैं?
देश के हवाई अड्डे, बंदरगाह, बिजली, खनन, दूरसंचार, सड़कें, रेल सेवाओं के कुछ हिस्से, बीमा और अब खाद्य भंडारण जैसे क्षेत्रों को लेकर लगातार बहस हो रही है। समर्थक इसे आर्थिक सुधार बताते हैं। आलोचक इसे संसाधनों के केंद्रीकरण की प्रक्रिया मानते हैं।
सच शायद इन दोनों के बीच कहीं हो सकता है।
लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वहां बहस की गुंजाइश होती है।
दिक्कत तब शुरू होती है जब बहस को देशद्रोह और सवाल को साजिश घोषित कर दिया जाता है।
देश का किसान आज भी लागत, मौसम, कर्ज और बाजार के बीच पिस रहा है। MSP पर बहस आज भी खत्म नहीं हुई। खेती आज भी लाभ का नहीं, संघर्ष का व्यवसाय बनी हुई है। ऐसे में जब खाद्य सुरक्षा और भंडारण व्यवस्था से जुड़े बड़े फैसले लिए जाते हैं तो किसानों का चिंतित होना स्वाभाविक है।
सरकार को इन चिंताओं का जवाब देना चाहिए।
और जवाब तथ्यों से देना चाहिए, नारों से नहीं।
क्योंकि जनता अब सिर्फ यह नहीं जानना चाहती कि कितने लाख टन भंडारण क्षमता बढ़ी। वह यह भी जानना चाहती है कि उस क्षमता का नियंत्रण किसके पास होगा। वह जानना चाहती है कि भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिए क्या सुरक्षा तंत्र बनाए गए हैं। वह जानना चाहती है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सार्वजनिक हित के नाम पर निजी हितों को असामान्य लाभ मिल रहा हो।
ये सवाल इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि भारत जैसा देश किसी भी संकट में सबसे पहले अपने खाद्यान्न भंडार पर ही भरोसा करता है।
कोरोना काल में यही हुआ था।
अगर सरकारी भंडार खाली होते तो करोड़ों लोगों तक मुफ्त राशन पहुंचाना संभव नहीं था। उस समय देश ने समझा कि खाद्य सुरक्षा केवल अर्थशास्त्र का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता का भी आधार है।
इसलिए आज जरूरत किसी राजनीतिक नारे की नहीं है।
जरूरत पारदर्शिता की है।
जरूरत जवाबदेही की है।
जरूरत यह भरोसा पैदा करने की है कि देश की खाद्य सुरक्षा किसी भी परिस्थिति में कुछ चुनिंदा हितों की बंधक नहीं बनेगी।
लोकतंत्र में सरकारें आती हैं, जाती हैं। राजनीतिक दल बदलते रहते हैं। लेकिन देश और उसके नागरिक स्थायी होते हैं।
इसलिए सवाल किसी पार्टी का नहीं है।
सवाल उस व्यवस्था का है जिस पर 140 करोड़ लोगों की थाली टिकी हुई है।
और लोकतंत्र में थाली से जुड़ा कोई भी सवाल कभी छोटा नहीं होता।
याद रखिए, जब जनता अपने अन्न, अपने अधिकार और अपने भविष्य से जुड़े सवाल पूछना छोड़ देती है, तब निर्णय जनता के लिए नहीं, जनता पर होने लगते हैं।
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा और सबसे गंभीर पक्ष है।

