मुद्दे की बात:-सरकार की कैंची, सवाल डिजिटल लोकतंत्र का!लेखक वरिष्ठ सम्पादक :आलोक गौड़

Uncategorized


नई दिल्ली l हर 68 सेकंड में एक सरकारी आदेश यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, डिजिटल लोकतंत्र का एक्स-रे है। पांच महीनों में इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को 1.95 लाख ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए। सवाल यह नहीं कि इनमें कितने आदेश कानूनन जरूरी थे। असली सवाल यह है कि सरकार को आखिर इतनी बड़ी संख्या में सोशल मीडिया की आवाजें बंद कराने की जरूरत क्यों पड़ी? और जब सरकारी आदेश के बाद कंटेंट हटाने की प्रक्रिया भी स्वचालित हो जाए, तब नागरिक के पास यह जानने का रास्ता क्या बचेगा कि उसकी आवाज अपराध थी या सिर्फ सत्ता को असुविधाजनक लगी थी?


यही वह बिंदु है जहां यह मामला सोशल मीडिया से निकलकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकारी जवाबदेही और लोकतंत्र में असहमति की जगह का सवाल बन जाता है। पांच महीनों में करीब दो लाख आदेश किसी सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई का आंकड़ा नहीं हो सकते। यह उस व्यवस्था की तस्वीर है जिसमें सरकार के एक आदेश और तकनीक के एक क्लिक के बीच नागरिक की आवाज गायब हो सकती है।


मार्च से जुलाई के बीच इंस्टाग्राम को करीब एक लाख, फेसबुक को करीब 80 हजार और यूट्यूब को लगभग 15 हजार ब्लॉकिंग आदेश मिले। यानी तीनों प्लेटफॉर्म्स को भेजे गए कुल आदेशों में करीब 90 प्रतिशत अकेले मेटा के इंस्टाग्राम और फेसबुक के हिस्से में आए। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। ये आंकड़े हटाई गई पोस्ट या बंद किए गए अकाउंट्स की संख्या नहीं हैं, बल्कि सरकार की ओर से भेजे गए आदेशों की संख्या हैं। एक आदेश में सैकड़ों पोस्ट, वीडियो या अकाउंट हटाने के निर्देश हो सकते हैं। इसलिए वास्तविक रूप से कितनी सामग्री प्रभावित हुई, उसका आंकड़ा इससे कहीं बड़ा हो सकता है।
अब इस आंकड़े की तुलना पिछले साल के आंकड़े से कीजिए। अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच सहयोग पोर्टल के जरिए 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को कुल 2,312 ब्लॉकिंग आदेश भेजे गए थे। यानी औसतन करीब छह आदेश रोज। इसके मुकाबले इस साल सिर्फ पांच महीनों में तीन बड़े प्लेटफॉर्म्स को 1.95 लाख आदेश।
छह से 1,275 आदेश प्रतिदिन! इतनी बड़ी छलांग सिर्फ आंकड़ा नहीं, व्यवस्था में आए बदलाव का संकेत है। सरकार को यह बताना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ कि ऑनलाइन कंटेंट को नियंत्रित करने की जरूरत इतनी तेजी से बढ़ गई? और यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसी अवधि में दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन चल रहा था। पेपर लीक और परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्र सड़कों पर थे और आंदोलन की आवाज सोशल मीडिया पर भी पहुंच रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक , आंदोलन के दौरान खासकर इंस्टाग्राम पर ब्लॉकिंग आदेशों का बड़ा हिस्सा जारी हुआ। सोशल मीडिया यूजर्स ने छात्रों के प्रदर्शन के समर्थन में किए गए पोस्ट हटाए जाने की बात कही। इथेनॉल नीति की आलोचना करने वाले कंटेंट और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से जुड़े कुछ कंटेंट पर भी कार्रवाई का दावा किया गया। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी कहा कि उनके कुछ इंस्टाग्राम पोस्ट भारत में ब्लॉक कर दिए गए।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच जरूरी है। लेकिन इससे एक बुनियादी सवाल जरूर पैदा होता है कि क्या सरकार सिर्फ गैरकानूनी कंटेंट रोक रही थी या आलोचना और असहमति भी उसी प्रक्रिया में फंस रही थी? सरकार को इसका जवाब देना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं है। सरकार की आलोचना करना, नीतियों पर सवाल उठाना और किसी आंदोलन के समर्थन में आवाज उठाना लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा है। निश्चित रूप से फर्जी खबर, हिंसा भड़काने वाला कंटेंट, अपराध या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वास्तविक खतरा अलग श्रेणी में आता है। लेकिन इन श्रेणियों और राजनीतिक असहमति के बीच फर्क करना बेहद जरूरी है। यहीं मेटा की नई तकनीकी व्यवस्था चिंता बढ़ाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, मेटा ने अपने एपीआई को सहयोग पोर्टल से जोड़ दिया है। इसके जरिए सरकार द्वारा चिन्हित कंटेंट को तय तीन घंटे की समयसीमा में प्लेटफॉर्म से हटाने की प्रक्रिया स्वचालित हो सकती है। यानी सरकारी आदेश आया और तकनीक ने कार्रवाई कर दी। यह व्यवस्था तेज जरूर है, लेकिन सवाल है कि क्या तेज कार्रवाई हमेशा सही कार्रवाई भी होती है?
अगर किसी अधिकारी ने गलत आदेश भेज दिया तो? अगर किसी पोस्ट को संदर्भ से काटकर आपत्तिजनक मान लिया गया तो? अगर किसी राजनीतिक टिप्पणी को कानून-व्यवस्था के नाम पर हटा दिया गया तो? और अगर मशीन ने उसे हटा दिया तो नागरिक किसके सामने अपनी बात रखेगा?
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक और अधिवक्ता अपार गुप्ता ने इसी व्यवस्था पर चिंता जताई है। उनका सवाल मूलतः यही है कि अगर मशीन सरकारी आदेश के आधार पर कंटेंट हटा रही है और कंपनी का कोई व्यक्ति आदेश को पढ़कर स्वतंत्र समीक्षा नहीं कर रहा, तो गलती की जिम्मेदारी किसकी होगी? यह सिर्फ मेटा की तकनीकी व्यवस्था का सवाल नहीं है। यह राज्य की शक्ति और नागरिक की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का सवाल है।
सरकार के पास कानून लागू करने का अधिकार है। लेकिन हर अधिकार के साथ जवाबदेही भी आती है। यदि सरकार किसी सामग्री को हटाने का आदेश देती है तो नागरिक को कम से कम यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि वह सामग्री किस कानून के तहत हटाई गई, आदेश किस एजेंसी ने दिया और उसके खिलाफ अपील का रास्ता क्या है।
गोपनीयता के नाम पर जवाबदेही खत्म नहीं की जा सकती। सरकार को 1.95 लाख आदेशों का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए। कितने आदेश राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे? कितने फर्जी खबरों से? कितने अपराध से? कितने चुनाव से? कितने राजनीतिक कंटेंट से? कितने आदेशों को चुनौती दी गई? कितने मामलों में कंटेंट बाद में बहाल किया गया?
इन सवालों के जवाब इसलिए जरूरी हैं क्योंकि सोशल मीडिया अब सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहा। यह नागरिक पत्रकारिता, राजनीतिक बहस, आंदोलन, चुनावी विमर्श और सरकार की जवाबदेही तय करने का बड़ा मंच बन चुका है।
यदि इस मंच पर सरकारी आदेशों की संख्या लगातार बढ़ती रही और कंटेंट हटाने की प्रक्रिया अधिकाधिक स्वचालित होती गई, तो खतरा सिर्फ कुछ पोस्ट के गायब होने का नहीं है।
खतरा यह है कि लोग पोस्ट लिखने से पहले ही खुद को सेंसर करने लगें।
और आत्म-सेंसरशिप किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
क्योंकि जब नागरिक को यह डर हो कि सरकार को पसंद न आने वाली बात लिखने पर उसकी पोस्ट गायब हो सकती है, अकाउंट प्रतिबंधित हो सकता है या उसकी आवाज डिजिटल अंधेरे में चली जाएगी, तब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कागज पर भले बची रहे, व्यवहार में कमजोर पड़ने लगती है। सरकार को यह साबित करना होगा कि उसकी डिजिटल निगरानी का निशाना अपराध है, असहमति नहीं। उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सरकारी आदेश अंतिम सत्य नहीं बन जाएं और सोशल मीडिया कंपनियां महज आदेश लागू करने वाली मशीनों में तब्दील न हों। 1.95 लाख ब्लॉकिंग आदेशों का आंकड़ा सरकार के लिए गर्व का विषय नहीं, जवाबदेही की घंटी है। क्योंकि लोकतंत्र में सरकार की ताकत इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी आवाजें बंद करा सकती है। उसकी ताकत इस बात से मापी जाती है कि वह अपने खिलाफ उठने वाली कितनी आवाजें सुन सकती है। और यही मुद्दे की बात है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *