दिल्ली ऊंचा सुनती है “कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैरना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर”, :-अलोक गौड़ :लेखक वरिष्ठ संपादक.

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2009 में ईवी नहीं थीं तो भारत में 1.5 लाख कैसे बिक गईं?
आलोक गौड़
नई दिल्ली l देश की सियासत में आंकड़ों का इस्तेमाल अब सिर्फ सच बताने के लिए नहीं होता, कई बार सच को अपनी सुविधा के मुताबिक गढ़ने के लिए भी होने लगा है। इन दिनों 2009-10 का एक आंकड़ा चर्चा में है कि उस साल भारत में करीब 1.5 लाख इलेक्ट्रिक वाहन बिके थे। इसके साथ सवाल उछाला जा रहा है कि जब उस समय दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार इतना छोटा था, टेस्ला भी अपने शुरुआती दौर में थी और भारत में आज जैसी इलेक्ट्रिक कारें दिखाई तक नहीं देती थीं, तो फिर भारत में डेढ़ लाख इलेक्ट्रिक वाहन आखिर बिके कैसे? सवाल दिलचस्प है, लेकिन जवाब उससे भी ज्यादा दिलचस्प है। पहली बात साफ कर दीजिए कि 2009 में भारत में इलेक्ट्रिक वाहन थे। हां, वह आज की तरह इलेक्ट्रिक कारें नहीं थीं। उस दौर का बाजार मुख्य रूप से इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों पर टिका था। उद्योग संगठन सोसाइटी ऑफ मैन्युफैक्चरर्स ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के आंकड़ों के मुताबिक 2009-10 में करीब 1.60 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री का अनुमान था। इनमें भारी बहुमत इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का था। यानी आज की इलेक्ट्रिक कार को 2009 के इलेक्ट्रिक स्कूटर से तुलना करना ही गलत है।


उस समय भारत में इलेक्ट्रिक स्कूटर और कम गति वाले इलेक्ट्रिक दोपहिया बाजार में मौजूद थे। वह आज की तकनीक, बैटरी क्षमता, गति और चार्जिंग ढांचे वाले वाहन नहीं थे, लेकिन उन्हें यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि भारत में इलेक्ट्रिक वाहन थे ही नहीं।
तो फिर 2009 में टेस्ला का नाम क्यों लिया जा रहा है?
क्योंकि यह तुलना भी अधूरी है। टेस्ला उस समय अपने शुरुआती चरण में थी और उसका रोडस्टर सीमित संख्या में बिक रहा था। लेकिन दुनिया में इलेक्ट्रिक वाहन का मतलब केवल टेस्ला या इलेक्ट्रिक कार नहीं था। अलग-अलग देशों में इलेक्ट्रिक दोपहिया और छोटे इलेक्ट्रिक वाहन अपने-अपने बाजारों में मौजूद थे। भारत भी इससे अलग नहीं था।
इसलिए यह कहना कि “जब 2009 में टेस्ला मुश्किल से ईवी बना रही थी तो भारत में डेढ़ लाख ईवी कैसे बिक गईं?” सुनने में जोरदार सवाल जरूर है, लेकिन तथ्य की कसौटी पर यह सवाल अधूरा है।
असल सवाल यह होना चाहिए कि उस डेढ़ लाख में कौन-कौन से वाहन शामिल थे? और यही वह बिंदु है जहां आंकड़ों की राजनीति शुरू होती है। अगर 2009-10 के 1.5 या 1.6 लाख इलेक्ट्रिक वाहनों का आंकड़ा सामने रखकर यह कहा जा रहा है कि उस समय भी भारत का ईवी बाजार आज जैसा ही था, तो यह गलत होगा।
लेकिन अगर इसी आंकड़े के आधार पर यह कहा जाए कि उस समय भारत में इलेक्ट्रिक वाहन थे ही नहीं, तो यह भी गलत होगा। दोनों दावे आधे सच हैं और आधा सच अक्सर पूरे झूठ से ज्यादा खतरनाक होता है।
2009 का इलेक्ट्रिक दोपहिया बाजार छोटा था। उसकी तकनीकी क्षमता सीमित थी। चार्जिंग ढांचा लगभग नगण्य था। उपभोक्ताओं का भरोसा कम था। सरकारी प्रोत्साहन भी आज के स्तर का नहीं था। इसके बावजूद एक बाजार मौजूद था और उसकी अपनी बिक्री थी।
आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।
इलेक्ट्रिक वाहन अब सिर्फ छोटे स्कूटर या प्रयोगात्मक वाहन नहीं रह गए हैं। इलेक्ट्रिक कारें हैं, बड़ी कंपनियां हैं, बेहतर बैटरियां हैं, चार्जिंग नेटवर्क है और सरकार की नीतियां भी हैं। यानी 2009 और 2026 के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार के बीच जमीन-आसमान का अंतर है।
इसलिए 2009 के आंकड़े को आज के बाजार की उपलब्धि के बराबर रखना भी गलत है और 2009 के बाजार को पूरी तरह नकार देना भी।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इसका कांग्रेस और यूपीए के खिलाफ क्या मतलब है?
सिर्फ यह आंकड़ा किसी सरकार के खिलाफ कोई निर्णायक प्रमाण नहीं है।
अगर कोई कहता है कि “देखिए, 2009 में डेढ़ लाख ईवी बिकती थीं”, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि उनमें कितने दोपहिया थे, कितनी कारें थीं, उनकी तकनीक क्या थी, सरकार ने कितनी सहायता दी और वह बाजार आगे क्यों नहीं बढ़ सका। और अगर कोई कहता है कि “2009 में भारत में ईवी थीं ही नहीं”, तो उसे उस दौर के उपलब्ध उद्योग आंकड़ों का जवाब देना होगा।
आंकड़े किसी राजनीतिक दल की जागीर नहीं होते।
न कांग्रेस उन्हें अपनी सुविधा से बदल सकती है, न भाजपा। आंकड़ों का काम सरकारों की तारीफ करना या विरोधियों को कटघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि वास्तविक तस्वीर सामने रखना है।
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की कहानी 2014 के बाद अचानक शुरू नहीं हुई। इसकी शुरुआती कोशिशें उससे बहुत पहले हो चुकी थीं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उस समय का बाजार आज के बाजार की तुलना में बेहद छोटा और कमजोर था। इसलिए अगर आज कोई सरकार की इलेक्ट्रिक वाहन नीति की उपलब्धि गिनाता है तो उसे 2009 की छोटी-सी ईवी बिक्री से तुलना करके अपनी उपलब्धि साबित करने की जरूरत नहीं है। और अगर कोई पिछली सरकार को घेरना चाहता है तो उसे भी सिर्फ एक आंकड़ा उछालकर निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए।
इतिहास आंकड़ों से बनता है, लेकिन आधे आंकड़ों से नहीं। 2009 में भारत में इलेक्ट्रिक वाहन थे।
आज भारत में इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग है। इन दोनों बातों के बीच का फर्क समझना ही असली बात है।
सवाल यह नहीं कि 2009 में 1.5 लाख ईवी कैसे बिक गईं। सवाल यह है कि वे कैसी ईवी थीं, उस बाजार की वास्तविक स्थिति क्या थी और अगले डेढ़ दशक में भारत वहां से यहां तक कैसे पहुंचा? यही सवाल राजनीति को असहज करता है। क्योंकि जब आंकड़े पूरे संदर्भ के साथ सामने आते हैं तो नारे कमजोर पड़ जाते हैं। दिल्ली ऊंचा सुनती है,लेकिन आंकड़ों को पूरा सुनना भी जरूरी है।

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