
विभाजन की पीड़ा को याद कर इतिहास से मानवता का सबक सीखना जरूरी: प्रो. (डॉ.) रमा
नई दिल्ली, 13 अगस्त 2026। हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य परिषद, हंसराज कॉलेज के तत्वावधान में साहित्य अकादमी के सहयोग से ‘विभाजन विभीषिका और साहित्य’ विषय पर एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी का आयोजन किया गया। तीन सत्रों में आयोजित इस संगोष्ठी में साहित्य, इतिहास, शोध और व्यक्तिगत स्मृतियों के माध्यम से वर्ष 1947 के विभाजन की पीड़ा, उसके सामाजिक प्रभाव तथा उसकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही स्मृतियों पर गंभीर विमर्श हुआ।
संगोष्ठी के अध्यक्षीय संबोधन में हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. (डॉ.) रमा ने कहा कि विभाजन की पीड़ा को याद करना अतीत में लौटना नहीं, बल्कि भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि जिस देश और समाज ने अपने अनेक मूल और स्मृतियां खोई हैं, उसके लिए उस पीड़ा को समझना आवश्यक है। उन्होंने अपने मुकरजी नगर के अनुभवों को याद करते हुए बताया कि विभाजन के बाद आए अनेक परिवारों की स्मृतियों और विस्थापन की पीड़ा को समझना आज की पीढ़ी के लिए भी महत्वपूर्ण है।
प्रो. (डॉ.) रमा ने युवा पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि युवाओं को यह जानना चाहिए कि उनके दादा-दादी और पूर्वजों ने क्या खोया और क्या पाया। उन्होंने कहा कि विभाजन से हमें यह सीखना चाहिए कि मानवता और सामाजिक विकास को किस प्रकार आगे बढ़ाया जाए, ताकि ऐसी त्रासदी फिर कभी न हो। उन्होंने समाज में छोटे-छोटे मतभेदों को संघर्ष का कारण न बनने देने और भारत की गरिमा के लिए प्रतिबद्ध रहने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हंसराज कॉलेज ज्ञान, मानवीय मूल्यों और भारत की आत्मा के प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है। साहित्य अकादमी और हिंदी साहित्य परिषद के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने संबोधन का समापन ‘मनुर भव’ के मानवीय संदेश के साथ किया।

इससे पहले प्रमुख वक्ता प्रो. रवि प्रकाश टेकचंदानी (विभगाध्यक्ष, भारतीय भाषा व साहित्य अध्ययन विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय) ने विभाजन के व्यापक प्रभावों पर चर्चा करते हुए विशेष रूप से सिंध और मुल्तान की पीड़ा को रेखांकित किया। उन्होंने 14 अगस्त को पीड़ा और स्मृति के दिन के रूप में याद करते हुए कहा कि भारत आने वाले अनेक लोग अपने साथ संपत्ति नहीं, बल्कि केवल अपनी स्मृतियां लेकर आए थे। उन्होंने विभाजन की स्मृति को जीवित रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अगस्त 2021 में दिए गए संबोधन का उल्लेख किया।

प्रो. टेकचंदानी ने विभाजन पर लिखे गए विभिन्न महत्वपूर्ण ग्रंथों और लेखकों का उल्लेख किया, जिनमें शेषाद्रि, राम माधव, लालकृष्ण आडवाणी, अमृता प्रीतम और खुशवंत सिंह सहित अनेक लेखक शामिल हैं। उन्होंने 1857 से 1905-09 और 1947 तक की ऐतिहासिक घटनाओं के प्रमाणों को पुनः देखने की आवश्यकता बताई। उन्होंने बलूचिस्तान, सिंध और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर सहित उन क्षेत्रों की ऐतिहासिक पीड़ा को भी याद करने का आह्वान किया, जिनसे विभाजन के कारण लोगों का संबंध टूट गया। उन्होंने हिंगलाज माता मंदिर, शारदा पीठ, ढाकेश्वरी मंदिर, ननकाना साहिब और पाणिनि ऋषि से जुड़े स्थलों की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्मृति को भी रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि विभाजन पर होने वाले ऐसे विमर्शों का उद्देश्य युवाओं में इतिहास के प्रति संवेदना और जिम्मेदारी पैदा करना होना चाहिए, ताकि स्वतंत्रता और विभाजन दोनों के अनुभवों को व्यापक संदर्भ में समझा जा सके।
प्रो. नरेंद्र मिश्र, प्रोफेसर, हिंदी विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने हिंदी साहित्य में विभाजन पर लिखे गए महत्वपूर्ण साहित्य पर चर्चा की। उन्होंने विभाजन के समय हिंदू और सिख परिवारों की सहायता एवं सुरक्षा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका का भी उल्लेख किया।
प्रो. प्रेणा मल्होत्रा, एसोसिएट प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने परिवार की स्मृतियों और विभाजन से जुड़े व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार 1947 की पीड़ा आज भी परिवारों की स्मृतियों और कथाओं में मौजूद है। उनके वक्तव्य ने विभाजन के इतिहास को व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ते हुए विमर्श को भावनात्मक आयाम प्रदान किया।
साहित्य अकादमी के संपादक श्री अनुपम तिवारी ने विभाजन की पीड़ा और स्मृतियों के साहित्य में मौजूद रहने की चर्चा की। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे उन लोगों से मिलें और उनकी बातें सुनें जिन्होंने स्वयं विभाजन को देखा और झेला है, ताकि इतिहास केवल पुस्तकों के माध्यम से नहीं बल्कि प्रत्यक्ष अनुभवों और मौखिक इतिहास के माध्यम से भी समझा जा सके।
प्रो. अभिषेक टंडन ने संगोष्ठी को साहित्य और इतिहास के सार्थक संयोजन के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि 1947 की पीड़ा आज भी कई पीढ़ियों में अपना प्रभाव छोड़ रही है। उन्होंने इस बात पर भी विचार रखा कि 1947 स्वतंत्र भारत के जन्म का वर्ष था, भारत के अस्तित्व में आने का नहीं।
विभाजन पर शोध कर रहे शोधार्थी यतिन बत्रा और मेघा ने अपने शोध से प्राप्त प्रमुख निष्कर्षों को प्रस्तुत किया। उनके शोध-आधारित वक्तव्यों ने विभाजन के विभिन्न पहलुओं पर अकादमिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी तीन सत्रों में आयोजित की गई। प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रो. रवि टेकचंदानी ने की, जबकि द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. नरेंद्र मिश्र ने की। कार्यक्रम में प्रो. ब्रजेश पांडेय, प्रो. अभिषेक टंडन, प्रो. प्रेणा मल्होत्रा और प्रो. आशुतोष मिश्र सहित अनेक विद्वानों ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम में साहित्य अकादमी के प्रतिनिधियों और हिंदी साहित्य परिषद से जुड़े शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।
कार्यक्रम का संचालन और सूत्रधार की भूमिका डॉ. रवि कुमार गौड़ तथा डॉ. पीयूष कुमार द्विवेदी ने निभाई। आयोजन में डॉ. नृत्य गोपाल, प्रभारी, हिंदी विभाग, हंसराज कॉलेज; डॉ. अंशु यादव, समन्वयक, हिंदी साहित्य परिषद; डॉ. रवि कुमार गौड़, समन्वयक तथा डॉ. पीयूष कुमार द्विवेदी, पीयूष पुष्पम्, सह-समन्वयक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम का आयोजन हिंदी विभाग, हंसराज कॉलेज द्वारा किया गया।
संगोष्ठी में यह विचार प्रमुखता से उभरकर सामने आया कि विभाजन को याद करना किसी विभाजनकारी भावना को बढ़ाना नहीं, बल्कि उसके मानवीय परिणामों को समझना है। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य उन स्मृतियों को सुरक्षित रखने का माध्यम है, जिन्हें समय के साथ इतिहास की पुस्तकों में पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता।
संगोष्ठी का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि विभाजन की स्मृति को मानवता, सह-अस्तित्व, गरिमा और सामाजिक जिम्मेदारी के पाठ के रूप में देखा जाना चाहिए। युवा पीढ़ी को अतीत की पीड़ा से सीख लेकर ऐसा समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए, जहां इतिहास की ऐसी त्रासदी दोबारा न दोहराई जाए।

