सृष्टि का सृजन, संवर्धन, पोषण, बिना मातृत्व के संभव नहीं है – डॉ. मोहन भागवत जी

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“युगानुकूल मातृत्व” पर विश्वमांगल्य सभा की प्रबोधन बैठक संपन्न

नई दिल्ली, 24 जुलाई 2026।
विश्वमांगल्य सभा की “युगानुकूल मातृत्व” विषय पर आयोजित प्रबोधन बैठक के समापन सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि मातृत्व विषय पर मुझे बोलने के लिए कहना यह अपने आप में एक विरोधाभास है। एक तरह इस पर एकाधिकार महिलाओं का है, इस पर पुरुषों का बोलना ठीक नहीं है। इस विषय पर विश्वमांगल्य सभा द्वारा व्यापक चर्चा हो गई है, और इस विषय में अपना दृष्टिकोण क्या है, अपनी परंपरा क्या है, आज के युग में कैसे चलना आदि के बारे में भी पुराने समय से बहुत सारा चिंतन हुआ है। स्वामी विवेकानंद जी, गांधी जी, रविंद्र नाथ ठाकुर जी आदि ने समग्रता से चिंतन करके हमारे सामने विचार रखे हैं।
कार्यक्रम का विषय दिया गया है – युगानुकूल मातृत्व। मातृत्व की शाश्वत बातें वही हैं, वह युग के अनुसार बदलती नहीं। उन बातों के कारण युग में परिवर्तन करने वाले उत्पन्न होते हैं। आदिकाल से सृष्टि मातृत्व के आधार पर ही चलती आई है। हर जीव की उत्पत्ति होती है तो उसमें मातृत्व आता ही है, माता रहती ही है। सृष्टि का सृजन, संवर्धन, पोषण, यह बिना मातृत्व के संभव नहीं है। मातृत्व सृष्टि के संवर्धन, पोषण और निरंतरता का मूल आधार है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसका विचार है, लेकिन उसे सही दिशा देने का कार्य माता ही करती है। माता ही मनुष्य की पहली गुरु होती है तथा जीवनभर भावनात्मक संबल का सबसे बड़ा केंद्र भी वही रहती है।


उन्होंने कहा कि परिवार में समय देना और संवाद बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान माता-पिता को करना होगा, जिसके लिए स्वयं का ज्ञान भी निरंतर बढ़ाना आवश्यक है। बच्चे उपदेश से अधिक अनुकरण से सीखते हैं, इसलिए माता-पिता को स्वयं आदर्श आचरण प्रस्तुत करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि समाज में अनेक विमर्श भ्रम के कारण चलते हैं और कई बार जानबूझकर भ्रम भी फैलाया जाता है। भारतीय संस्कृति के बारे में भी लंबे समय तक भ्रम फैलाया गया कि हमारी परंपराएं गलत हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि हमारा सांस्कृतिक आधार अत्यंत प्रबल और प्रत्यक्ष है। हमें अपने इतिहास, ज्ञान और परंपराओं पर विश्वास रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि एकता ही सत्य है और विविधता के बीच एकात्म भाव भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है। भारत में रहते हुए भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के अनुरूप जीवन जीना चाहिए। अन्य देशों की जीवनशैली को बिना विचार किए अपनाने के बजाय भारतीय दृष्टिकोण के आधार पर समाज और परिवार व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।


प्रबोधन बैठक के समापन सत्र का आयोजन अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में किया गया। “मातृ निर्माण से राष्ट्र निर्माण” के ध्येय के साथ कार्यरत वैश्विक महिला संगठन विश्वमांगल्य सभा द्वारा आयोजित उत्तर भारत की राष्ट्रीय प्रबोधन बैठक 23–24 जुलाई को विश्व युवक केंद्र में संपन्न हुई। दो दिवसीय बैठक में विभिन्न राज्यों से लगभग 280 महिलाओं ने भाग लिया। बैठक का मुख्य विषय “युगानुकूल मातृत्व (Contemporary Motherhood)” रहा, जिस पर बदलते सामाजिक परिवेश, भारतीय परिवार व्यवस्था तथा मातृत्व की समकालीन भूमिका को लेकर व्यापक चिंतन एवं संवाद हुआ। प्रबोधन बैठक के समापन सत्र में विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 900 से अधिक प्रबुद्ध मातृशक्ति उपस्थित रही। कार्यक्रम में “युगानुकूल मातृत्व” विषय पर आयोजित संवाद में लगभग 2,000 से 2,500 महिलाओं ने पंजीकरण करवाया था।
वर्ष 2026 में विश्वमांगल्य सभा ने देश के 23 प्रांतों में अधिवेशन आयोजित किए, जिनमें लगभग 37,000 महिलाओं ने सहभागिता की। इन अधिवेशनों में भारतीय परिवार व्यवस्था, मातृत्व की बदलती भूमिका तथा आने वाली पीढ़ियों के संस्कार निर्माण पर विशेष चर्चा की गई। आज विश्वमांगल्य सभा भारत के 33 प्रांतों में सक्रिय है तथा लगभग 6 लाख मातृशक्ति संगठन से जुड़कर शिक्षा, संस्कार, सामाजिक जागरण और सेवा के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रही है। भारत के अलावा संगठन की गतिविधियाँ अमेरिका, नीदरलैंड सहित 14 देशों तक विस्तारित है।
विश्वमांगल्य सभा का मानना है कि प्रत्येक महिला मातृत्व की उस शक्ति का स्वरूप है, जो परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण की आधारशिला है। संगठन का उद्देश्य महिलाओं में मातृत्व के प्रति कर्तव्यबोध, सांस्कृतिक चेतना, नैतिक मूल्यों और नेतृत्व क्षमता का विकास करना है, ताकि वे संस्कारित पीढ़ियों के निर्माण के माध्यम से एक सशक्त, समरस और आत्मविश्वासी भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सकें।
विश्वमांगल्य सभा की स्थापना 19 फरवरी 2010 को नागपुर में परम पूज्य आचार्य स्वामी जीतेंद्रनाथ जी महाराज के मार्गदर्शन में हुई थी। वे 600 वर्ष से अधिक पुरानी श्री दत्त पीठ परंपरा के 18वें पीठाधीश्वर हैं। संगठन संस्कार, सामर्थ्य, सदाचार और सेवा के चतुःसूत्री सिद्धांतों पर कार्य करते हुए मातृशक्ति को संगठित कर राष्ट्र निर्माण के अभियान को आगे बढ़ा रहा है।

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