

नई दिल्ली l राष्ट्रीय राजधानी छेत्र दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में इन दिनों मरीज से ज्यादा अगर किसी की सेहत शानदार है तो वह है, टेंडर सिस्टम।
सरकारें बदलती रहीं,मंत्री बदलते रहे, भ्रष्टाचार खत्म करने के दावे बदलते रहे
लेकिन अस्पतालों के गलियारों में घूमने वाली फाइलों की चाल कभी कमजोर नहीं पड़ी।
गरीब आदमी आज भी लाइन में खड़ा है। किसी को दवा नहीं मिल रही है l किसी को जांच के लिए महीनों बाद की तारीख मिल रही हैl
कहीं मशीनें खराब पड़ी हैं…
कहीं स्ट्रेचर टूटे पड़े हैंl
लेकिन करोड़ों के टेंडर आज भी वीआईपी ट्रीटमेंट पा रहे हैं। और सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर नई सरकार के आने पर जनता को लगता है कि अब सिस्टम बदलेगा। अब उन अफसरों पर कार्रवाई होगी जिनके नाम वर्षों से टेंडरों, सप्लायर लॉबी, कमीशनखोरी और फाइल मैनेजमेंट के साथ घूमते रहे हैं। लेकिन कुछ महीनों बाद जनता को समझ आ जाता है कि कुर्सियों पर चेहरे बदले हैं लेकिन खेल नहीं।
दिल्ली का स्वास्थ्य विभाग आज उसी सवाल के बीच खड़ा दिखाई देता है।

आखिर ऐसा क्या है कि हर सरकार में कुछ अधिकारी हमेशा ताकतवर बने रहते हैं?
सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन उनका प्रभाव नहीं बदलता। मंत्री आते-जाते रहते हैं, लेकिन फाइलों के असली खिलाड़ी हमेशा सुरक्षित बने रहते हैं।
असल में भारत का सिस्टम केवल सरकारों से नहीं चलता। सिस्टम का एक “स्थायी ढांचा” भी होता है।
ऐसा ढांचा जो हर राजनीतिक सत्ता के साथ खुद को ढाल लेता है।
जो नई सरकार आने पर नए नारे सीख लेता है और
नई भाषा बोलने लगता हैl
लेकिन भीतर से वही पुराना खेल जारी रखता है।
दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग को लेकर अब जो सवाल उठ रहे हैं, यह केवल भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हैं। मामला उससे कहीं बड़ा दिखाई देता है। लोगों के मन में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि अस्पतालों में इलाज से ज्यादा ताकत अब “टेंडर नेटवर्क” की चल रही है। मरीज वार्ड में लाइन में खड़ा रहता है और दूसरी तरफ करोड़ों की फाइलें एसी कमरों में दौड़ती रहती हैं। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं है।
गरीब आदमी सुबह चार बजे लाइन में लग जाता है ताकि उसे डॉक्टर दिख जाए।
एक टेस्ट के लिए महीनों के बाद की तारीख मिलती है।
दवा बाहर से खरीदने की सलाह आम बात हो चुकी है।
कई अस्पतालों में स्टाफ की कमी की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन समस्याओं के समाधान की गति हमेशा धीमी रहती है, जबकि टेंडरों की प्रक्रिया आश्चर्यजनक तेजी से आगे बढ़ती रहती है। यही कारण है कि जब स्वास्थ्य विभाग में “एसपीओ संस्कृति” की चर्चा शुरू हुई तो लोगों ने उसे केवल प्रशासनिक फैसला मानकर नजरअंदाज नहीं किया। सवाल उठे कि आखिर एक-एक डॉक्टर को कई-कई विभागों का एसपीओ क्यों बनाया गया? क्या योग्य अधिकारियों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी थी? या फिर जरूरत ऐसे लोगों की थी जो बिना सवाल पूछे हर फाइल पर हस्ताक्षर कर दें?जो डॉक्टर नियमों की बात करते थेl जो खरीद प्रक्रिया पर सवाल उठाते थेl
जो फाइल पढ़कर निर्णय लेना चाहते थेl वह धीरे-धीरे सिस्टम की आंखों में खटकने लगे। और जो “यस सर संस्कृति” में फिट थे, वे मलाईदार कुर्सियों तक पहुंचते चले गए। धीरे-धीरे स्वास्थ्य विभाग इलाज का विभाग कम और “मैनेजमेंट मॉडल” ज्यादा बनता चला गया। दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में हुए टेंडरों की सूची उठाकर देख लीजिए। दवाइयों की खरीद, मशीनों की सप्लाई, आउटसोर्सिंग, सफाई, लिनन, उपकरण शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जिस पर सवाल न उठे हों। आरोप यह भी लगे कि विभाग में ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी गई जिनकी विशेषज्ञता मरीजों का इलाज करने में कम और टेंडर मैनेज करने में ज्यादा थी। और फिर आया “रंगीन चादरों” का मामला। करीब 25 करोड़ रुपए खर्च कर अस्पतालों के लिए रंग आधारित चादरें खरीदी गईं। प्रचार ऐसा हुआ मानो सरकारी अस्पतालों को पांच सितारा होटल में बदल दिया जाएगा। प्रेस नोट ऐसे जारी हुए जैसे दिल्ली का स्वास्थ्य मॉडल दुनिया बदलने वाला हो। लेकिन कुछ ही समय बाद शिकायतें आने लगीं कि चादरों का रंग उतर रहा है, कपड़ा सिकुड़ रहा है और कई जगह फट रहा है।
अब जरा तस्वीर देखिए।
जिस अस्पताल में मरीज को समय पर दवा नहीं मिलती है,
जहां स्ट्रेचर टूटे पड़े रहते हैंl
जहां जांच के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता हैl
जहां एक बेड पर दो-दो मरीज दिखाई दे जाते हैं…
जहां गरीब आदमी डॉक्टर का चेहरा देखने के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहता है…
वहां करोड़ों रुपए रंगीन चादरों पर खर्च किए जा रहे थे। यानी अस्पतालों में इलाज कम और “इवेंट मैनेजमेंट” ज्यादा चल रहा था।
ऐसा लगने लगा कि मरीज का इलाज बाद में होगा, पहले सिस्टम का मेकअप जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि गुणवत्ता जांच किसने की?
अगर सामान घटिया था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
हर बार छोटे कर्मचारी ही क्यों फंसते हैं और बड़े अधिकारी सुरक्षित क्यों बच जाते हैं?
यही वह जगह है जहां जनता का भरोसा टूटता है।
क्योंकि लोगों को लगने लगता है कि सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि संरक्षित व्यवस्था बन चुका है।
फाइलें अपने आप नहीं दौड़तीं। करोड़ों के टेंडर बिना बड़े संरक्षण के पास नहीं होते। उनके पीछे अफसर, सप्लायर, ठेकेदार और सत्ता के गलियारों का पूरा नेटवर्क काम करता है। और यही नेटवर्क धीरे-धीरे किसी भी विभाग को जनता से दूर कर देता है। सबसे खतरनाक बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग में भ्रष्टाचार का असर सीधे गरीब आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। सड़क विभाग में भ्रष्टाचार होगा तो सड़क टूटेगी। बिजली विभाग में होगा तो बिल बढ़ेगा। लेकिन अस्पतालों में भ्रष्टाचार होगा तो गरीब आदमी टूटेगा l उसका इलाज टूटेगा।
उसकी उम्मीद टूटेगी।
उसका भरोसा टूटेगा।
दिल्ली का गरीब मरीज किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता नहीं होता। उसे सिर्फ इलाज चाहिए। लेकिन अगर अस्पतालों में इलाज से ज्यादा चर्चा टेंडरों की होने लगे तो समझ लीजिए कि सिस्टम भीतर तक बीमार हो चुका है।
अब सवाल केवल चादरों का नहीं है। सवाल पूरे सिस्टम का है। सवाल यह है कि क्या दिल्ली का स्वास्थ्य विभाग कुछ ताकतवर नेटवर्कों के कब्जे में जा चुका है?
क्या हर सरकार के साथ कुछ अफसर इतने मजबूत हो चुके हैं कि उन पर हाथ डालने की हिम्मत कोई नहीं करता?
अगर ऐसा नहीं है तो फिर हर बड़े टेंडर की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं होती? जवाबदेही तय क्यों नहीं होती? क्यों हर बार छोटे लोग बलि चढ़ जाते हैं और बड़े चेहरे बच निकलते हैं?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा दिल्ली के उपराज्यपाल तरणजीत सिंह संधू और मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को अब केवल बयान नहीं देने चाहिए। अगर सचमुच भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़नी है तो स्वास्थ्य विभाग में पिछले वर्षों में हुए हर बड़े टेंडर, हर खरीद और हर प्रशासनिक फैसले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
क्योंकि जनता अब भाषण नहीं सुनना चाहती। जनता यह देखना चाहती है कि अस्पताल मरीजों के लिए चलेंगे कि या फिर टेंडर सिंडिकेट के लिए।

