
रिश्वत का लेन-देन हमारे सरकारी तंत्र में इतना सामान्य हो चुका है कि कई जगह इसे भ्रष्टाचार नहीं, काम कराने की कीमत समझ लिया गया है। या फिर इसे सुविधा शुल्क का नाम दे दिया जाता है l आम नागरिक मजबूरी में पैसे देता है, काम कराता है और चुपचाप घर लौट जाता है। क्योंकि उसे पता है कि शिकायत की तो अगली बार काम और मुश्किल हो सकता है। लेकिन अब यह चुप्पी टूट रही है। सोशल मीडिया पर ब्राइबस .फई नाम की वेबसाइट की चर्चा इसी वजह से हो रही है। यह लोगों को अपने रिश्वत देने संबंधी अनुभव दर्ज कराने का मंच दे रही है। कितनी रिश्वत मांगी गई, किस विभाग में मांगी गई, किस काम के लिए मांगी गई और किस स्तर के कर्मचारी या अधिकारी से मामला जुड़ा थाl इन जानकारियों को दर्ज किया जा रहा है। यानी अब रिश्वत सिर्फ जेब से निकलने वाला पैसा नहीं रह गई। उसका हिसाब भी रखा जा रहा है। वेबसाइट पर दर्ज शिकायतों में पुलिस सबसे आगे दिखाई देती है। उसके बाद आरटीओ का नंबर आता है। राज्यों में कर्नाटक की शिकायतें सबसे ज्यादा बताई जा रही हैं। आंकड़े बदल सकते हैं, लेकिन सवाल नहीं बदलता है l आखिर नागरिकों को सरकारी काम के लिए रिश्वत देने की जरूरत क्यों पड़ रही है? और वेबसाइट का एक विकल्प तो इस पूरी व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करता है कि “मैंने रिश्वत देने से मना कर दिया।” यहीं असली कहानी शुरू होती है। रिश्वत देने से मना करना अच्छी बात है। लेकिन उसके बाद क्या हुआ? क्या अधिकारी ने बिना पैसे लिए काम कर दिया? क्या फाइल रोक दी गई? क्या नागरिक को दफ्तर के चक्कर लगाने पड़े?

क्या उसका काम जानबूझकर लटकाया गया? क्योंकि रिश्वतखोरी की असली ताकत सिर्फ पैसे मांगने में नहीं है। उसकी ताकत उस डर में है कि “पैसा नहीं दोगे तो काम नहीं होगा।” जब तक यह डर कायम रहेगा, तब तक रिश्वतखोरी भी कायम रहेगी।
ब्राइबस .फई का महत्व इसी जगह है। यह कोई सरकारी जांच एजेंसी नहीं है और वेबसाइट पर दर्ज हर शिकायत को अपने आप में प्रमाणित भ्रष्टाचार का मामला भी नहीं माना जा सकता। लेकिन नागरिकों के अनुभवों का यह सार्वजनिक रिकॉर्ड यह जरूर दिखा सकता है कि किन विभागों में, किन सेवाओं के लिए और किन जगहों पर रिश्वत की शिकायतें बार-बार सामने आ रही हैं। सरकार के लिए यह एक चेतावनी है।
अगर किसी विभाग के खिलाफ लगातार शिकायतें आ रही हैं तो वहां जांच क्यों नहीं होती? किसी खास कार्यालय में एक जैसी शिकायतें बार-बार आती हैं तो निगरानी क्यों नहीं बढ़ाई जाती? अगर डिजिटल व्यवस्था के बावजूद नागरिक को किसी कर्मचारी की जेब गर्म करनी पड़ रही है तो फिर डिजिटल शासन का फायदा किसे मिल रहा है? भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकारें लंबे समय से अभियान चलाती रही हैं। कानून बने, संस्थाएं बनीं, हेल्पलाइन बनीं, जागरूकता अभियान चले। लेकिन आम आदमी के लिए भ्रष्टाचार का सबसे सीधा पैमाना आज भी यही है कि क्या मेरा काम बिना पैसे दिए हो जाएगा? यही सवाल पूरी व्यवस्था की परीक्षा है। यह भी समझना होगा कि रिश्वत देने वाला हर नागरिक भ्रष्टाचार का भागीदार नहीं होता। बहुत बार वह उसका शिकार होता है। उसे अपना काम चाहिए, समय कम है और उसे मालूम है कि शिकायत करने की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। सामने वाला अधिकारी यह जानता है और इसी मजबूरी का फायदा उठाता है।
इसलिए रिश्वतखोरी केवल पैसों का लेन-देन नहीं है। यह सत्ता और नागरिक की मजबूरी के बीच का सौदा है। अब फर्क यह है कि उस सौदे का रिकॉर्ड बनने लगा है। एक आदमी ने बताया कि उससे रिश्वत मांगी गई। दूसरे ने बताया। फिर तीसरे ने। अलग-अलग घटनाएं एक जगह जमा होने लगीं तो एक तस्वीर सामने आने लगी। एक शिकायत निजी अनुभव है, लेकिन सैकड़ों शिकायतें व्यवस्था पर सवाल बन जाती हैं।
यही कारण है कि इस तरह की पहल को सिर्फ सोशल मीडिया का नया चलन मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। अगर इसका इस्तेमाल जिम्मेदारी से किया जाए और शिकायतों की स्वतंत्र जांच के लिए तंत्र विकसित हो, तो यह भ्रष्टाचार के खिलाफ नागरिक भागीदारी का उपयोगी माध्यम बन सकता है। लेकिन असली जिम्मेदारी फिर भी सरकार की है। जनता शिकायत दर्ज कर सकती है। सरकार को कार्रवाई करनी होगी।
जनता बता सकती है कि कहां रिश्वत मांगी गई। सरकार को पता लगाना होगा कि क्यों मांगी गई।
जनता आंकड़े जुटा सकती है। सरकार को उन आंकड़ों से व्यवस्था सुधारनी होगी।
क्योंकि भ्रष्टाचार खत्म करने का दावा तब तक खोखला है, जब तक रिश्वत मांगने वाले को यह डर न हो कि उसकी शिकायत होगी, जांच होगी और कार्रवाई भी होगी।
एक वेबसाइट भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकती। लेकिन वह एक बड़ा काम जरूर कर सकती है कि भ्रष्टाचार पर चुप्पी खत्म कर सकती है। अब तक रिश्वतखोरों को भरोसा था कि पैसा लो और मामला खत्म। अब जनता कह रही है कि पैसा लिया है तो हिसाब भी होगा। और यही इस पूरी कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है रिश्वतखोरों का कच्चा चिट्ठा अब सिर्फ सरकारी फाइलों में नहीं, जनता के पास भी है।

