मुद्दे की बात :प्रदूषण घटाने निकली सरकार, कहीं गरीब की रोजी तो नहीं घटा रही?लेखक वरिष्ठ संपादक :आलोक गौड़

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दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को जहरीली हवा से निज़ात दिलाने के नाम पर सरकार ने सड़कों पर दौड़ रहे सीएनजी ऑटो को धीरे-धीरे हटाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। जिसके तहत जनवरी 2028 से नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद और सोनीपत में नए सीएनजी ऑटो का पंजीकरण बंद कर दिया जाएगा। यानी इन शहरों में भविष्य में नया सीएनजी ऑटो सड़क पर उतारने का रास्ता बंद हो जाएगा। सरकार की दलील प्रदूषण नियंत्रण और स्वच्छ परिवहन की ओर बढ़ने की है, लेकिन इस फैसले के साथ कुछ ऐसे सवाल भी खड़े होते हैं जिनका जवाब केवल ‘प्रदूषण कम करना है’ कहकर नहीं दिया जा सकता। सबसे पहला सवाल तो यह है कि जिस सीएनजी को कभी प्रदूषण से लड़ाई का हथियार बताया गया था, वही अब अचानक समस्या कैसे बन गई? दिल्ली और एनसीआर में पेट्रोल-डीजल वाहनों के मुकाबले सीएनजी वाहनों को बढ़ावा देने की नीति कोई नई नहीं है।

ऑटो चालकों ने सरकार के भरोसे अपने पुराने वाहन बदले, सीएनजी ऑटो खरीदे, कर्ज लिए और अपनी रोजी-रोटी इसी व्यवस्था से जोड़ी। अब सरकार कह रही है कि 2028 से नए सीएनजी ऑटो का पंजीकरण नहीं होगा। इसका सीधा मतलब है कि हजारों छोटे वाहन मालिकों के लिए भविष्य में सीएनजी ऑटो खरीदकर कारोबार शुरू करने का विकल्प खत्म हो जाएगा।
अगर सरकार इलेक्ट्रिक ऑटो को विकल्प बनाना चाहती है तो यह भी बताना होगा कि क्या इलेक्ट्रिक ऑटो की कीमत, बैटरी, चार्जिंग, रखरखाव और वित्तीय बोझ एक सामान्य ऑटो चालक की पहुंच में है? क्या हर उस चालक को सस्ता ऋण मिलेगा जो सीएनजी से इलेक्ट्रिक वाहन में जाना चाहता है? क्या पुराना सीएनजी ऑटो बदलने के लिए सरकार कोई सहायता या प्रोत्साहन देगी? और सबसे महत्वपूर्ण कि क्या एनसीआर में इतनी चार्जिंग व्यवस्था तैयार है कि लाखों यात्रियों की जरूरत पूरी करने वाले सार्वजनिक परिवहन को बिना व्यवधान के इलेक्ट्रिक बनाया जा सके? सिर्फ पंजीकरण बंद कर देना संक्रमण की नीति नहीं है। संक्रमण के लिए विकल्प भी देना पड़ता है।
प्रदूषण पर सरकार की चिंता जायज है दिल्ली – एनसीआर की हवा हर साल सर्दियों में सांस लेने लायक नहीं रह जाती। लेकिन प्रदूषण की पूरी जिम्मेदारी ऑटो और छोटे वाहन चालकों के सिर डाल देना आसान समाधान है। शहरों में निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, सड़कों पर जमी मिट्टी, औद्योगिक उत्सर्जन, कूड़ा जलाना, डीजल से चलने वाले भारी वाहन, बिजली संयंत्र और आसपास के राज्यों में पराली जलाने जैसे अनेक स्रोत हैं। सवाल यह है कि इन सभी स्रोतों पर कार्रवाई का पैमाना क्या है? हर बार जब प्रदूषण बढ़ता है, सबसे पहले आम आदमी की गाड़ी पर प्रतिबंध, निर्माण पर रोक, स्कूल बंद करने या यातायात नियंत्रित करने जैसे उपाय सामने आते हैं। लेकिन प्रदूषण पैदा करने वाले बड़े और संगठित स्रोतों पर कार्रवाई उतनी दिखाई क्यों नहीं देती? यदि ऑटो का प्रदूषण समस्या है तो आंकड़े सामने रखिए। बताइए कि एनसीआर के कुल प्रदूषण में सीएनजी ऑटो का योगदान कितना है और इन्हें हटाने से कितना सुधार आएगा।
क्योंकि नीति का आधार केवल यह नहीं हो सकता कि कोई वाहन ‘पुराना’ है या उसका ईंधन अब सरकार की नई प्राथमिकता में नहीं है। नीति का आधार यह होना चाहिए कि उससे प्रदूषण कितना घटेगा और उसकी सामाजिक-आर्थिक कीमत कितनी होगी।
यहां एक और सवाल है। क्या सरकार ने ऑटो चालकों से पूछा है कि वे इलेक्ट्रिक वाहन पर जाने के लिए तैयार हैं या नहीं? जिस व्यक्ति की पूरी पूंजी एक ऑटो में लगी है, उसके लिए वाहन केवल परिवहन का साधन नहीं, परिवार की आय का साधन है। सीएनजी ऑटो बंद करने का फैसला कागज पर पर्यावरण नीति हो सकता है, लेकिन सड़क पर इसका असर उस चालक की जेब पर पड़ेगा जो रोज कमाकर घर चलाता है।
अगर सरकार सचमुच स्वच्छ परिवहन चाहती है तो उसे दंड और प्रतिबंध से पहले प्रोत्साहन का रास्ता अपनाना चाहिए। पुराने सीएनजी ऑटो को चरणबद्ध तरीके से इलेक्ट्रिक ऑटो से बदलने की स्पष्ट योजना बने। चालकों को सब्सिडी मिले, सस्ता कर्ज मिले, पुराने वाहन के बदले उचित विनिमय मूल्य मिले और चार्जिंग केंद्रों का ऐसा नेटवर्क तैयार हो जो केवल कागज पर नहीं, जमीन पर भी दिखाई दे।
इसके साथ ही सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना होगा। दिल्ली-एनसीआर में अगर लोगों को सस्ती, भरोसेमंद और पर्याप्त बस, मेट्रो तथा अंतिम छोर तक पहुंचाने वाली परिवहन व्यवस्था मिलेगी तो निजी वाहनों पर निर्भरता भी घटेगी। केवल ऑटो हटाने से प्रदूषण की समस्या हल नहीं होगी; कहीं ऐसा न हो कि ऑटो की जगह दूसरे निजी वाहन सड़कों पर बढ़ जाएं।
सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि 2028 के बाद मौजूदा सीएनजी ऑटो का क्या होगा। क्या उन्हें अचानक अनुपयोगी घोषित किया जाएगा? क्या उनके परमिट पर कोई असर पड़ेगा? क्या उनकी उम्र पूरी होने तक उन्हें चलने दिया जाएगा? यदि पुराने वाहनों को भी चरणबद्ध तरीके से हटाया जाना है तो उसका कैलेंडर क्या है? नीति में स्पष्टता जरूरी है, क्योंकि अनिश्चितता का सबसे बड़ा नुकसान हमेशा छोटे आदमी को होता है।
पर्यावरण बचाना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। स्वच्छ हवा नागरिक का अधिकार है। लेकिन स्वच्छ हवा के नाम पर ऐसी नीति नहीं बन सकती जिसमें प्रदूषण के समाधान का खर्च सबसे पहले उस व्यक्ति से वसूला जाए जिसकी आर्थिक क्षमता सबसे कम है।
सीएनजी से इलेक्ट्रिक की ओर जाना समय की जरूरत हो सकती है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि बदलाव होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि बदलाव किस कीमत पर होगा और वह कीमत कौन चुकाएगा?
अगर सरकार के पास प्रदूषण कम करने की वैज्ञानिक योजना है तो उसे आंकड़ों के साथ सामने रखना चाहिए। अगर इलेक्ट्रिक परिवहन ही भविष्य है तो उसके लिए पूरा ढांचा तैयार करना चाहिए। और अगर सीएनजी ऑटो को हटाना जरूरी है तो उन चालकों के लिए भी रास्ता बनाना होगा जिनकी जिंदगी उसी ऑटो से चलती है।
वरना जनवरी 2028 का यह फैसला इतिहास में स्वच्छ परिवहन की दिशा में उठाया गया कदम कम और गरीब की रोजी पर पर्यावरण नीति का प्रयोग ज्यादा दिखाई देगा।
प्रदूषण से लड़ना जरूरी है, लेकिन ऐसी लड़ाई चाहिए जिसमें हवा भी साफ हो और गरीब की सांस भी न रुके।

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