मुद्दे की बात :-भ्रष्टाचार का भी कोई धर्म होता है क्या? :–लेखक वरिष्ठ सम्पादक :–:आलोक गौड़


नई दिल्ली l भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं है कि भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हुआ। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की विश्वसनीयता ही समाप्त होती जा रही है। देश के नागरिकों को अब यह समझ में नहीं आता कि भ्रष्टाचार वास्तव में एक अपराध है, एक नैतिक प्रश्न है या केवल एक राजनीतिक हथियार। आरोप लगते हैं तो जनता सबसे पहले यह नहीं पूछती कि आरोप सही हैं या गलत। वह यह पूछती है कि आरोप किस पर लगे हैं। क्योंकि पिछले एक दशक के राजनीतिक अनुभव ने उसे सिखा दिया है कि इस देश में आरोपों का वजन सबूतों से नहीं, राजनीतिक पहचान से तय होता है।


अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू और उनके परिवार से जुड़ी कंपनियों को कथित तौर पर मिले सरकारी ठेकों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच के आदेश ने एक बार फिर इसी प्रश्न को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। याचिका में आरोप लगाया गया कि पिछले वर्षों में मुख्यमंत्री के परिवार, रिश्तेदारों और उनसे जुड़े लोगों की कंपनियों को भारी मात्रा में सरकारी ठेके दिए गए। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान इसे “उल्लेखनीय संयोग” माना और जांच की आवश्यकता पर बल दिया। ध्यान रहे, यह किसी विपक्षी दल की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं थी। यह किसी चुनावी मंच का आरोप नहीं था। यह किसी टीवी एंकर की चीख-पुकार नहीं थी। यह देश की सर्वोच्च अदालत की कार्यवाही का हिस्सा था।
लेकिन इस आदेश के बाद देश में वह राजनीतिक प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दी, जिसकी आदत भारतीय जनता को पड़ चुकी है।
यहीं से असली मुद्दा शुरू होता है। अगर यही आदेश किसी विपक्षी मुख्यमंत्री के खिलाफ आया होता तो क्या होता?क्या तब भी राजनीतिक दल संयम की सलाह देते? क्या तब भी कहा जाता कि जांच पूरी होने तक इंतजार किया जाना चाहिए?
क्या तब भी नैतिकता को कानूनी प्रक्रिया के पूरा होने तक स्थगित रखा जाता?
या फिर इस्तीफे की मांगें, टीवी बहसें, सोशल मीडिया अभियान और राजनीतिक हमले उसी रात शुरू हो गए होते? यह प्रश्न किसी एक दल के बारे में नहीं है। भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे दोहरे मानदंडों से भरा पड़ा है। सत्ता में आने से पहले लगभग हर दल भ्रष्टाचार के विरुद्ध क्रांतिकारी दिखाई देता है। सत्ता में आने के बाद वही दल प्रक्रियाओं, तकनीकीताओं और कानूनी व्याख्याओं का सबसे बड़ा समर्थक बन जाता है।
दरअसल भारतीय राजनीति ने भ्रष्टाचार को कभी नैतिक प्रश्न माना ही नहीं। उसने उसे हमेशा राजनीतिक अवसर की तरह देखा। जब विरोधी पर हमला करना होता है तो भ्रष्टाचार लोकतंत्र का सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। जब अपने लोगों की रक्षा करनी होती है तो वही भ्रष्टाचार जांच पूरी होने तक केवल एक आरोप रह जाता है।
यही कारण है कि जनता के मन में यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई सिद्धांतों की नहीं, चयन की लड़ाई है। यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
क्या केवल आरोप लगने भर से किसी व्यक्ति को दोषी मान लिया जाना चाहिए?निश्चित रूप से नहीं। भारतीय संविधान, भारप्रक्रिया और न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति तब तक निर्दोष माना जाएगा जब तक उसका अपराध सिद्ध न हो जाए। अदालतें इसी सिद्धांत पर चलती हैं और चलनी भी चाहिए।
लेकिन राजनीति केवल अदालतों से नहीं चलती।
राजनीति में एक दूसरी अवधारणा भी होती है—नैतिक जवाबदेही।
कानून और नैतिकता एक ही चीज नहीं हैं। कानून पूछता है कि अपराध सिद्ध हुआ या नहीं। नैतिकता पूछती है कि क्या सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति का आचरण इतना निष्पक्ष और पारदर्शी था कि जनता का विश्वास बना रहे।
इसीलिए दुनिया भर के लोकतंत्रों में अनेक बार ऐसे नेता इस्तीफा देते रहे हैं जिनके खिलाफ कोई आपराधिक दोष सिद्ध नहीं हुआ था। उन्होंने इस्तीफा इसलिए दिया क्योंकि पद की गरिमा और जांच की निष्पक्षता को बनाए रखना आवश्यक माना गया।
भारत में दुर्भाग्य से नैतिकता की यह अवधारणा लगातार कमजोर हुई है।
आज अधिकांश राजनीतिक दल नैतिकता को केवल विरोधियों पर लागू होने वाला सिद्धांत मानते हैं।
जब विपक्ष का नेता जांच के घेरे में आता है तो इस्तीफे की मांग की जाती है। जब अपना नेता जांच के घेरे में आता है तो कहा जाता है कि आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं।
दोनों तर्क अपने-अपने स्थान पर अधूरे हैं। लोकतंत्र में न तो केवल आरोप के आधार पर किसी को अपराधी घोषित किया जा सकता है और न ही गंभीर आरोपों को केवल इसलिए नजरअंदाज किया जा सकता है क्योंकि अपराध अभी सिद्ध नहीं हुआ।
लेकिन भारतीय राजनीति ने इन दोनों अतियों को सुविधानुसार अपनाया है।
समस्या यहीं समाप्त नहीं होती। इस पूरे विवाद का एक तीसरा पक्ष भी है कि जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता।
पिछले कुछ वर्षों में ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग जैसी संस्थाओं की कार्रवाई को लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। विपक्ष आरोप लगाता रहा है कि एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। दूसरी ओर सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है।
सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन लोकतंत्र में केवल निष्पक्षता पर्याप्त नहीं होती। निष्पक्षता दिखाई भी देनी चाहिए।
अगर जनता का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगे कि एजेंसियां चयनात्मक तरीके से काम कर रही हैं तो संस्थाओं की साख कमजोर होती है।
और जब संस्थाओं की साख कमजोर होती है तो लोकतंत्र की बुनियाद भी कमजोर होती है।
यही कारण है कि पेमा खांडू का मामला केवल एक मुख्यमंत्री या एक राज्य का मामला नहीं है। यह उस व्यापक संकट का प्रतीक है जिसमें देश फंसता जा रहा है। एक तरफ राजनीतिक दल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाते हैं। दूसरी तरफ वही दल अपने नेताओं के मामले में अलग भाषा बोलते हैं।
एक तरफ एजेंसियों की कार्रवाई को न्याय कहा जाता है।
दूसरी तरफ उसी कार्रवाई को राजनीतिक प्रतिशोध बताया जाता है। एक तरफ अदालतों का सम्मान किया जाता है।
दूसरी तरफ फैसलों को राजनीतिक सुविधा के चश्मे से देखा जाता है।
ऐसे माहौल में सबसे बड़ी हार जनता की होती है।
जनता धीरे-धीरे यह विश्वास खोने लगती है कि सचमुच कोई निष्पक्ष व्यवस्था भी मौजूद है।
और लोकतंत्र में जब विश्वास टूटता है तो कानून बचा रह सकता है, संस्थाएं बची रह सकती हैं, चुनाव भी होते रह सकते हैं; लेकिन लोकतंत्र की आत्मा घायल हो जाती है।
आज जरूरत किसी एक व्यक्ति के बचाव या विरोध की नहीं है।
जरूरत एक समान मानदंड की है।
अगर केवल आरोप विपक्ष के लिए नैतिक संकट हैं, तो सत्ता के लिए भी होने चाहिए।
अगर जांच पूरी होने तक इंतजार करना आवश्यक है, तो यह सिद्धांत सब पर लागू होना चाहिए।
अगर राजनीतिक नैतिकता का कोई अर्थ है, तो वह व्यक्ति और दल देखकर नहीं बदल सकती।
वरना जनता यह निष्कर्ष निकालने के लिए मजबूर होगी कि भारत में भ्रष्टाचार भी दो श्रेणियों में विभाजित हो चुका है।
एक भ्रष्टाचार वह है जो राष्ट्रद्रोह माना जाता है।
दूसरा भ्रष्टाचार वह है जो राष्ट्रहित में समायोजित कर लिया जाता है।
और जिस दिन किसी लोकतंत्र में अपराध की परिभाषा कानून नहीं, राजनीतिक सुविधा तय करने लगे, उस दिन समस्या केवल भ्रष्टाचार की नहीं रहती।
उस दिन समस्या पूरे लोकतांत्रिक चरित्र की हो जाती है।

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