

नई दिल्ली l देश में बेरोजगारी अपने सबसे भयावह दौर में खड़ी है। लाखों युवा डिग्रियां लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं। कोई प्रतियोगी परीक्षा का रिज़ल्ट आने का इंतजार करते-करते ओवरएज हो रहा है, कोई पेपर लीक की भेंट चढ़ गया, कोई भर्ती रद्द होने के बाद अवसाद में है और कोई आत्महत्या तक कर चुका है। लेकिन सत्ता के गलियारों में इस त्रासदी को भी एक भव्य राजनीतिक आयोजन में बदल देने की कला विकसित हो चुकी है।
प्रधानमंत्री फिर देशभर के युवाओं को नियुक्ति पत्र बांटते दिखाई दिए। टीवी चैनलों पर सीधा प्रसारण हुआ। सरकारी कैमरे दौड़े। मंच सजे। भाषण हुए। तालियां बजीं। ऐसा वातावरण बनाया गया जैसे देश में रोजगार क्रांति आ चुकी हो और बेरोजगारी इतिहास बन गई हो।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच यह रोजगार का उत्सव था या फिर सरकारी नौकरियों पर राजनीतिक ब्रांडिंग का नया प्रयोग?
देश के 41 शहरों में एक साथ नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम आयोजित किए गए। अब कोई सामान्य नागरिक भी समझ सकता है कि भारत में सरकारी भर्तियां किसी एक कार्यालय या एक प्रक्रिया से नहीं होतीं। रेलवे की भर्ती अलग एजेंसी करती है। बैंकिंग क्षेत्र की अपनी प्रणाली है। कर्मचारी चयन आयोग की अलग परीक्षाएं हैं। डाक विभाग, आयकर विभाग, रक्षा मंत्रालय, विश्वविद्यालय, सार्वजनिक उपक्रम, केंद्रीय विद्यालय—सबकी प्रक्रिया अलग, समय अलग और चयन प्रणाली अलग होती है।
किसी भर्ती का परिणाम एक साल पहले आया। किसी का दस्तावेज सत्यापन हाल में पूरा हुआ। कोई मामला अदालत में लंबित रहा। कोई चयन सूची महीनों पहले जारी हुई। फिर अचानक एक दिन इन सबको जोड़कर “राष्ट्रीय नियुक्ति महोत्सव” कैसे बना दिया जाता है?
असलियत साफ है। यह रोजगार कम और प्रचार अधिक है। जिन युवाओं की नौकरी पहले ही तय हो चुकी होती है, उन्हें कैमरों के सामने खड़ा करके यह संदेश दिया जाता है कि देश का हर रोजगार सीधे शीर्ष नेतृत्व की कृपा से मिल रहा है। यानी अब सरकारी संस्थाओं की संवैधानिक प्रक्रिया भी राजनीतिक छवि निर्माण का हिस्सा बना दी गई है।
यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।
सरकारी नौकरी किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या नेता की निजी संपत्ति नहीं होती। यह संविधान के तहत मिलने वाला अधिकार है। उस नौकरी के लिए युवाओं ने परीक्षा दी होती है। फीस भरी होती है। कई-कई साल तैयारी की होती है। परिवारों ने कर्ज लिया होता है। मां-बाप ने गहने बेचे होते हैं। बच्चों ने मानसिक तनाव झेला होता है। तब जाकर कहीं एक नियुक्ति पत्र मिलता है। लेकिन आज उस नियुक्ति पत्र को ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है मानो कोई राजा अपने दरबार में कृपा बांट रहा हो।
और विडंबना देखिए। कुछ दिन पहले देश को बचत का ज्ञान दिया गया। कहा गया कि तेल बचाइए। खर्च कम कीजिए। विदेशी यात्राएं टालिए। अनावश्यक खरीदारी मत कीजिए। जनता को समझाया गया कि समय कठिन है। लेकिन उसी कठिन समय में 41 शहरों में सरकारी तामझाम के साथ नियुक्ति पत्र वितरण समारोह आयोजित होते हैं। हजारों कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है। मंच बनते हैं। पंडाल सजते हैं। सुरक्षा व्यवस्था लगती है। सरकारी प्रसारण तंत्र सक्रिय होता है। यात्रा खर्च होता है। बिजली खर्च होती है। प्रचार पर पैसा बहता है। तो क्या मितव्ययिता सिर्फ जनता के लिए है? क्या नियुक्ति पत्र ईमेल से नहीं भेजे जा सकते थे? क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से यह काम नहीं हो सकता था? क्या युवाओं को नौकरी देने से ज्यादा जरूरी उसका राजनीतिक प्रदर्शन था?
दरअसल आज की राजनीति में काम से ज्यादा उसका कैमरा एंगल महत्वपूर्ण हो गया है। नौकरी कम दीजिए, लेकिन उसका प्रसारण भव्य कीजिए। भर्ती कम निकालिए, लेकिन मंच बड़ा बनाइए। यही कारण है कि देश का युवा अब सरकारी घोषणाओं पर ताली नहीं बजा रहा, बल्कि सवाल पूछ रहा है।और सवाल भी छोटे-मोटे नहीं हैं। अगर सरकार रोजगार को लेकर इतनी गंभीर है तो फिर सरकारी विभागों में लाखों पद खाली क्यों पड़े हैं? रेलवे में नियमित भर्तियां कम क्यों होती जा रही हैं? सेना में स्थायी भर्ती की जगह अस्थायी मॉडल क्यों बढ़ रहे हैं? विश्वविद्यालयों में वर्षों से पद खाली क्यों हैं?न्यायपालिका में जजों की कमी क्यों है? अस्पतालों में डॉक्टर और नर्सों की भारी कमी के बावजूद नियुक्तियां क्यों नहीं हो रहीं?
क्यों हर परीक्षा पेपर लीक के डर में जी रही है? क्यों हर भर्ती अदालत में फंस जाती है? क्यों हर साल लाखों युवा तैयारी करते-करते उम्र सीमा पार कर जाते हैं?
इन सवालों का जवाब देने के बजाय सत्ता कैमरों के सामने नियुक्ति पत्र बांट रही है।
सबसे दुखद यह है कि इस उत्सव में उन युवाओं की चीख दब जाती है जिन्होंने बेरोजगारी से तंग आकर आत्महत्या कर ली। उन परिवारों का दर्द गायब हो जाता है जिन्होंने बच्चों की तैयारी में जमीन तक बेच दी। उन अभ्यर्थियों की पीड़ा पर्दे के पीछे धकेल दी जाती है जिनकी मेहनत पेपर लीक माफिया खा गया।
देश का युवा अब भावनात्मक भाषणों से आगे निकल चुका है। वह आंकड़े मांग रहा है। वह पूछ रहा है कि आखिर रोजगार पर श्वेतपत्र क्यों नहीं आता? खाली पदों का वास्तविक डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? राष्ट्रीय भर्ती कैलेंडर कानून क्यों नहीं बनता? भर्ती प्रक्रिया की समयसीमा तय क्यों नहीं होती? लेकिन इन सवालों का जवाब देने के बजाय सत्ता आयोजन कर रही है। सच तो यह है कि आज का सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी ही नहीं, बल्कि बेरोजगारी की मार्केटिंग है। नौकरी को अधिकार के बजाय उपकार में बदल देने की कोशिश है। लोकतंत्र को संस्थाओं से हटाकर व्यक्तियों के इर्द-गिर्द खड़ा करने की कोशिश है।
यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
क्योंकि जिस दिन देश का युवा यह मानने लगेगा कि नौकरी संविधान नहीं, बल्कि सत्ता की कृपा से मिलती है, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगेगी।
देश को मंच नहीं चाहिए।
देश को भाषण नहीं चाहिए।
देश को कैमरे नहीं चाहिए।
देश को रोजगार चाहिए।
स्थायी रोजगार।
सम्मानजनक रोजगार।
पारदर्शी रोजगार।
और सबसे ज्यादाहै l ऐसा सिस्टम चाहिए जिसमें नियुक्ति पत्र राजनीतिक उत्सव नहीं, एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया हो।

