

नई दिल्ली। देश के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा दौर आया है जब सबसे ज्यादा डिग्रियां हैं, सबसे ज्यादा मोबाइल हैं, सबसे ज्यादा इंटरनेट है लेकिन भविष्य सबसे ज्यादा अंधेरे में है।
करोड़ों युवा पढ़ रहे हैं, परीक्षाएं दे रहे हैं, कोचिंग की धूल फांक रहे हैं, डिग्रियां उठा रहे हैं और अंत में उनके हाथ क्या आ रहा है? बेरोजगारी हताशा। असुरक्षा। और एक लंबा इंतजार। लेकिन सत्ता को डर नहीं लग रहा।
क्यों? क्योंकि उसने इस बेरोजगार पीढ़ी को एक नया खिलौना दे दिया है l “रील”।
मोबाइल उठाइए। चेहरे पर फिल्टर लगाइए।दो लाइन बोलिए। थोड़ा नाच लीजिए।
थोड़ा रो लीजिए। थोड़ा गुस्सा दिखाइए। और फिर पूरी दुनिया के सामने खुद को परोस दीजिए।इसे नाम दिया गया l “कंटेंट क्रिएशन।”
सच पूछिए तो यह इस दौर का सबसे चमकदार धोखा है।
देश का युवा नौकरी नहीं मांग रहा, “वायरल” होने की दुआ मांग रहा है। उसे रोजगार नहीं चाहिए, “रीच” चाहिए। उसे स्थिर भविष्य नहीं चाहिए, “फॉलोअर्स” चाहिए।
और यह सब अचानक नहीं हुआ। यह योजनाबद्ध तरीके से तैयार किया गया सामाजिक और मानसिक जाल है। पहले व्यवस्था युवाओं को धर्म और जाति में उलझाती थी। अब उसने उससे भी सस्ता और असरदार तरीका खोज लिया है l
उसे मोबाइल स्क्रीन में कैद कर दो। उसे इतना व्यस्त रखो कि वह सवाल पूछने लायक ही न बचे। क्योंकि सवाल पूछने वाला युवा सत्ता के लिए खतरा होता है।
लेकिन दिनभर रील बनाने वाला युवा सत्ता के लिए सबसे सुरक्षित नागरिक होता है। उसे यह याद नहीं रहता कि लाखों सरकारी पद खाली पड़े हैं। उसे यह याद नहीं रहता कि प्रतियोगी परीक्षाएं पेपर लीक का अड्डा बन चुकी हैं। उसे यह याद नहीं रहता कि महंगाई ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है।
उसे सिर्फ यह याद रहता है कि अगली रील किस गाने पर बनानी है। यह कोई सामान्य बदलाव नहीं है। यह पूरी पीढ़ी की चेतना को कुंद करने की प्रक्रिया है। आज गांव का किसान परेशान है, लेकिन उसका बेटा खेत में मदद करने के बजाय मोबाइल स्टैंड लगाकर वीडियो बना रहा है।
शहर का छात्र लाइब्रेरी में कम और कैमरे के सामने ज्यादा दिखाई देता है। घर की बेटियां अब आईने से ज्यादा मोबाइल कैमरे में खुद को देखने लगी हैं। लड़के अपनी योग्यता नहीं, फॉलोअर्स गिनते हैं। और बाजार खुश है। क्योंकि उसने इंसान को ग्राहक से भी आगे बढ़ाकर “प्रोडक्ट” बना दिया है।
पहले बाजार साबुन बेचता था। अब इंसान बेच रहा है।
उसकी हंसी बिक रही है।
उसकी मोहब्बत बिक रही है।
उसका दुख बिक रहा है।
उसकी गरीबी बिक रही है।
उसके परिवार के झगड़े बिक रहे हैं। अब मां-बाप की बीमारी भी कंटेंट है।
बच्चों के आंसू भी कंटेंट हैं।
गरीबी भी कंटेंट है। भूख भी कंटेंट है। और सबसे शर्मनाक बात यह है कि समाज इसे सामान्य मानने लगा है।
कभी लोग किसी घायल की मदद के लिए दौड़ते थे।
अब मोबाइल निकालते हैं।
कभी लोग किताब लिखकर समाज बदलना चाहते थे।
अब लोग “ट्रेंडिंग ऑडियो” पकड़कर वायरल होना चाहते हैं।कभी युवाओं के आदर्श भगत सिंह, अंबेडकर और अशफाक उल्ला खान होते थे। अब एल्गोरिद्म तय करता है कि अगला “आइकन” कौन होगा। जिस देश की युवा पीढ़ी किताबों से ज्यादा स्क्रीन को देखने लगे, वहां लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदलने लगता है।अब किसी के पास लंबा सोचने का धैर्य नहीं बचा।हर चीज छोटी चाहिए।छोटा वीडियो। छोटी बहस। छोटी याददाश्त।
छोटा गुस्सा। यानी ऐसी पीढ़ी तैयार की जा रही है जो हर घटना पर कुछ सेकंड भावुक हो, फिर अगली रील पर चली जाए।
पेपर लीक हुआ? दो दिन गुस्सा। फिर अगला ट्रेंड।
बेरोजगारी बढ़ी?थोड़ी बहस।
फिर अगला मीम।महंगाई बढ़ी? कुछ पोस्ट।
फिर नया वायरल गाना।
यानी व्यवस्था ने जनता को दबाने का नया तरीका खोज लिया है l उसे लगातार मनोरंजन में डुबो दो।
इतिहास गवाह है कि जो समाज सोचने की क्षमता खो देता है, वह धीरे-धीरे प्रतिरोध की क्षमता भी खो देता है।
और आज सबसे बड़ा हमला युवाओं की सोचने की क्षमता पर ही हो रहा है।उन्हें पढ़ने से दूर करो। उन्हें बहस से दूर करो। उन्हें संगठन से दूर करो। उन्हें संघर्ष से दूर करो।
और फिर उन्हें यह भरोसा दिलाओ कि मोबाइल कैमरा ही उनका भविष्य है।
सच यह है कि करोड़ों युवा “कंटेंट क्रिएटर” नहीं बने हैं।
वे डिजिटल कंपनियों के मुफ्त मजदूर बन गए हैं।
वे दिनभर कंटेंट बनाते हैं।
प्लेटफॉर्म अरबों कमाते हैं।
और बदले में युवाओं को कुछ लाइक, कुछ व्यू और झूठी प्रसिद्धि दे दी जाती है। यह नई किस्म की डिजिटल गुलामी है।मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है। लेकिन
उसी चमक में धीरे-धीरे एक पूरी पीढ़ी का विवेक बुझता जा रहा है। और शायद आने वाले समय में इतिहास यह लिखेगा कि इस देश के युवाओं से उनकी नौकरी, उनका धैर्य और उनका भविष्य छीनने से पहले उनसे उनकी सोचने की क्षमता छीनी गई थी।

