मुद्दे की बात :देश हो या क्रिकेट, हार की शुरुआत गलत कप्तान से होती है:-लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-:-:आलोक गौड़

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– क्रिकेट के मैदान में जब कोई टीम लगातार हारती है तो सबसे पहले उंगली कप्तान पर उठती है। टीवी स्टूडियो से लेकर चाय की दुकान तक बहस छिड़ जाती है कि कप्तान बदलो, टीम बदल जाएगी। कुछ हद तक यह बात सही भी है, क्योंकि कप्तान सिर्फ टॉस करने वाला खिलाड़ी नहीं होता, वह पूरी टीम की सोच, रणनीति और दिशा तय करता है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि कप्तान कैसा निकला। असली सवाल यह है कि कप्तान चुना कैसे गया?
यहीं से राजनीति और क्रिकेट एक-दूसरे के सामने आईना बनकर खड़े हो जाते हैं।
क्रिकेट में अगर किसी खिलाड़ी को उसकी प्रतिभा के बजाय लॉबी, रिश्ते या किसी प्रभावशाली व्यक्ति की पसंद के कारण कप्तानी मिल जाए तो नुकसान एक टूर्नामेंट तक सीमित रह सकता है। लेकिन लोकतंत्र में अगर देश की बागडोर ऐसे हाथों में चली जाए जो नेतृत्व की योग्यता से अधिक प्रचार, प्रबंधन या व्यक्तिपूजा के कारण ऊपर पहुंचे हों, तो उसकी कीमत सिर्फ एक सरकार नहीं, पूरी पीढ़ी चुकाती है।
हार कभी अचानक नहीं आती। हार का पहला दिन वह नहीं होता जब स्कोरबोर्ड पर पराजय दर्ज होती है। हार का पहला दिन वह होता है, जब चयन की मेज़ पर योग्यता हार जाती है और चापलूसी जीत जाती है। जब अनुभव को किनारे कर सुविधा को आगे कर दिया जाता है। जब सच बोलने वालों की जगह सिर हिलाने वालों को महत्व मिलने लगता है। मैदान में दिखाई देने वाली हार तो सिर्फ उस फैसले का सार्वजनिक ऐलान होती है, जिसकी पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी होती है।
किसी भी टीम का कप्तान अपने अकेले के दम पर मैच नहीं जिताता। लेकिन वह अपने अकेले के दम पर पूरी टीम को हरवा जरूर सकता है। क्योंकि कप्तान का सबसे बड़ा काम रन बनाना नहीं, सही आदमी पर भरोसा करना होता है। किसे मौका मिलेगा, किसे बाहर बैठाया जाएगा, किस पर कठिन समय में विश्वास किया जाएगाl यही फैसले जीत और हार का अंतर तय करते हैं। जब ये फैसले योग्यता से नहीं, निष्ठा से होने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि हार ने ड्रेसिंग रूम में प्रवेश कर लिया है।
यही नियम राजनीति पर भी लागू होता है। एक गलत नेता सिर्फ गलत भाषण नहीं देता, वह गलत लोगों को जिम्मेदारी देता है। गलत सलाहकार चुनता है। योग्य लोगों से डरता है। स्वतंत्र संस्थाओं को कमजोर करता है। अपने आसपास ऐसे लोगों की भीड़ खड़ी करता है जो सच नहीं, सिर्फ वही कहते हैं जो वह सुनना चाहता है। धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था उसकी सोच का प्रतिबिंब बन जाती है। तब देश की हार किसी युद्ध में नहीं होती, बल्कि फैसलों में होने लगती है। अर्थव्यवस्था, शिक्षा, न्याय, प्रशासन और लोकतंत्रl सब पर उसका असर दिखाई देने लगता है।
किसी भी राष्ट्र का पतन एक दिन में नहीं होता। वह गलत फैसलों की लंबी श्रृंखला का परिणाम होता है। और लगभग हर श्रृंखला की पहली कड़ी होती है, गलत आदमी के हाथ में कमान। देश हो या क्रिकेट, हार की शुरुआत गलत कप्तान से होती हैl
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां हार भी अक्सर जीत की तरह पेश की जाती है। प्रचार इतना ताकतवर हो चुका है कि असफलता को उपलब्धि और चुप्पी को सहमति साबित करने की कला विकसित हो गई है। जनता को बताया जाता है कि सब कुछ ठीक है, जबकि हकीकत धीरे-धीरे उसकी जेब, उसकी नौकरी, उसकी सुरक्षा और उसके भविष्य में दिखाई देने लगती है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
क्रिकेट में एक गलत कप्तान का असर तुरंत दिखाई देता है। ड्रेसिंग रूम दो हिस्सों में बंटने लगता है। प्रतिभाशाली खिलाड़ी हताश होने लगते हैं। फैसलों पर भरोसा खत्म होने लगता है। खिलाड़ी विरोधी टीम से कम, अपने ही नेतृत्व से ज्यादा लड़ने लगते हैं। अंततः हार स्कोरबोर्ड पर दर्ज हो जाती है।
राजनीति में यह प्रक्रिया कहीं अधिक खतरनाक होती है। यहां स्कोरबोर्ड नहीं होता, इसलिए हार देर से दिखाई देती है। कभी वह बेरोजगारी के आंकड़ों में छिपी होती है, कभी किसानों की बदहाली में, कभी न्याय मिलने में हो रही देरी में, कभी शिक्षा और स्वास्थ्य की गिरती गुणवत्ता में और कभी समाज में बढ़ती नफरत के रूप में। लेकिन समर्थकों की आंखों पर प्रचार का ऐसा पर्दा डाल दिया जाता है कि उन्हें हर सवाल साजिश और हर आलोचना देशद्रोह लगने लगती है।
यहीं सबसे बड़ी त्रासदी शुरू होती है।
जब कप्तान गलत हो तो टीम उसे बदल सकती है। लेकिन जब पूरी व्यवस्था ही गलत कप्तान को बचाने में लग जाए, तब हार स्थायी होने लगती है। फिर चयन योग्यता से नहीं, वफादारी से होने लगता है। संस्थाएं अपने कर्तव्य से ज्यादा सत्ता की सुविधा देखने लगती हैं। सच बोलने वालों को किनारे कर दिया जाता है और झूठ बोलने वालों को पुरस्कार मिलने लगते हैं। धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था एक ऐसे प्रतिध्वनि कक्ष में बदल जाती है, जहां सिर्फ कप्तान की आवाज सुनाई देती है।
इतिहास उठाकर देख लीजिए। किसी भी देश का पतन इसलिए नहीं हुआ कि उसके पास संसाधन कम थे। अधिकांश देशों का नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि गलत लोग सही जगहों पर बैठ गए थे। उन्हें चुनौती देने वाले चुप करा दिए गए थे और ताली बजाने वालों को निर्णय लेने का अधिकार मिल गया था।
क्रिकेट में एक खराब कप्तान के कारण विश्व कप हाथ से निकल सकता है। लेकिन देश में गलत नेतृत्व के कारण पूरी पीढ़ी अवसरों से वंचित हो सकती है। एक मैच हारने के बाद अगला मैच खेला जा सकता है। लेकिन अगर शिक्षा की दिशा गलत तय कर दी जाए, न्याय व्यवस्था कमजोर कर दी जाए, संस्थाओं की स्वतंत्रता खत्म कर दी जाए और समाज को स्थायी विभाजन की ओर धकेल दिया जाए, तो उसकी भरपाई दशकों में भी नहीं होती।
इसलिए यह भ्रम पालना खतरनाक है कि कोई भी कप्तान चलेगा। नहीं, कोई भी कप्तान नहीं चलता।
क्योंकि कप्तान सिर्फ फैसले नहीं लेता, वह पूरी टीम का चरित्र गढ़ता है। देश में भी नेतृत्व सिर्फ सरकार नहीं चलाता, वह राजनीतिक संस्कृति तय करता है। अगर ऊपर बैठा व्यक्ति जवाबदेही से बचता है तो नीचे तक जवाबदेही मर जाती है। अगर ऊपर झूठ सामान्य हो जाए तो नीचे सच बोलना मूर्खता समझा जाने लगता है। अगर ऊपर योग्यता की जगह निष्ठा पुरस्कार पाने लगे तो पूरी व्यवस्था में औसतपन स्थायी हो जाता है।
यही वह क्षण है जहां हार एक घटना नहीं रहती, व्यवस्था बन जाती है।
लेकिन इस पूरी बहस का सबसे असहज सवाल अभी बाकी है। क्या हर हार का दोष सिर्फ कप्तान का होता है? नहीं।
सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यवस्था की होती है जिसने उसे कप्तान बनाया। उससे भी बड़ी जिम्मेदारी उस सोच की होती है जिसने योग्यता की जगह वफादारी को, नेतृत्व की जगह छवि को और चरित्र की जगह प्रचार को महत्व दिया। क्योंकि गलत कप्तान आसमान से नहीं उतरते। उन्हें तैयार किया जाता है, आगे बढ़ाया जाता है, महिमामंडित किया जाता है और अंततः देश या टीम की कमान उनके हाथों में सौंप दी जाती है।
लोकतंत्र में जनता को मालिक कहा जाता है। लेकिन मालिक होने का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार वोट डालना नहीं होता। मालिक होने का मतलब सवाल पूछना भी होता है। हिसाब मांगना भी होता है। यह देखना भी होता है कि जिसे हम कमान सौंप रहे हैं, उसमें नेतृत्व की योग्यता है भी या नहीं।

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