मुद्दे की बात:-अस्पताल में इलाज की मेज़ पर कमीशन ! : लेखक वरिष्ठ सम्पादक :-आलोक गौड़

Uncategorized

सरकारी हस्पतालो में आने वाला आदमी ग्राहक नहीं होता, मरीज होता है। वह मोलभाव करने नहीं आता, जिंदगी बचाने आता है। उसकी जेब में इलाज कराने लायक पैसे नहीं होते, इसलिए वह सरकार पर भरोसा करता है। उसे लगता है कि उसकी दवा सरकार खरीदेगी, मशीन सरकार लगाएगी और डॉक्टर उसका इलाज करेगा। लेकिन अगर उसी व्यवस्था पर आरोप लगने लगें कि दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और अस्पतालों की जरूरतों की खरीद भी कमाई का जरिया बन गई, तो समझ लीजिए बीमारी शरीर में नहीं, व्यवस्था की आत्मा में उतर चुकी है।


दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में मेडिकल उपकरणों और दवाइयों की खरीद को लेकर सामने आया कथित घोटाला सिर्फ करोड़ों रुपये की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जिसके सहारे हर रोज़ लाखों गरीब मरीज सरकारी अस्पतालों की चौखट पार करते हैं। जांच एजेंसियों ने कई वरिष्ठ अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। आरोप गंभीर हैं। अदालत तय करेगी कि कौन दोषी है और कौन नहीं। लेकिन अदालत के फैसले से पहले भी कुछ सवाल ऐसे हैं, जिनका जवाब जनता मांगने का अधिकार रखती है। अगर कथित तौर पर बाजार मूल्य से कहीं अधिक कीमत पर सामान खरीदा गया, तो क्या यह किसी एक अधिकारी की कलम का कमाल था? क्या टेंडर समिति छुट्टी पर गई हुई थी? क्या वित्त विभाग गहरी नींद में था? क्या ऑडिट की आंखों पर पट्टी बंधी हुई थी? या फिर सब कुछ देखते हुए भी किसी ने इसलिए कुछ नहीं देखा, क्योंकि देखने की कीमत बहुत महंगी पड़ सकती थी?
हमारे यहां भ्रष्टाचार का भी अपना मेडिकल साइंस है। फाइल को बुखार नहीं आता, लेकिन उसे तेज़ी से चलाने के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। नियम कभी-कभी इतने लचीले हो जाते हैं कि करोड़ों रुपये भी उनमें से बिना आवाज़ किए निकल जाते हैं। और जब मामला खुलता है तो हर कोई यही कहता है कि ‘हमने तो सिर्फ प्रक्रिया का पालन किया था।’
सवाल यह है कि अगर प्रक्रिया इतनी पवित्र थी तो जांच एजेंसियां अस्पतालों की खरीद की फाइलों तक क्यों व कैसे पहुंचीं? और अगर प्रक्रिया में ही बीमारी थी, तो उसका इलाज जिसको करना था, उसने क्यों नहीं किया ? जनता इसलिए टैक्स नहीं देती कि सरकारी अस्पतालों की खरीद भी मुनाफे की मंडी में तब्दील हो जाए।
सबसे ज्यादा तकलीफदेह बात तो यह है कि सरकारी अस्पताल में इलाज कराने वाला आदमी कभी यह नहीं पूछता कि उसकी दवा कितने में खरीदी गई। उसे सिर्फ यह उम्मीद होती है कि दवा असली ही होगी , मशीन काम करती हुई मिले और डॉक्टर ईमानदारी से इलाज कर दे। लेकिन अगर उसके भरोसे की कीमत भी टेंडर की शर्तों में तय होने लगे, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, नैतिक दिवालियापन का प्रतीक है l
सरकारी खरीद का सबसे बड़ा मज़ाक यह है कि यहां जिम्मेदारी सबकी होती है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं। एक फाइल तकनीकी समिति से गुजरती है, दूसरी वित्त विभाग से, तीसरी प्रशासनिक मंजूरी लेती है, चौथी ऑडिट की नजर से निकलती है। हर जगह दस्तखत होते हैं, हर जगह मुहर लगती है, हर जगह नियमों का हवाला दिया जाता है। लेकिन जब घोटाले की परतें खुलती हैं तो अचानक पूरी व्यवस्था अनाथ हो जाती है। हर आदमी कहता है कि “मैंने तो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभाई थी।”
यही वह सरकारी संस्कृति है जिसने भ्रष्टाचार को व्यक्ति की नहीं, व्यवस्था की बीमारी बना दिया है। यहां फाइलें बोलती नहीं, बोलवाई जाती हैं। नियम चलते नहीं, चलाए जाते हैं। टेंडर निकलते नहीं, कई बार निकाले जाते हैं। और जब सब कुछ हो जाता है, तब सबसे पहले वही वाक्य सुनाई देता है कि “कानून अपना काम करेगा।”
कानून अपना काम जरूर करे, लेकिन क्या व्यवस्था कभी अपना काम करेगी?
गरीब आदमी अस्पताल में इसलिए नहीं जाता कि वहां एयर कंडीशनर लगा है या इमारत चमचमा रही है। वह इसलिए जाता है कि उसके पास निजी अस्पताल का बिल चुकाने की हैसियत नहीं होती। उसके लिए सरकारी अस्पताल आखिरी उम्मीद है। लेकिन अगर उसी उम्मीद के नाम पर खरीदी जाने वाली मशीनों, दवाइयों और उपकरणों पर सवाल उठने लगें, तो यह केवल सरकारी धन का नहीं, गरीब की बेबसी का भी शोषण है।
हम अक्सर कहते हैं कि भारत विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ रहा है। यह आकांक्षा अच्छी है। लेकिन कोई भी देश केवल बड़े-बड़े भाषणों से विश्वगुरु नहीं बनता। वह तब बनता है जब सरकारी अस्पताल में भर्ती सबसे गरीब मरीज को भी यह भरोसा हो कि उसके नाम पर खर्च होने वाला एक-एक रुपया उसी की जिंदगी बचाने में लगेगा, किसी की तिजोरी भरने में नहीं।
विडंबना देखिए, हर बजट में स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की घोषणा होती है। नई मशीनों की बात होती है, नए अस्पतालों की बात होती है, आधुनिक चिकित्सा की बात होती है। लेकिन अगर खरीद की मेज पर ही नीयत बीमार हो जाए तो सबसे आधुनिक मशीन भी जनता का विश्वास नहीं बचा सकती।
यह मामला सिर्फ इस बात का नहीं है कि कथित तौर पर किसने कितना पैसा कमाया। असली सवाल यह है कि इस कथित खेल की कीमत किसने चुकाई? वह कीमत किसी फाइल में दर्ज नहीं मिलेगी। वह उन मरीजों की लंबी कतारों में मिलेगी जो घंटों इंतजार करते हैं। वह उन परिवारों की आंखों में मिलेगी जो सरकारी अस्पताल को अपनी आखिरी उम्मीद मानकर पहुंचते हैं। और वह उस टैक्स देने वाले नागरिक की जेब में मिलेगी, जिसे यह भरोसा दिलाया जाता है कि उसका पैसा जनहित में खर्च हो रहा है।
भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप वही होता है जो जनता की मजबूरी पर पलता है। शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे दो क्षेत्र हैं जहां लाभ कमाने की मानसिकता, यदि व्यवस्था पर हावी हो जाए, तो नुकसान केवल आर्थिक नहीं रहता; वह सामाजिक और नैतिक संकट में बदल जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *